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65 साल पुरानी दुश्मनी, बढ़ते विवाद और अब ऐतिहासिक मुलाकात, ये है दो कट्टर दुश्मनों की पूरी कहानी

आदित्य साहू | Updated on: 27 April 2018, 20:15 IST

एक सनकी तानाशाह ने गेस्ट बुक में लिखा- "अब एक नए इतिहास की शुरुआत होती है, इतिहास के शुरुआती बिंदु पर और शांति के युग की."

और फिर वह हो गया जिसके बारे में किसी ने सोचा नहीं था. यह शुरुआत थी एक नए युग की. यह शुरुआत थी एक नई दोस्ती की. यह शुरुआत थी एक नए इतिहास की. दुनिया भर में अकसर आपसी तनाव के चलते चर्चा में रहने वाले उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच दशकों से खड़ी दुश्मनी की दीवार शुक्रवार को गिर गई.

लगभग 65 साल बाद उत्तर कोरिया के किसी शासक ने दक्षिण कोरिया की धरती पर कदम रखा. शुक्रवार सुबह 9.30 बजे मुस्कुराते और गर्मजोशी से हाथ मिलाते दोनों देशों के नेताओं ने सीमा रेखा पर स्थित असैन्य इलाके में मुलाकात की. इस मुलाकात का उद्देश्य उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को खत्म करना और उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार कार्यक्रम को लेकर पैदा हुई चिंता को दूर करना है.

 

क्या हुआ था 65 साल पहले
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया दो खेमों में बंट गयी थी. अमेरिका वाले पश्चिमी और सोवियत संघ वाले पूर्वी खेमे में. शीतयुद्ध कहलाने वाला दोनो का प्रचारयुद्ध 1950 में कोरिया प्रायद्वीप पर पहली बार गरम युद्ध में बदल गया. 25 जून, 1950 के दिन, उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर अचानक आक्रमण कर दिया. कुछ ही दिनों के भीतर उसने राजधानी सौउल सहित दक्षिण कोरिया के अधिकांश भाग पर क़ब्ज़ा कर लिया.

उसका क़ब्ज़ा शायद बना ही रहता, यदि अमेरिका और 15 और देशों ने मिल कर क़रीब दस लाख सैनिक नहीं जुटाये होते और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव की आड़ लेकर उत्तर कोरिया और उसके साथियों को उस सीमा तक पीछे न धकेल दिया होता, जो कोरिया प्रायद्वीप के विभाजन के समय खींची गयी थी.

 

क्या था विभाजन का इतिहास
कोरिया प्रायद्वीप 1894 से ही जापानी दबदबे में आ गया था. 1910 में जापान ने उसे अपना हिस्सा बना लिया. 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी और जापान घनिष्ठ साथी थे. युद्ध दोनो की भारी पराजय के साथ समाप्त हुआ. मुख्य विजेता शक्तियों अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ (आज के रूस) ने कोरिया को जापान से छीन कर जर्मनी की ही तरह उस का भी विभाजन कर दिया.

कोरिया प्रायद्वीप पर यह विभाजन रेखा थी 38 अंश अक्षांश. इस अक्षांश के उत्तर का हिस्सा रूस और चीन की पसंद के अनुसार एक कम्युनिस्ट देश बना और बोलचाल की भाषा में उत्तर कोरिया कहलाया. दक्षिण का हिस्सा अमेरिका और उसके मित्र देशों की इच्छानुसार एक पूँजीवादी देश बना और दक्षिण कोरिया कहलाया. दोनो कोरिया अपने-अपने शुभचिंतकों पर आश्रित थे और किसी हद तक केवल शतरंजी मोहरे थे. उन्हें लड़ा रहे थे एक तरफ़ रूस और चीन, और दूसरी तरफ़ अमेरिका और उसके यूरोपीय साथी.

 

DW के अनुसार कोरिया देशों के बीच युद्ध पांच साल पहले बने 'संयुक्त राष्ट्र संघ' की विधिवत अनुमति से चला पहला युद्ध था. यह युद्ध तीन साल चला था और इसमें लगभग 35 लाख लोगों की मौत हो गई थी.

