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जम्मू कश्मीर: आखिर कैसे एक डीएसपी कानून और कोर्ट से ऊपर उठ गया?

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 August 2016, 7:33 IST

10 जुलाई यानि शीर्ष आतंकी कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर में फैली अशांति केे मात्र दो दिन बाद श्रीनगर के तंगपुरा क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन के दौरान 24 वर्षीय शब्बीर अहमद की मौत पुलिस की गोली लगने के कारण गो गई. यह उन दो दिनों में होने वाली 21वीं मौत थी.

मृतक के पिताअब्दुर रहमान मीर ने श्रीनगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष एक प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किया है जिसका मजमून हैः

‘‘डीएसपी यासिर कादरी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम जबरदस्ती हमारे घर मे घुस आई और शीशे की खिड़कियों और दरवाजों को तोड़ना शुरू कर दिया. यह सब देखकर शिकायतकर्ता की पत्नी ने पुलिस अधिकारी को रोकने का प्रयास किया जिससे वह नाराज हो गया और जवाब में उन्हें थप्पड़ मारा और उनके साथ मारपीट की. साथ ही उस अधिकारी ने महिला के प्रति अपशब्दों का भी प्रयोग किया और चूंकि शिकायतकर्ता का पुत्र शब्बीर भी मौके पर मौजूद था जो अपनी मां के साथ होने वाने दुर्व्यवहार को बर्दाश्त नहीं कर सका और उसे बचाने की कोशिश की.’’

हलफनामे में आगे आरोप लगाया गया है, ‘‘इसपर पुलिस अधिकारी ने शब्बीर की पिटाई करनी शुरू कर दी. पिटाई पर भी मन न भरने पर उस पुलिस अधिकारी ने अपनी पिस्टल निकाल ली और बिल्कुल सटाकर शिकायतकर्ता के बेटे के शरीर में दो गोलियां उतार दीं. शब्बीर की मौके पर ही मौत हो गई.’’

शिकायतकर्ता के अनुसार यह वाकया शाम को 6.45 बजे उस समय घटित हुआ ‘‘जब पूरा परिवार कमरे में बैठकर टीवी देख रहा था.’’

18 जुलाई को इस शिकायत का संज्ञान लेते हुए श्रीनगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मसर्रत शाहीन ने श्रीनगर के एसएसपी अमित कुमार को डीएसपी कादरी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये.

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया

‘‘शिकायतकर्ता (मृत युवक के पिता) ने हलफनामा दाखिल किया है और उसकी शिकायत के तथ्यों के आधार पर ऐसा लगता है की डीएसपी ने अपने अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग किया जिससे स्पष्ट है कि यहां पर एक संज्ञेय अपराध का मामला बनता है. ऐसे में शिकायतकर्ता द्वारा शपथ के तहत दिये गए शिकायती पत्र और हफलनामे के आधार पर श्रीनगर के एसएसपी को संबंधित अधिकारी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने और मामले की जांच करने का आदेश दिया जाता है.’’

पुलिस ने डीएसपी के खिलाफ तो कोई एफआईआर दर्ज नहीं कि हालांकि मृत युवा के खिलाफ जरूर एक मामल दर्ज किया.

आरोप-प्रत्यारोप

इसके बाद 28 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अदालत में डीएसपी का बचाव करते हुए दलील दी कि पुलिस ने पहले ही इम मामले मे एक एफआईआर दर्ज कर ली है जिसमें मृतक युवा को आरोपी बनाया गया है. पुलिस ने अदालत को बताया कि मरने वाला युवक उस दिन एक जुलूस का नेतृत्व कर रहा था.

हालांकि अदालत ने पुलिस के इस तर्क को खारिज करते हुए नए सिरे से निर्देश जारी करते हुए एसएसपी अमित कुमार को 24 घंटे के भीतर डीएसपी के खिलाफ दूसरी एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये.

लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया. इसके उलट राज्य के विधि विभाग ने सीजेएम के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में एक अपील दायर की.

