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बाग़पत के किसान 'मोदी' से परेशान हैं, पर प्रधानमंत्री से नहीं

सादिक़ नक़वी | Updated on: 23 November 2016, 7:40 IST
(मानस गुरुंग/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • मलकपुर गांव स्थित उमेश मोदी समूह की सीबीईसी शुगर्स ने बाग़पत और आसपास के ज़िलों के किसानों के गन्ने का भुगतान रोक रखा है. 
  • सरकारी दफ़्तरों का चक्कर काटकर थक चुके किसानों ने कहा है कि अगर सुनवाई नहीं हुई तो वह राजधानी दिल्ली को जाम कर देंगे. 

80 से ज्यादा गांवों में रहने वाले बाग़पत के हज़ारों गन्ना किसानों के लिए नोटबंदी सबसे बड़ी मुसीबत नहीं है. यहां के एक किसान राजीव सिंह कहते हैं, 'हमारी हालत आत्महत्या करने जैसी हो गई है क्योंकि पिछले साल से अभी तक हमें गन्ने का भुगतान नहीं मिला. हमारे पास कोई पैसा नहीं है और हमारी ज़िंदगी मोदी ने नरक जैसी बना दी है.' राजीव सिंह बड़ौत के रहने वाले हैं. उन्होंने बताया कि किस तरह पड़ोस के मलकपुर गांव में स्थित उमेश मोदी समूह की सीबीईसी शुगर्स ने उनके गन्ने का भुगतान रोक रखा है.

यह स्थिति तब है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एकाधिक बार चुनावी मंंचों से गन्ना किसानों का सबकुछ भुगतान हो जाने का दावा कर चुके हैं.

शुगर मिल कोऑपरेटिव शुगरकेन सोसाइटी के चेयरमैन धूम सिंह कहते हैं कि सीबीईसी शुगर्स चीनी मिल ने गन्ना किसानों का 239 करोड़ रुपया दबा रखा है. मिल ने 29 करोड़ रुपए के ब्याज का भी भुगतान नहीं किया है. वहीं किसान कंवरपाल कहते हैं कि कई बार प्रदर्शन करने और अधिकारियों को ज्ञापन देने के बाद भी उनके क्षेत्र को इसी चीनी मिल को आवंटित कर दिया गया.

मिल मालिक उमेश मोदी, आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी के चाचा हैं, अटकल है कि वे भी देश छोड़ चुके हैं

धूम सिंह का कहना है कि सरकार को या तो इस चीनी मिल को अपने हाथ में ले लेना चाहिए या फ़िर हमारा क्षेत्र किसी अन्य चीनी मिल को दे देना चाहिए. धूम सिंह पूछते हैं कि जब इस चीनी मिल के खिलाफ रिकवरी की नोटिस पेंडिंग है, तो भी यह क्षेत्र इसी मिल को क्यों दे दिया गया. धूम सिंह का आरोप है कि राज्य सरकार मिल मालिकों से मिली हुई है. 

किसान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी नाराज़ हैं. 15 अगस्त को लाल किले से दिए गए अपने भाषण में मोदी ने कहा था कि गन्ना किसानों का 95 फीसदी भुगतान किया जा चुका है और बाकी बचे पांच फीसदी गन्ना किसानों के एरियर का जल्द ही भुगतान हो जाएगा. धूम सिंह पूछते हैं कि कहां है हमारा पैसा? वह याद करते हैं कि किस तरह से लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान मोदी ने बड़ौत में गुजरात मॉडल का ख़ाका खींचा था और कहा था कि कैसे किसानों का भुगतान समय पर कर दिया जाता है. 

एक अन्य किसान और खाप नेता सुभाष चौधरी बताते हैं कि दो बसों में भरकर किसान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलने गए थे लेकिन समाधान की बजाय उन्होंने हमें यह समझा दिया कि किस तरह से उमेश मोदी विदेश भाग गए हैं. किसानों के बीच एक अफवाह यह भी है कि राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया चौधरी अजित सिंह किसानों की मांगों से इत्तेफाक नहीं रखते. वजह चौधरी अजित सिंह और मिल मालिक उमेश मोदी के बीच की निकटता है. यह भी कहा जाता है कि मिल मालिक ने 2014 के चुनाव में उनकी आर्थिक मदद की थी.

