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काल ड्रॉप नहीं रुके तो डिजिटल इंडिया का सपना ड्रॉप हो जाएगा

नीरज ठाकुर | Updated on: 13 May 2016, 13:03 IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को फैसला दिया कि टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) मोबाइल सेवा देने वाली कंपनियों पर काल ड्रॉप के लिए हर्जाना नहीं लगा सकती. ट्राई ने पिछले साल अक्टूबर में टेलीकॉम कंपनियों पर ज्यादा काल ड्रॉप होने पर हर्जाना लगाए जाने का प्रावधान किया था.

ट्राई के प्रावधान के अनुसार 1 जनवरी, 2016 से किसी उपभोक्ता का अगर एक दिन में तीन बार से ज्यादा काल ड्रॉप होता है तो टेलीकॉम ऑपरेटर को उपभोक्ता को एक रुपया हर्जाना देना होगा.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संसद चाहे तो काल ड्रॉप क्षतिपूर्ति नियम बना सकती है. गुणवत्ता सुधारने को  लेकर सरकार से दो साल से जारी बहस की वजह से इन कंपनियों पर काफी दबाव है.

भारत में शायद ही कोई ऐसी टेलीकॉम कंपनी होगी जिसके उपभोक्ता काल ड्रॉप और वादे से कम इंटरनेट स्पीड की शिकायत न करते हों.

केंद्र सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों पर एक दिन में तीन बार से ज्यादा काल ड्रॉप होने पर हर्जाने का प्रावधान किया था

केंद्र में एनडीए सरकार के आने के बाद टेलीकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कंपनियों को अपनी गुणवत्ता सुधारने की हिदायत दी. मंत्री ने कहा कि ऐसा कंपनियां ऐसा नहीं करती हैं तो उनपर हर्जाना लगाया जाएगा. टेलीकॉम कंपनियों का दावा है कि सरकार उन्हें कम स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराती है, वो भी बहुत महंगे दाम पर.

माना जा रहा है कि एनडीए सरकार टेलीफ़ोन और इंटरनेट सेवा की गुणवत्ता को लेकर इसलिए भी सख्त है क्योंकि वो डिजिटल मीडिया मिशन को जोर-शोर से प्रचार-प्रसार कर रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने साल 2020 तक 65 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन देने और 2 एमबीपीएस तक की ब्राडबैंड स्पीड देने का लक्ष्य रखा है. अभी देश में 20 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं और औसतन 512 केबीपीएस ब्राडबैंड स्पीड मिलती है.

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ट्राई द्वारा हर्जाना लगाए जाने के पहले ही टेलीकॉम कंपनियों ने कहना शुरू कर दिया कि सरकार उन्हें बहत कम स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराती है और वो भी बहुत ऊंची कीमत पर. जबकि टेलीकॉम मंत्रालय का मानना है कि कंपनियों को पर्याप्त स्पेक्ट्रम दिया गया है.

सरकार का कहना है कि टेलीकॉम कंपनियां ग्राहकों की संख्या बढ़ने बावजूद अपने बुनियादी ढांचे के विकास पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रही हैं.

सरकार का कहना है कि टेलीकॉम कंपनियां बुनियादी ढांचे के विकास पर पर्याप्त निवेश नहीं करतीं

बिजनेसवर्ल्ड की एक हालिया खबर के अनुसार भारत में मोबाइल उपभोक्ताओं की संख्या 2010 के 57.4 करोड़ से बढ़कर 2015 में 97 करोड़ हो गई. उपभोक्ताओं की संख्या में 66 प्रतिशत की बढ़त होने के बावजूद मोबाइल टावरों की संख्या में महज 33 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. 2010 में भारत में 3.29 लाख मोबाइट टावर थे. 2015 में इनकी संख्या बढ़कर 4.4 लाख हो गई.

हर्जाने का डर


हर्जाना लगाए जाने के डर से टेलीकॉम कंपनियों के रुख में नरमी आई थी. दिसंबर, 2015 में सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार निजी टेलीकॉम कंपनियों ने पूरे देश में 29 हजार मोबाइट टावर लगवाए हैं. वहीं सरकारी कंपनी बीएसएनएल ने अप्रैल-नवंबर 2015 में 4144 नए टावर लगवाए.

ऐसे में ये सवाल मौजूं है कि क्या हर्जाने के डर के बिना भी टेलीकॉम कंपनियां बुनियादी ढांचे के विकास में पर्याप्त निवेश करेंगी?

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रतिक्रिया देते हुए सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के डायरेक्टर जनरल राजन मैथ्यू ने समाचार एजेंसी आईएएनएस कहा, "अब हमें आगे बढ़कर असली मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है. हमें नए टावर, किफायती स्पेक्ट्रम जैसी चीजों पर ध्यान देना होगा."

अगर टेलीकॉम कंपनियां अपना वादा निभाने में गर नाकाम रहीं तो एनडीए सरकार इस बाबत नया कानून बनाने की तरफ बढ़ सकती है क्योंकि वो अपने डिजिटल इंडिया के सपने को इतनी आसानी से धूरधुसरित नहीं होने दे सकती.

First published: 13 May 2016, 13:03 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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