कमतर आंकना

उनका यह कदम वरिष्ठ पीडीपी नेता और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री मुजफ्फर हुसैन बेग को भी काफी चैंकाने वाला लगा.

वर्तमान में सांसद बेग कहते हैं, ‘‘इस मामले में अपराध को एक पुलिस अधिकारी द्वारा अंजाम दिया गया है. पीड़ित परिवार के पास मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज करवाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था जिन्होंने प्रथम दृष्टया स्वयं को संतुष्ट करने के बाद संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये. सीजेएम के इस आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील करने का विधि विभाग का फैसला न सिर्फ राज्य सरकार की विश्वसनीयता को कमजोर करेगा बल्कि खुद मुख्यमंत्री की विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में आएगी.’’

इसके अलावा बेग ने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से इस मामले में ‘‘न्याय के हित में और अपनी खुद की विश्वसनीयता को बचाए रखने’’ के लिये जल्द से जल्द हस्तक्षेप करने की भी मांग की. लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं बदला और कोई मामला दर्ज नहीं किया गया.

आदेश की अवमानना को माना गंभीर

30 जुलाई की अगली सुनवाई के दौरान अदालत ने अपने आदेश की अवमानना को काफी गंभीर माना और एसएसपी श्रीनगर के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिये और डीआईजी सेंट्रल श्रीनगर को इसे क्रियन्वित करने का आदेश दिया.

इसके अलावा अदालत ने एसएसपी के उस आवेदन को भी खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने व्यक्तिगत पेशी से छूट मांगी थी.

इसके अलावा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शाहीन ने अदालत में मौजूद मुख्य अभियोजन अधिकारी को इस वारंट को डीआईजी सेंट्रल कश्मीर को पहुंचाने और दो दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने के लिये निर्देशित किया.

अदालती आदेश कहता है, ‘‘इसके अलावा एसएसपी श्रीनगर से पूछा जाता है कि क्यों न उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और उसे 24 घंटों के भीतर कोर्ट में पेश करने के कोर्ट के आदेश को न मानने पर अवमानना की कार्रवाई की जाए.’’

इस बीच एक अगस्त को उच्च न्यायालय ने विधि विभाग की याचिका को खारिज करते हुए आरोपी डीएसपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के सीजेएम के आदेश का समर्थन किया.

एसएसपी कुमार को अदालत के आदेश के अनुसार डीआईजी सेंट्रल कश्मीर की हिरासत में अदालत के समक्ष पेश किया गया जहां उन्हें वारंट तामील होने के चलते जमानत दे दी गई.

दोबारा दोहराया आदेश

हालांकि अदालत ने 24 घंटे के भीतर डीएसपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के अपने आदेश को दोबारा दोहराया.

आदेश में लिखा है, ‘‘इसके बावजूद अगर एसएसपी श्रीनगर अदालत के आदेश का पालन नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ नियमानुसार आरोप तय किये जाएंगे और फिर एसएसपी श्रीनगर को कानून के तहत दंडित करने के लिये उन्हें माननीय उच्च न्यायालय को प्रेषित किया जाएगा.’’

फिर भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई.

छह अगस्त की सुनवाई के दौरान अदालत ने एक बार फिर एसएसपी श्रीनगर के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किये और इस बार उन्हें तामील करने की जिम्मेदारी दी गई आईजी कश्मीर जोन को. इसके अलावा सीजेएम ने आईजी को स्वयं अदालत में पेश होने और तंगपुरा हत्याकांड को लेकर पुलिस की स्थिति स्पष्ट करने को कहा.

अदालत ने कहा, ‘‘उच्च न्यायालय की मुहर लगने के साथ ही इस अदालत के आदेश को अंतिम मुहर लग गई है और इसके बावजूद न तो एफआईआर ही दर्ज की गई है और न ही उसकी नकल अदालत में पेश की गई है. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि कानून के रखवाले खुद ही कानून का उल्लंघन कर रहे हैं और जानते-बूझते अदालत के आदेशों की अवहेलना कर रहे हैं.’’

First published: 10 August 2016, 7:33 IST
 
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