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कैराना से हिन्दुओं का पलायन नहीं हुआ: अल्पसंख्यक आयोग

आकाश बिष्ट | Updated on: 26 October 2016, 9:18 IST
QUICK PILL
  • कैराना विवाद में अल्पसंख्यक आयोग की फाइंडिंग राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नतीजों के उलट है. 
  • रिपोर्ट कहती है कि कैराना से किसी भी तरह का असामान्य पलायन नहीं हुआ है और ना ही किसी तरह का तनाव है. 

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ किया है कि उत्तर प्रदेश के कैराना से हिन्दुओं का असामान्य  पलायन नहीं हुआ है. माइनॉरिटी कमिशन की तफ्तीश ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस विवादास्पद रिपोर्ट को ख़ारिज किया है जिसमें मुसलमानों को कैराना से हिन्दुओं के पलायन के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था. 

रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन हिन्दू परिवारों ने कैराना से पलायन किया है, उनकी मुख्य वजह रोज़गार और जीवन को बेहतर बनाने के मौक़ों की तलाश थी जो बेहद सामान्य है.

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की टीम ने हाल ही में उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर और शामली ज़िलों का दौरा किया था. टीम के यहां जाने का मकसद साल 2013 के सांप्रदायिक हिंसा पीडि़तों की स्थिति का आकलन करना था. टीम ने ज़िला प्रशासन और अलग-अलग समुदाय के नुमाइंदों से मुलाक़ात कर उनकी राय ली. टीम के सदस्यों ने मुजफ्फरनगर, शामली, कैराना के मुकामी बाशिंदों और आला अफ़सरों के साथ बैठक भी की. टीम उन इलाक़ों में भी गई, जहां दंगों से बचने के लिए लोगों ने पनाह ली थी.

कैराना से जो परिवार बाहर गए हैं जो वे बेहतर जीवन अवसरों की तलाश में जाते ही रहते हैं

टीम जब कैराना पहुंची तो वहां हिन्दुओं के पलायन का मुद्दा उठाया गया. भाजपा इस कथित पलायन के मुद्दे को विधानसभा  के अगले साल 2017 में होने वाले चुनाव में भुनाने की कोशिश कर रही है. हिन्दुओं के कथित पलायन के मुद्दे को भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने सबसे पहले उठाया था. उसके बाद से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह समेत भाजपा के बड़े नेताओं ने इस मुद्दे को बार-बार उठाया है. 

आज भी यह मुद्दा गरम है. सांसद सिंह ने कैराना को 'नया कश्मीर' कहा था. उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि अल्पसंख्यकों के कथित डर से इलाक़े को निशाने पर लेने के बाद लगभग 250 परिवार कैराना से पलायन कर गए हैं.

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट क्या कहती है?

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि हम इस बात से मुतमईन हैं कि कैराना में मुस्लिम और हिन्दू समुदायों के बीच कोई तनाव नहीं है. किसी भी बड़े पैमाने पर पलायन के कोई भी सबूत वहां नहीं मिले हैं. टीम ने कहा है कि उसे बताया गया है कि कैराना शहर हमेशा से ही मुस्लिम बाहुल्य कस्बा रहा है. 

2013 में साम्प्रदायिक हिंसा और मुसलमानों के विस्थापन के बाद यहां लगभग 280 मुस्लिम परिवार आकर बसे हैं लेकिन इसका शहर की जनसांख्यिकी में कोई असामान्य असर नहीं पड़ेगा. 

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की टीम के हिस्सा रहे प्रवीण डावर ने कैच से बातचीत में कहा कि साल 2011 की जनगणना में कैराना कस्बे की कुल आबादी लगभग 89,000 थी जिसमें 71,683 मुसलमान और 16,320 हिन्दू थे. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम के इस बयान में कोई दम नहीं है कि यहां की जनसांख्यिकी में फर्क़ आ गया है. वहां जनसांख्यिकीय में ऐसा कोई बदलाव नहीं है. 

