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मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था बदलने की तैयारी कर ली है

प्रणेता झा | Updated on: 11 February 2017, 5:46 IST
(बिजू बोरो/एएफ़पी )
QUICK PILL
  • मानव संसाधन विकास मंत्रालय की अगुवाई में प्राथमिक और उच्च शिक्षा में कई फेरबदल की तैयारी चल रही है. 
  • मंत्रालय का सारा ज़ोर इसपर है कि किस तरह सरकारी स्कूलों के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही उन्हें कौशल विकास की तरफ़ ले जाया जाए. 
  • वहीं इन बदलाव के आलोचकों का कहना है कि प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही बच्चों को एक दिशा की तरफ़ न्यायसंगत कतई नहीं है. 

देश का शिक्षा तंत्र बदलने वाला है. केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार कर रही है. मानव संसाधन मंत्रालय स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा को लेकर बार-बार घोषणाएं कर रहा है. इन घोषणाओं से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भावी शिक्षा प्रणाली किस तरह की होगी. कैच ने शिक्षा प्रणाली के तीन महत्वपूर्ण बदलावों की पड़ताल की है. 

1. नो-डिटेंशन पॉलिसी पर पुनर्विचार (एनडीपी)

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2010 कहता है कि प्रारंभिक शिक्षा या 8वीं तक की पढ़ाई पूरी नहीं होने तक किसी भी छात्र को फेल नहीं किया जा सकता, ना ही उन्हें रोका जा सकता है. मगर हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कथित तौर कक्षा की सीमा 8वीं से घटाकर 5वीं तक कर दिया है. फिलहाल इसे विधि मंत्रालय के पास भेज दिया गया है. 

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए मंत्रालय का यह कदम निर्णायक साबित होगा जहां हालात बदतर हैं. हो सकता है कि केंद्रीय विद्यालय जैसे कुछ सरकारी स्कूलों पर इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे. 

देश के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे निम्न आय वर्ग वाले परिवारों से आते हैं या फिर वे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े होते हैं. आमतौर पर इन बच्चों के अभिभावक निरक्षर होते हैं जो उनके स्कूल का काम तक नहीं करवा सकते. उनके पास इतना पैसा भी नहीं होता कि बच्चे के लिए प्राइवेट ट्यूशन लगवा दें. 

न डर न कोशिश

कई राज्य सरकारों और स्कूली शिक्षकों ने एनडीपी की नीति को ग़ैरज़रूरी करार दिया है. तमाम राज्यों की रिपोर्ट कहती है कि इससे बच्चों की सीखने की प्रवृत्ति में गिरावट आई है. सरकारी स्कूलों के बच्चे बुनियादी पढ़ाई-लिखाई में फिसड्डी रह जाते है और 9वीं क्लास में पहुंचने के बाद बड़ी संख्या में फ़ेल हो जाते हैं. कई राज्यों ने तो यहां तक मांग की है कि नो-डिटेंशन पॉलिसी को ही ख़त्म कर दिया जाना चाहिए. 

एनडीपी विरोधियों के लिए सबसे लोकप्रिय तर्क यह दिया जाता है कि फेल होने का डर ख़त्म हो जाने पर बच्चे पढ़ाई नहीं करेंगे. उनके माता-पिता भी बेफिक्र हो जाते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनका बच्चा अपने आप ही आगे की क्लास में चला ही जाएगा, भले ही उसने क्लास में कुछ भी नहीं सीखा हो.

मगर नो डिटेंशन पॉलिसी के लागू होने का मतलब है कि यह सतत और व्यापक शिक्षा (CCE) को ध्यान में रखते हुए किया जाए. वहीं शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत कई छोटे-बड़े मूल्यांकन फेल होने के डर के बिना होते हैं. 

अगर इसे सही ढंग से लागू किया जाए तो इससे टीचर को हर बच्चे की सीखने की क्षमता का रिकॉर्ड रखने में मदद मिलेगी और टीचर उसकी मदद कर पाएंगे. गौरतलब है कि सीसीई प्रक्रिया में शैक्षणिक और सह शैक्षणिक दोनों गतिविधियों को बराबर की अहमियत दी जाती है.

मगर टीएसआर सुब्रमण्यन समिति द्वारा सरकार के समक्ष पेश की गई रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि एनडीपी नीति केवल पांचवीं क्लास तक ही लागू की जाए. एनडीपी के बारे में तो काफी ढिंढोरा पीटा जा रहा है लेकिन ऐसी रिपोर्टों की कमी नहीं है, जिनमें सरकारी स्कूलों की उपेक्षा और उनमें फंड की कमी की समस्या पर बात की गई है. इसके अलावा इन स्कूलों में शिक्षकों की लगातार अनुपस्थिति, बेपरवाही और संख्या में कमी दूसरी बड़ी समस्याएं हैं.

दुनियाभर में किए गए अध्ययन के मुताबिक अच्छे से अच्छे समृद्ध परिवार के बच्चों के लिए इतनी कम उम्र में फेल होना अच्छी बात नहीं है. अगर किसी मजदूर का बच्चा फेल होता है तो वह तो स्कूल ही छोड़ देता है. 

