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आधार के खिलाफ किसी भी चुनौती से सरकार को परहेज

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 24 September 2016, 7:24 IST
QUICK PILL
  • केंद्र सरकार ने इस साल मार्च में आधार विधेयक 2016 पारित करने के बाद इसके उपयोग को विभिन्न सरकारी योजनाओं में अनिवार्य कर दिया है.  
  • आधार की वैधता को लेकर चुनौती देने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लम्बित पड़ी हुई हैं. इसमें दोनों तरह की याचिकाएं हैं, निजता और जन वितरण प्रणाली जैसी सरकारी योजनाओं में इसका जरूरी होना. 
  • सरकार का दावा है कि आधार के उपयोग से सरकारी लाभ उठाने वाले अनधिकृत लोगों पर लगाम लागने में मदद मिली है.

इसी साल मार्च में आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी लाभ तथा सेवाओं का लक्षित वितरण) विधेयक-2016 को धन विधेयक की तरह सरकार ने पारित करा दिया. ऐसे में सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछले साल अक्टूबर में दिए गए उस आदेश से दूर हट रही है जिसमें कहा गया था कि आधार को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता. इसी 12 सितम्बर को सरकार ने आधार अधिनियम की धाराओं के तहत अधिसूचना जारी की है जिसके तहत विभिन्न सरकारी योजनाओं में उसके उपयोग को कानूनी प्रश्रय दिया गया है. 

सरकार के इस कदम के साथ ही निजता के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में आधार को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई निषिद्ध हो जाएगी. निजता मुद्दे पर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी हुई है कि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकार (यूआईडीएआई) द्वारा जुटाई गई बायोमीट्रिक सूचना और उस डाटा को साझा करना निजता के अधिकार का उल्लंघन है. यह मामला संवैधानिक पीठ को भेजा गया था. एक साल बाद अभी भी संवैधानिक पीठ का गठन होना बाकी है. संवैधानिक पीठ को यह मामला पिछले साल 11 अगस्त को भेजा गया था.

अनसुनी याचिकाएं

आधार की वैधता को लेकर चुनौती देने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लम्बित पड़ी हुई हैं. इसमें दोनों तरह की याचिकाएं हैं-निजता और जन वितरण प्रणाली जैसी सरकारी योजनाओं में इसका जरूरी होना. सरकार का दावा है कि आधार के उपयोग से सरकारी लाभ उठाने वाले अनधिकृत लोगों पर लगाम लागने में मदद मिली है. सात याचिकाएं तो सुप्रीम कोर्ट में ऐसी हैं जिन पर सुनवाई ही नहीं हुई हैं. ये याचिकाएं निजता के साथ ही मुख्य न्यायाधीश को 'संस्थागत एकता और न्यायिक अनुशासन' के आधार पर प्रेषित की गईं हैं.

अक्टूबर 2015 में याचिकाकर्ताओं ने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया था कि वह जल्द एक संवैधानिक पीठ का गठन करें लेकिन तब से एक भी सुनवाई नहीं हुई.

अनिवार्य या ऐच्छिक

जबकि निजता का मुद्दा अनिश्चय की स्थिति में है, सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2015 में अलग से स्पष्ट कर दिया था कि आधार को जरूरी नहीं बनाया जा सकता लेकिन इसका उपयोग बढ़ाकर एलपीजी, पीडीएस, धन जन योजना, मनरेगा में ऐच्छिक आधार पर किया जा सकता है. कोर्ट ने सरकार को यह भी आदेश दिया था कि वह समाचार चैनलों और प्रिंट मीडिया के साथ ही टेलीविजन नेटवर्क पर भी यह प्रचारित करना सुनिश्चित करे कि हर नागरिक को आधार कार्ड हासिल करना जरूरी नहीं है. नागरिक होने के नाते आधार कार्ड का होना सरकारी लाभ लेने की शर्त नहीं है. तब से सरकार शीर्षस्थ न्यायालय के आदेश को उपेक्षित ही कर रही है. ऐसे भी कई मामले हैं जहां सरकारें कोर्ट के आदेश की परवाह नहीं करती रहीं हैं.

जून में मुम्बई हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका खारिज कर दी थी जिसमें  2015 में महाराष्ट्र सरकार के उस प्रस्ताव को निष्प्रभावी बनाने की मांग की गई थी जिसमें स्कूलों में बच्चों के एडमिशन के लिए आधार कार्ड को पेश करना अनिवार्य बनाया गया था. जनहित याचिका इस आधार पर दाखिल की गई थी कि राज्य सरकार का आधार को अनिवार्य करने का प्रस्ताव शीर्षस्थ न्यायालय के आदेश के विपरीत है. इससे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन होता है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी केन्द्र सरकार के उस निर्णय के प्रति नाखुशी जताई है जिसमें छात्रवृत्ति के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य बनाया गया है. अगस्त में हुई एक रैली में उन्होंने कहा था कि बंगाल के कम से कम 800 गांवों में बैंक नहीं हैं. बंगाल में एक करोड़ लोगों के पास आधार कार्ड नहीं हैं. सरकार इसे कैसे अनिवार्य बना सकती है. जब बंगाल के एक रोड़ लोगों को पेंशन, सब्सिडी या स्कॉलरशिप नहीं मिलेगी. आधार अनिवार्य करने के पहले बैंक खोले जाएं.

अब और भी देर

आधार के लाभों को लेकर बहस से और भी देरी हो सकती है. सभी मंत्रालयों को केन्द्रीय सचिवालय से भेजी गई अधिसूचना में कहा गया है कि सभी सब्सिडीज और कल्याणकारी योजनाओं को 31 मार्च 2017 तक प्रत्यक्ष लाभ हस्तान्तरण योजना के तहत लाया जाएगा. यह भी कहा गया है कि मनरेगा, पीडीएस, स्कॉलरशिप, पेंशन और ईपीएफओ में आधार नम्बर को जोडऩे का काम अनिवार्य रूप से जल्द कर लिया जाए और इसे 31 मार्च 2017 तक पूरा कर लिया जाए.

सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे, जो विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में आधार को लिंकिंग करने को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक हैं, कहते हैं कि संदेह इसलिए है क्योंकि सरकार इस मामले को उस तरह से नहीं देख रही है जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने कहा है. सरकार छात्रों, सब्सिडीज या रेलवे आदि में आधार को अनिवार्य बनाने की बात कर रही है. सरकार को इस मुद्दे पर आगे आने की क्षमता बढ़ानी चाहिए.

वह कहते हैं कि आधार ज्यादा हाशिए पर है, उतना ही ज्यादा, जितने ज्यादा आप आधार के साथ अधिकारहीन हैं. आईआईटी दिल्ली में सामाजिक विज्ञान में एक स्वतंत्र शोधकर्ता रितिका खेरा कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को सरकार सुखद तरीके से नकार रही हैं और निर्विवादित तथ्यों को तैयार करने की कोशिश कर रही है. हमारी चिन्ता है कि कोर्ट में सरकार के बढ़ते प्रतिरोधी दृष्टिकोण को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई नहीं हुई है. इसके अलावा सरकार का यह आंकलन कि पीडीएस, नरेगा, पेंशन में आधार के इस्तेमाल से सरकार को करोड़ों रुपए की बचत हुई है, इसलिए इसे जारी रखा जाए, को कैग और स्वतंत्र अनुसंधनकर्ताओं ने ही चुनौती दे दी है.

First published: 24 September 2016, 7:24 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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