2013 के मुजफ्फरपुर दंगे के बाद 280 मुस्लिम परिवार कैराना पलायन कर गए थे

यह रिपोर्ट ऐसे वक़्त आई है जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश के कैराना से 250 हिन्दू परिवारों के पलायन पर उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस जांच के नतीजों को अपने पैनल के सामने रखने का फैसला किया है. 

एनएचआरसी की रिपोर्ट में पहले दावा किया गया था कि कम से कम 24 गवाहों ने कहा है कि बहुसंख्यक समुदाय के नौजवानों (इस मामले में मुस्लिम युवक) ने अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं पर फब्तियां कसीं. इस वजह से अल्पसंख्यक समुदाय (हिन्दुओं) के परिवारों की महिलाओं का आसानी से आना-जाना दूभर हो गया था. वे बाहर निकलने से बचती रहीं. वे कानूनी मदद के लिए पुलिस के पास जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा सकीं.

उत्तर प्रदेश के लिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के मेंबर इन-चार्ज फरीद अब्दुल्लाह खान, जो इस दो सदस्यीय टीम के हिस्सा भी थे, ने पहले कहा था कि एनएचआरसी की फाइंडिंग बेबुनियाद लगती है. और इस बात का कोई सबूत नहीं है कि वहां से हिन्दुओं का पलायन हुआ. 

एनसीएम की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय भाजपा नेताओं के संगठित आपराधिक गतिविधियों से निपटने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया गया. इन आपराधिक गतिविधियों में जो लोग शामिल थे, उन्हें पुलिस के साथ ही कुछ राजनीतिक लोगों का समर्थन भी मिला. हालांकि, एनसीएम टीम ने यह कहा कि नए पुलिस प्रमुख ने इन गतिविधियों को नेस्तानाबूद करने के लिए आम सहमति बनाने की कोशिश की है. 

विस्थापित अल्पसंख्यकों का पुनर्वास

इस बीच इन जिलों में दंगा पीड़ित जो विस्थापित मुसलमान बसे हुए थे, उनके पुनर्वास की ताज़ा हालत दुखी करने वाली है.  यह देखकर वेदना हुई कि एक साल पहले जो सुविधाएं इन लोगों को दी गईं थीं, उसमें कुछ भी इज़ाफा नहीं किया गया. मुजफ्फरनगर के पालदा गांव के दौरे के दौरान टीम सदस्यों को देखने को मिला कि बिजली की लाइन तो बिछा दी गई थी, लेकिन उसमें करेंट ही नहीं दौड़ रहा था. 10 में से 4 हैण्डपम्प चालू हालत में नहीं थे.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नागरिक सुविधाओं को लेकर प्रशासन ने जो आश्वासन दिए थे, उसे भी पूरा नहीं किया गया. कालोनी में न सड़क बनाई गई और न सीवेज का इंतज़ाम किया गया. नतीजा यह हुआ कि पूरे इलाक़े में गंदा पानी भर गया है और यहां रहने वालों की ज़िंदगी बदतर होती जा रही है. रिपोर्ट यह भी कहती है कि फंड की कमी के नाते अधिकारियों को विकास कार्य कराने में दिक्कत आ रही है. 

फंड को किश्तों में जारी किया जाता है और इसके लिए भी कई शर्तें हैं. स्थानीय लोगों ने यह भी बताया है कि मूलभूत सुविधाओं जैसे कालोनी में साफ़ पेयजल और बिजली का अभाव है. विस्थापितों को राशनकार्ड भी नहीं मिले हैं. शामली जिले की हसन कालोनी, जहां विस्थापितों के लिए अनेक घर बनाए गए हैं, में दो सदस्यीय टीम ने दौरे के दौरान पाया कि यहां भी ढांचागत सुविधाओं का अभाव है और हालात मुजफ्फरनगर जैसे ही हैं. 

First published: 26 October 2016, 9:18 IST
 
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