2-कौशल विकास अनिवार्य

व्यावसायिक या कौशल प्रशिक्षण जल्द ही स्कूली पाठ्यक्रम का एक हिस्सा होगा. उद्यमिता एवं कौशल विकास मंत्रालय सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ एज्युकेशन (सीएबीई) के साथ इस योजना को मेट्रो सिटी में 9वीं से 12वीं क्लास में लागू करने पर विचार-विमर्श कर रहा है तो दूसरी ओर सीएबीई ने तीसरी क्लास में ही व्यावसायिक पाठ्यक्रम लागू करने की सिफारिश की है. एचआरडी मंत्रालय ने इस पर कथित तौर पर ‘सकारात्मक’ जवाब दिया है. 

एमएसडीई कई राज्यों के सरकारी स्कूलों में 9वीं 10वीं में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की दर पता करने के लिए पहले से ही कौशल विकास कार्यक्रम चला रहे हैं. एनडीपी के तहत 5वीं क्लास तक की बाध्यता और सीएबीई का तीसरी क्लास से ही कौशल विकास प्रशिक्षण देने का प्रस्ताव बताता है कि केंद्र सरकार भारत को विश्व की ‘कुशल राजधानी’ बनाने को प्रतिबद्ध है. एनडीए सरकार अपने कुशल भारत अभियान के माध्यम से 2022 तक 40 करोड़ लोगों को अलग-अलग रोजगारोन्मुखी कौशल प्रशिक्षण देगी.

एमएसडीई फिलहाल निर्माण, खुदरा व्यापार, हॉस्पिटैलिटी, हैल्थकेयर, आईटी आदि में व्यावसायिक प्रशिक्षण दे रहा है. सीएबीई एक परामर्श दात्री निकाय की तरह काम करता है, जो शिक्षा के क्षेत्र में केंद्र व राज्य सरकारों को सला देता है.

फोकस गड़बड़

देखा जाए तो ऐसा लग रहा है जैसे कौशल सीखना सरकारी स्कूल के निम्न आय वर्ग के छात्रों की ही नियति है, जिनका भविष्य कुछ कम उज्ज्वल होने की आशंका है. सरकार इन्हें कुशल कामगार बनाने पर जोर दे रही है ताकि उन्हें रोजगार दिलवा सके. 

मगर सवाल उठता है कि इन बच्चों का भविष्य अभी से तय करना क्या सही है? सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े इन बच्चों को दूसरे रोजगारों से विमुख करना क्या सही है? अपने नौनिहालों के भविष्य की चिंता करने वाली सरकार को चाहिए कि वह कम से कम एक प्रारंभिक शिक्षा के रूप में इन बच्चों के लिए सुदृढ़ आधार तैयार करे.

मगर तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि हम इन वंचित बच्चों को कम से कम उनकी आजीविका कमाने के लिए तो तैयार कर ही रहे हैं, जो इसके अभाव में शायद बेरोजगार ही रह जाएं या दिहाड़ी मजदूरी ही करें. फिर बात यह आती है कि ऐसे रोजगार ही कहां है, जहां ये कुशल बच्चे कुछ काम कर सकें. इसके लिए हमारे पास ‘मेक इन इंडिया' कार्यक्रम है. हालांकि यह भी सच है कि मेक इन इंडिया की सफलता ही फिलहाल तय नहीं है.

3-सीबीएसई स्कूलों के लिए 10वीं बोर्ड अनिवार्य

14 नवम्बर को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर अकादमिक वर्ष 2017-18 से सीबीएसई 10वीं बोर्ड फिर से शुरू करने की घोषणा कर चुके हैं. केंद्र सरकार इस बात पर भी विचार कर रही है कि वह राज्य सरकारों को 5वीं और 8वीं का बोर्ड फिर से शुरू करने की छूट दे दे.

2011 में सरकार ने 10वीं क्लास की बोर्ड परीक्षाएं रद्द कर दी थी. यह छात्रों पर छोड़ दिया गया था कि वे बोर्ड परीक्षा का विकल्प चुनते हैं या स्कूल परीक्षा का. ऐसा छात्रों के मन से बोर्ड परीक्षाओं का भूत भगाने के लिए किया गया. इसके बदले सीसीई का ग्रेडिंग सिस्टम लागू हो गया था. इसके तहत शैक्षणिक व सह शैक्षणिक गतिविधियों को मिला कर ग्रेड दी जाती हैं. इस पर स्कूली टीचर, अभिभावकों और छात्रों की मिली जुली प्रतिक्रिया सामने आई. कुछ खुश थे तो कुछ नहीं.

परन्तु भारत सरकार तो भली भांति जानती है कि पास या फेल का सटीक फैसला करने वाली बोर्ड की ये परिक्षाएं शिक्षा का उच्च स्तर तय करने का एक मात्र विकल्प रही हैं. 

First published: 25 November 2016, 8:26 IST
 
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