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सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर क्या सोचती हैं राजनीतिक पार्टियां?

आकाश बिष्ट | Updated on: 3 January 2017, 7:51 IST

सुप्रीम कोर्ट के एतिहासिक फैसले के बाद भारतीय राजनीति का चाल, चेहरा और चरित्र बदल सकता है. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी कर कहा कि अब पार्टियां धर्म, जाति, नस्ल, समुदाय या बोली के नाम पर वोट नहीं मांग सकतीं. 

इससे पहले मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय पीठ ने कहा कि संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धान्तों का पालन करते हुए चुनावों को धर्म निरपेक्ष बनाना होगा. ‘ईश्वर के साथ इंसान का संबंध उसका व्यक्तिगत मामला है. सरकार को ऐसी किसी गतिविधि में शामिल होने की मनाही है.’

यहां गौर करने लायक बात यह है कि जो राजनीतिक दल डंके की चोट पर इन कुछ मुद्दों पर ही वोट की राजनीति करते हैं, उन्होंने इस फैसले का जोरदार स्वागत किया है. इनका कहना है कि इस ऐतिहासिक फैसले से अब स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव हो सकेंगे.

भाजपा ने सराहा

भाजपा नेता सुधांशु मित्तल ने कहा, ‘हम सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का स्वागत करते हैं. इससे अल्पसंख्यक तुष्टिकरण पर लगाम लगी जो कि भारतीय राजनीति में बुरी तरह से घर कर चुका है. अदालत के इस आदेश से भाजपा की विकास और सुशासन की राजनीति को बल मिलेगा.’

उन्होंने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगने वाली पार्टियों के लिए करारा झटका है. पार्टियां अब तक मुसलमानों को यह कह कर बरगलाती रही थीं कि अमुक पार्टी को वोट न दें; इस बात पर अब लगाम लगेगी.'

पार्टियां अपने राजनीतिक हित साधने के लिए धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता के नाम पर जनता को अपने पक्ष में करती रही हैं, जो समाज को बांटने वाला खेदजनक कदम है.

विपक्ष द्वारा इस फैसले को भाजपा के लिए बड़ा झटका बताए जाने के आरोप पर मित्तल ने कहा, 'हिन्दू कभी हिन्दू को वोट नहीं देते, वे मुद्दों को वोट देते हैं, जबकि अल्पसंख्यक समुदाय डर के मारे वोट देता है, इसका कई पार्टियों ने गलत फायदा उठाया है. कोर्ट के इस फैसले से इस पर रोक लगेगी.'

कांग्रेस बोली, शानदार फ़ैसला

इसी बीच, कांग्रेस ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस ‘शानदार फैसले’ का स्वागत किया और कहा कि इससे संविधान के मौलिक मूल्यों की पुनर्स्थापना होगी, जो राष्ट्र निर्माण के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने बनाए थे.

कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा, 'कोर्ट के इस फैसले से संविधान के मौलिक सिद्धान्तों की पुनर्स्थापना हुई है, जो हमारे संविधान निर्माताओं ने देश के लिए निर्धारित किए थे. और ऐसा लोकतांत्रिक समाज बनाने के लिए भी, जो जाति, नस्ल, धर्म, क्षेत्र या आस्था में बंटा हुआ न हो. संविधान में धर्म और राज के बीच की जो बारीक रेखा है, वह पिछले 67-68 साल में कमजोर पड़ गई थी.'

सीपीएम भी साथ

सीपीआई (एम) नेता मोहम्मद सलीम ने भी इस फैसले का स्वागत किया और कहा कि वामपंथी तो सदा से ही कहते आए हैं कि राजनीति और धर्म को आपस में मत मिलाओ. सत्ताधरी भाजपा पर प्रहार करते हुए सलीम ने कहा कि पिछले कुछ दशकों से धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक सिद्धांतों की अनदेखी की जा रही है.