सोवियत संघ और चीन के समर्थन के बल पर उत्तर कोरिया ने 1950 में दक्षिण कोरिया को रौंद डाला था. चीन और सोवियत संघ की उस समय खूब बनती थी. इसलिए सोवियत संघ सुरक्षा परिषद की बैठकों का बहिष्कार कर रहा था. बहिष्कार करने के कारण ही वह किसी अमेरिकी प्रस्ताव को गिराने के लिए अपने वीटो अधिकार का उपयोग भी नहीं कर सका. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इस का भरपूर लाभ उठाया.

कोरिया युद्ध शुरू होने के एक महीने बाद उन्होंने सुरक्षा परिषद से वह प्रस्ताव पास करवा लिया, जिसके अधीन अमेरिका और उसके कई मित्र देशों को संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले कोरिया में अपने सैनिक भेजने का अधिकार मिल गया. अमेरिकी सेनाओं के कंमाडर जनरल डगलस मैकआर्थर ने उत्तर कोरिया और उसका साथ दे रहे देशों के जल्द ही छक्के छुड़ा दिये. पूरा दक्षिण कोरिया लगभग खाली करवा लिया. भारत ने भी उस समय अपनी एक मेडिकल कोर कोरिया भेजी थी.

लेकिन जैसे ही संयुक्त राष्ट्र सैनिक चीनी सीमा के पास पहुंचे चीन खुल कर लड़ाई में कूद पड़ा. खुद को स्वंयसेवी बताते हुए चीन ने लाखों लड़ाके मैदान में उतार दिये. जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र सैनिकों को पीछे हटना पड़ा. इसके बाद अमेरिकी कमांडर मैकआर्थर ने राष्ट्रपति ट्रूमैन से कहा कि उन्हें चीन पर परमाणु बम गिराने का अधिकार दिया जाये.

लेकिन ट्रूमैन यह हिम्मत नहीं कर पाये. ट्रूमैन की जगह जब ड्वाइट आइज़नहावर राष्ट्रपति बने, तब उन्होंने युद्धविराम का निर्णय किया. और इस तरह, 27 जुलाई 1953 को, दोनो कोरिया की सीमा पर के एक स्थान पानमुन्जोम में युद्धविराम का समझौता हुआ और लड़ाई रुकी.

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युद्धविराम होने तक 40 हज़ार संयुक्त राष्ट्र सैनिक (जिसमें 90 प्रतिशत अमेरिकी सैनिक थे) मारे जा चुके थे. उत्तर कोरिया और उसके साथी देशों के संभवतः 10 लाख सैनिक मारे गये थे. इसके अलावा लगभग 20 लाख नागरिक मारे गए थे.

युद्धविराम के बाद से 240 किलोमीटर लंबा और चार किलोमीटर चौड़ा एक विसैन्यीकृत क्षेत्र दोनो कोरिया को अलग करता है. तटपार पीत सागर में 38 अंश अक्षांश रेखा के समानांतर 200 किलोमीटर लंबी एक जलसीमा है, जिसे उत्तर कोरिया ने कभी स्वीकार नहीं किया. वहां दोनों की नौसेनाओं के बीच अक्सर झड़प हो जाती है. दोनों के बीच की सीमा सामान्य नागरिकों के लिए हमेशा से बंद रही. कोई डाक सेवा नहीं है, कोई टेलीफ़ोन सेवा नहीं है. विभाजित जर्मनी वाले दिनों की तरह दोनो तरफ के लाखों परिवार छह दशकों से कटे फटे हैं. जर्मनी तो इस बीच एक हो गया, कोरिया का एकीकरण अभी भी एक दिवास्वप्न ही है.

हुई ऐतिहासिक मुलाकात
हालांकि अब जब दोनों देशों के प्रमुखों की ऐतिहासिक मुलाकात हुई है तो इस मुलाकात से कई सारी चीजें सुलझ सकती हैं. दोनों नेताओं के बीच कोरियाई महाद्वीप में न्यूक्लियर हथियारों की होड़ को खत्म करने पर बातचीत चल रही है.

First published: 27 April 2018, 20:02 IST
 
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