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भारत-पाक तनातनी: बयानबाजी नहीं बातचीत ही विकल्प है

भारत भूषण | Updated on: 7 February 2017, 8:24 IST
QUICK PILL
  • भारत ने पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग थलग करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया है. और ऐसा करते हुए मोदी सरकार अपने ही जाल में फंसती नज़र आ रही है. 
  • भारत के पड़ोसी देशों में से केवल बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान ही ऐसे मुल्क हैं जो पाकिस्तान की ओर से फैलाये जा रहे सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के साथ खड़े दिखाई देते हैं. तो फिर मोदी सरकार दुनिया की पंचायत में किस तरह से पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद करने की बात कर रही है. 

सरकार के एक वरिष्ठ नीति निर्धारक ने संकेत दिये हैं कि पाक के खिलाफ सैन्य और कूटनीतिक विकल्प का तुर्रा छोड़ मोदी सरकार बस उसी तरह के युद्ध चातुर्य के रास्ते पर चल रही है जो प्राचीन भारत में अपनाया जाता था. इसके तहत राजा युद्ध से पहले अपने पशुओं को मैदान में खुला छोड़ देता था जिससे हमलावर सेना छलावे में आ कर राजा की असल ताकत का अंदाज़ा न लगा पाये.

यह सब पाकिस्तान की आंख में धूल झोंकने के लिए हो रहा है. ऐसा कर के मोदी अपने ही अति राष्ट्रवादी समर्थकों से भी कुछ समय लेने में कामयाब हुए हैं जो प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के नजदीकी लोगों से पाक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात सुनते आए हैं और ऐसी ही उम्मीद कर रहे हैं. इस बात में फिलहाल संदेह है कि सरकार पाकिस्तान के खिलाफ जिन विकल्पों पर विचार कर रही है वो बदले की कार्रवाई जनता की उम्मीदों के अनुरूप होगी.

भारत ने पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग थलग करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया है. और ऐसा करते हुए मोदी सरकार अपने ही जाल में फंसती नज़र आ रही है. संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए भाषण से कोई खास फर्क पड़ता नहीं दिखाई दिया. यहा तक कि भारत के रणनीतिक साझेदार माने जाने वाले अमरीका तक ने उरी हमले की निंदा 'सीमा पर आतंकवाद' के तौर पर नहीं की. अमरीकी विदेश सचिव जॉन केरी ने इसे कश्मीर में चल रही हिंसा के विरुद्ध कार्रवाई बता कर केवल आम आतंकवाद कह कर निंदा करने की औपचारिकता पूरी कर दी. चीन भी पाकिस्तान के सीमा पार से आतंकवाद मसले पर भारत के साथ नहीं है. इसीलिए उसने जैश-ए-मुहम्मद प्रमुख मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की वांटेड आतंकियों की लिस्ट में शामिल किए जाने का विरोध किया था.

इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) ने जम्मू कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन के लिए भारत के खिलाफ आवाज़ उठाई है. हालांकि भारत बहरीन और सऊदी अरब द्वारा आतंकवाद की निंदा का ढोल पीट रहा है लेकिन गौरतलब है कि उन्होंने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया. भारत के पड़ोसी देशों में से केवल बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान ही ऐसे मुल्क हैं जो पाकिस्तान की ओर से फैलाये जा रहे सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के साथ खड़े दिखाई देते हैं. तो फिर मोदी सरकार दुनिया की पंचायत में किस तरह से पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद करने की बात कर रही है. 

बस सर्विस चालू, कारोबार बहाल

सरकार कूटनीतिक दाँव खेलने की डींगे हांक रही है जबकि पाक उच्चायुक्त को निकाल बाहर करने या भारत में पाकिस्तानी कूटनीतिक मिशन का स्तर कम करने जैसी बात तक नहीं उठाई जा रही. इसके जवाब में हो सकता है पाकिस्तान में भारत के मिशन के साथ यही सलूक हो लेकिन भारत कम से कम ऐसा कर के पाकिस्तान के खिलाफ अपनी नाराजगी तो जता ही सकता था. सरकार इन कूटनीतिक सम्पर्कों का स्तर कम करने के प्रति गंभीर नहीं है यह बात तभी साबित हो जाती है जब उरी आतंकवादी हमले के बाद भी 'उरी चकौटी ट्रांस बार्डर बस सर्विस' हमले के इतने दिन बाद भी 24 घंटे चालू है. ऊपर से इसी मंगलवार से सीमा के आर-पार व्यापार फिर से बहाल कर दिया गय.