इसलिए कोर्ट का यह फैसला सही दिशा में उठाया गया सही कदम है. साथ ही उन्होंने चेताया भी कि अगर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को सख्ती से लागू नहीं किया गया तो राजनीतिक दल इसका अपने फायदे के लिए दुरूपयोग कर सकते हैं.

उन्होंने कहा ‘‘धर्म के आधार पर वोट मांगना समाज को बांटने वाला कदम है. पिछले कुछ दशकों से इस वजह से देश में कई तरह की गड़बडि़यां फैली हैं. उत्तर प्रदेश में बाबरी मस्जिद विवाद और पंजाब का खालिस्तानी आंदोलन इसी तरह की राजनीति का नतीजा है. इसके लिए कुछ चिन्हों और प्रतीकों का इस्तेमाल करने का चलन पिछले वर्षों में काफी बढ़ गया है. हम फैसले का स्वागत करते हैं और उम्मीद है कि चुनाव आयोग और अन्य कानून संबंधी एजेंसियां इस फैसले को प्रारम्भिक स्तर से ही लागू करेंगी; वरना यह फैसला कहीं अपना अर्थ ही न खो दे.

आप भाजपा पर हमलावर

आम आदमी पार्टी के आशुतोष ने कहा, उनकी पार्टी ने कभी धर्म के नाम पर बांटने वाली राजनीति नहीं की. दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, जनता ने विकास के नाम पर वोट दिए धर्म या जाति के नाम

पर नहीं. भाजपा को आड़े हाथों लेते हुए आप नेता ने कहा, प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं ही कहा है कि वे एक हिन्दू नेता हैं, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि भाजपा और उसके नेता धर्म के नाम पर राजनीति करते हैं. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो उनका अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा. 

उन्होंने कहा, सपा, बसपा, राजद व बहुत सी अन्य पार्टियां धर्म के नाम पर वोटरों को लुभा रही हैं और अब यह फैसला आने के बाद उम्मीद है इस पर रोक लगेगी. 

नया कुछ भी नहीं: बसपा

बसपा ने भी कोर्ट के फैसले का समर्थन किया लेकिन साथ ही कहा, इसमें नया कुछ भी नहीं है. पार्टी के वरिष्ठ नेता सुधीन्द्र भदौरिया ने कहा, संविधान में तो पहले ही इस बात का उल्लेख है. हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कैसे बोल सकते हैं? हमें अदालत के फैसले का सम्मान करना होगा और अगर इसमें कुछ निर्देशित कया जाता है तो हमें उसे मानना ही होगा.

राकांपा नेता तारिक अनवर ने भाजपा पर हमला करते हुए कहा, ‘‘भाजपा ने राजनीतिक फायदे के लिए धर्म का इस्तेमाल किया. देश का धर्मनिरपेक्ष ढ़ांचा बनाए रखने के लिए कोर्ट का यह फैसला अहम है. यह धर्म-जाति पर आधारित पार्टियों के लिए करारा झटका है और हम इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत करते हैं.’’

ऐतिहासिक फ़ैसला: राजद

राजद ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा, इस फैसले ने न्यायाधीश कुलदीप सिंह द्वारा 1995 में दिए गए आदेश को अब ठीक कर दिया; जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘‘ हिन्दुत्व एक जीवन शैली है.’’ राजद प्रवक्ता मनोज झा ने कहा इस फैसले से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की राह आसान हो जाएगी.

हालांक झा ने कहा, जहां तक जाति का सवाल है, यहां इसे थोड़ा स्पष्ट किया जाना चाहिए था क्योंकि जात और असमानता दो अलग-अलग विषय हैं. अगर कोई असमानता की बात करता है तो बड़ी राजनीतिक पार्टियां इन मुद्दों पर छोटी पार्टियों को घेर सकती हैं. झा ने कहा, ‘‘जाति समानता, गरीबी और बेरोजगारी से सीधे जुड़े है; इसलिए मैं माननीय सुप्रीम कोर्ट से निवेदन करूंगा कि वह इस ओर ध्यान दें कि फैसले का दुरूपयोग न हो.'

First published: 3 January 2017, 7:51 IST
 
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