कहां हैं उमेश मोदी

उमेश मोदी, आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी के चाचा हैं. ललित मोदी प्रवर्तन अधिकारियों की गिरफ्त से बचने के लिए लंदन में जा छिपे हैं और वहीं रह रहे हैं. ग्रामीणों के मुताबिक उमेश भी लापता हो गए हैं और शायद वे भी लंदन में रह रहे हैं. उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद इसी साल मई में उप्र पुलिस ने दबिश देकर कहा था कि मोदी फरार हैं. हालांकि कैच के पास मौजूद एफआईआर में उनकी बजाय मिल के मैनेजर राजकुमार शर्मा का नाम दर्ज है.

फिलहाल मवाना शुगर्स समेत लगभग 13 चीनी मिलों पर किसानों का 1,300 करोड़ रुपए का बकाया है लेकिन मलकपुर शुगर मिल उप्र में भुगतान न करने वाली चीनी मिलों में सबसे ऊपर है. अन्य मिलों ने भी अभी तक थोड़ा बहुत भुगतान किया है. वो भी तब, जब किसान ख़ुदकुशी करने लगे. बाग़पत ज़िले में अभी तक दो किसान ख़ुदकुशी कर चुके हैं. 

कंपनी की हाल की बैलेंस शीट की एक प्रति दिखाते हुए धूम सिंह दावा करते हैं कि उमेश मोदी किसानों का भुगतान करने की बजाए मिल के धन को समूह की अन्य कम्पनियों में ट्रांसफ़र कर रहे हैं. सिंह पूछते हैं कि किसान कर्ज नहीं चुका पाए तो जेल और मिल मालिकों के ख़िलाफ़ रिकवरी नोटिस आती है तो वे लंदन पहुंच जाते हैं. 

आंदोलन की चेतावनी

गन्ना आयुक्त विपिन कुमार द्विवेदी ने कैच से कहते हैं कि जब ज़्यादातर चीनी मिलें भुगतान करने में समर्थ हैं तो मोदी समूह जैसी कुछ मिलें क्यों नहीं भुगतान कर रहीं? ऐसा तो है नहीं कि उन्हें फायदा नहीं हो रहा, मगर फिर भी भुगतान नहीं किया गया. 

सुभाष चौधरी के मुताबिक 84 ग्राम पंचायतों ने स्थानीय प्रशासन और मिल मालिकों को चेतावनी दी है कि अगर अगले हफ्ते तक उनका भुगतान नहीं हुआ तो वे सड़कों पर उतर आएंगे और हम राजधानी तक जाम कर देंगे.

84 ग्राम पंचायतों ने चेतावनी दी है कि अगर अगले हफ्ते तक उनका भुगतान नहीं हुआ तो वे सड़क पर उतर जाएंगे

गन्ना उत्पादक इस इलाक़े में किसानों की ज़िंदगी पूरी तरह गन्ने की खेती पर टिकी है. यहां किसी भी तरह की रुकावट का अन्य क्षेत्रों पर भी नकारात्मक असर पड़ता है. किसानों की क्रयशक्ति घटती है. बावजूद इसके परेशान किसानों की सुनवाई नहीं हो रही. 

इस सीज़न में एक कुन्तल गन्ने की कीमत 305 रुपए है. जब मिल बंद रहती है तो नगदी की खातिर गन्ना किसान अपनी फसल को किसी दूसरे गन्ना पेरने वालों को बेचते हैं. यहां उनका गन्ना सिर्फ 180 रुपए प्रति कुन्तल की दर से ही खरीदा जाता है जो कि चीनी मिलों की तरफ़ से मिलने वाले धन से काफी कम है. 

कंवरपाल कहते हैं कि अभी गुड़ बनाने का सीज़न चल रहा है. नोटबंदी की वजह से लोग या तो भुगतान नहीं कर रहे हैं या फिर पुरानी करंसी दे रहे हैं. हालांकि वह कहते हैं कि देशहित में यह अच्छा है. इससे कालेधन से छुटकारा मिल जाएगा.

First published: 23 November 2016, 7:40 IST
 
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