दूसरी ओर एक अंतर्राष्ट्रीय संधि का उल्लंघन करना बेहद मुश्किल है. 56 साल पुरानी सिंधु जल संधि का शगूफा मीडिया ने छोड़ा है. हालांकि प्रधानमंत्री ने इस पर मीटिंग बुला कर अपने आक्रामक अंदाज में ऐलान कर दिया है ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते.’  जो कुछ भी, सिंधु जल आयोग की बैठकों में तय हुआ, उसे स्थगित कर दिया गया. ऐसे वक्तव्य दिए गए कि संधि के तहत पाकिस्तान को दी गई सारी नदियों (इंडस, चेनाब और झेलम) के पानी का भारत पूरा-पूरा इस्तेमाल करेगा और किशनगंगा व बगलिहार में नदी परियोजनाओं के निर्माण में तेजी लाएगा. संधि में ऐसे कार्यों की मनाही नहीं है. अपने आयुक्त को वापस बुला कर फिलहाल सिंधु जल आयोग को अस्थाई रूप से नाकारा कर दिया गया है. भारत ने न तो संधि तोड़ने की धमकी दी है और न ही यह ऐसा कर सकता है. भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में आक्रामक रवैया अपनाए हुए हैं, भारतीय सिंधु जल आयुक्त वाशिंगटन के लिए रवाना हो चुके हैं. वे वहां कृष्ण गंगा परियोजना पर अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट के फैसले के खिलाफ पाक की अपील पर विश्व बैंक के साथ बैठक में शामिल होंगे. 

अशांति फैलाना समस्या का हल नहीं

यह जगजाहिर है कि रातों-रात पानी का बहाव नहीं बदला जा सकता. इसके लिए बांध व नहरें बनाने की जरूरत होती है और इन्हें बनने में सालों साल लग जाते हैं. जो भी हो, पाकिस्तान के किसानों का नुकसान करके भारत यह कैसे तय कर पाएगा कि वह भारत के खिलाफ पाकिस्तान में सक्रिय गुटों को वश में कर लेगा. आम पाकिस्तानियों को नुकसान पहुंचाने से पाक में आम जनता और भारत विरोधी गुटों के बीच का फर्क नहीं रह जाएगा. पाक में अशांति फैलाना भारत की समस्या का हल नहीं है.  

एक और बात चल रही है पाक से एमएफएन यानी मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा छीन लिए जाने की; लेकिन यह बस एक नाम मात्र ही है. इसके तहत पाक को ऐसी कोई सुविधा नहीं मिलती जो इसके नाम से लगता है. इसका बस इतना ही मतलब है कि भारत विश्व व्यापार संगठन के नियमानुसार व्यापार के मामले में पाक के साथ भेदभाव नहीं कर सकता; इसे पाक के साथ भी वैसे ही व्यापारिक रिश्ते रखने होंगे जैसे बाकी अन्य देशों के साथ.

हालांकि गैट (जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड) के नियमानुसार इस संबंध में भारत को सुरक्षा कारणों से कुछ छूट मिली हुई है. इसलिए एमएफएन का दर्जा स्थगित करना या वापस लेना कोई मायने नहीं रखता. 2015-16 में भारत-पाक के बीच कुल द्विीपक्षीय व्यापार 2.6 अरब अमेरिकी डॉलर का रहा. इसमें से 2 अरब डॉलर का भारत द्वारा पाक को किया जाने वाला निर्यात है. हालांकि पाक के साथ भारत का व्यापार इसी वर्ष इसके कुल 643.3 अरब डॉलर के कुल व्यापार का मात्र 0.4 प्रतिशत है. इसलिए एमएफएन का दर्जा छिनना भारतीय निर्यातकों के हित में नहीं होगा, अगर पाकिस्तान भारत के साथ व्यापार बंद कर देता है तो. आधिकारिक द्विीपक्षीय व्यापार में पाकिस्तान का हिस्सा इतना कम है कि आतंकी गतिविधियां जारी रखने की कीमत पर यह कभी अपने आकाओं को व्यापार बंद करने से रोकने वाला नहीं है. 

सार्क में पाकिस्तान नाम मात्र का सदस्य

यहां गौर करने वाली बात यह है कि पाकिस्तान में व्यापार और वाणिज्य से जुड़े लोग सदा ही भारत के साथ अच्छे संबंधों के पक्षधर रहे हैं. वे हमेशा शांति व स्थिरता की बात करते हैं, जिसे बढ़ाए जाने की जरूरत है न कि कम किए जाने की. माना जा रहा है कि पाकिस्तान को आइसोलेट करने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि भारत सार्क संबंधी गतिविधियों में भाग लेने के प्रति उदासीन रवैया अपना ले और आगामी नवंबर में होने वाले 19 वें सार्क सम्मेलन को स्थगित किए जाने की मांग करे. पाकिस्तान वैसे ही सार्क का नाम मात्र का ही सदस्य है.

क्षेत्र में वैसे ही महत्वपूर्ण सहयोगात्मक समझौते सार्क से बाहर ही हो रहे हैं और वह भी बिना पाकिस्तान के. बीबीआईएन (भूटान, बांग्लादेश इंडिया और नेपाल) के बीच 2014 में हुआ मोटर वाहन समझौता क्षेत्रीय सम्पर्क बढ़ाने में कारगर सिद्ध होगा, जबकि पूर्व में ऐसा ही एक समझौता पाक की वजह से होते-होते रह गया था. इन चारों देशों के बीच एक संयुक्त कार्य दल पावर-ट्रेड, इंटर-ग्रिड कनेक्टिवटि और चारों देशों के बीच जॉइंट पावर प्रोजेक्ट की संभावनाएं तलाश रहा है. इन चार देशों के बीच सामान, वाहनों और पावर ट्रेडिंग को लेकर होने वाले अनवरत संबंधों के परिप्रेक्ष्य में इन देशों ने कभी पाक की परवाह नहीं की. सार्क सम्मेलन को स्थगित करने से पाक को बहुत अधिक फर्क पड़ने वाला नहीं है, सिवाय इसके कि यह क्षेत्र में अपने आपको हाशिए पर पाएगा. अब सवाल उठता है कि क्या पाक अपने आपको इस कदर महरूम पाएगा कि वह आतंक को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाना छोड़ देगा.

एक सुझाव यह और है कि भारत अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच की आधिकारिक सीमा डुरंड लाइन को मानने से इनकार कर दे और इससे वाकई पाकिस्तान को बुरा लगेगा लेकिन अफगानिस्तान इसका स्वागत करेगा. जब अफगानिस्तान और तालिबान की ही उत्तरोत्तर सरकारों द्वारा डुरंड लाइन को महत्व नहीं दिया गया तो भारत के इस लाइन को मानने या न मानने से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है.

कश्मीर समेत सभी मसलों पर दोबारा शुरू हो बातचीत

अब बलूचिस्तान, सिंध और पीओके में पाकिस्तान द्वारा फैलाए जा रहे आतंक के दमन का एक ही रास्ता बचता है, वह है भारत अपने चुने हुए समय पर पाक के खिलाफ सैन्य कार्यवाही को अंजाम दे. बलूचिस्तान पर भारत पहले ही अपना बदला रवैया जाहिर कर चुका है. सिंध में, खास तौर पर कराची में आपराधिक तत्वों को समर्थन देना और पीओके में मुश्किलें खड़ी करना पाक के खिलाफ भारत में शांति भंग करने का मामला बनने के आधार नहीं है. न ही सीमित या कम तीव्रता वाले युद्ध से ऐसा होगा. एक ही रास्ता नजर आता है, वह यह कि बजाय लंबी चौड़ी आक्रामक बातें करने और माहौल बनाने के बजाय पाक के साथ कश्मीर सहित सभी मसलों पर दोबारा वार्ता प्रक्रिया शुरू की जाए.

भारतीय जनता को पाक के साथ नफरत वाले संबंधों की सोच से बाहर निकालने की जरूरत है. सजा देना या दुश्मन को भ्रमित करने जैसी बातें करके पाक के साथ सीधे संबंधों को बेवजह जटिल बनाने से कुछ हासिल नहीं होगा. पाकिस्तान के साथ संबंध बड़े से गर्त की तरफ ले जाए जा रहे हैं, मोदी को अपने अतिराष्ट्रवादी अनुयायियों को समझाना होगा कि पाक को अस्थिर करना भारतीय राष्ट्रवाद नहीं है. रोज मीडिया में जनमत संग्रह की भी जरूरत नहीं है कि सरकार यह करेगी कि वह. मोदी अभी ढ़ाई साल तक और पद पर बने रहेंगे. यह सही वक्त है कि पाकिस्तान के साथ हम ऐसा वार्ता करें कि नतीजे हमारे मनमाफिक हों.

First published: 28 September 2016, 3:19 IST
 
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