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भारतीय अर्थव्यवस्था का काला अध्याय है नोटबंदी: मीरा सान्याल

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 27 November 2016, 8:12 IST
(फाइल फोटो )
QUICK PILL
  • मशहूर बैंकर रहीं और अब आम आदमी पार्टी की नेता मीरा सान्याल ने नोटबंदी के फ़ैसले को देशहित में नहीं बताया है. 
  • उन्होंने कहा है कि अभी हो रही मुश्किलें दिखाई दे रही हैं लेकिन लॉन्ग टर्म में यह फ़ैसला भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए काला साबित होगा.

रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड की भारत में पूर्व सीईओ और चेयरमैन रहीं मीरा सान्याल नोटबंदी के फ़ैसले को देशहित में नहीं मानती है. मीरा कहती हैं कि इस नीति को लागू करने में आने वाले ख़र्च का सीधा असर देशभर की करोड़ों जनता पर पड़ेगा. छोटे उद्योगों पर आर्थिक मार अभी से दिखाई पड़ रही है, मज़दूरों को उनकी दिहाड़ी नहीं मिल रही और महंगाई बढ़ती दिख रही है. बैंकर से राजनीतिज्ञ बनी मीरा सान्याल इस फ़ैसले को दीर्घकालीन अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भयावह मानती हैं. 

सवाल-जवाब

नगदी पर निर्भर गारमेंट और कृषि बाज़ार तेज़ी से बंद हो रहे हैं, विशेषकर आउटपुट और उत्पादन के संदर्भ में?

दो हफ़्ते से अधिक का समय निकल जाने के बाद यह साफ़ है कि कारोबार, कृषि और घरेलू इस्तेमाल वाले सामान में तरलता का संकट बढ़ा है. उनके पास धन तो है लेकिन नई करेंसी न होने की वजह से वह किसी मतलब की नहीं है. कैश निकालने पर भी पाबंदी लगी हुई है. जनता अपने व्यापार या घरेलू ज़रूरतों के लिए ही अपना ही धन नहीं निकाल पा रही है.

तात्कालिक और लंबी अवधि में इसका अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ने जा रहा है?

हमें ऐसा लग रहा है कि मुश्किलें बस कुछ दिन की बात है. 50 दिन गुज़रने के बाद के बाद सबकुछ ठीक होने लगेगा मगर दीर्घकालीन अवधि में इसके नतीजे भयावह और बदतर हो सकते हैं. संकट हमें सीधे तौर पर दिखाई पड़ रहा है. छोटे कारोबारी, दुकानदार, दिहाड़ी मज़दूर पिछले दो हफ़्ते से खाली बैठे हैं. उन्हें नुकसान हो रहा है. बिक्री हो नहीं रही है. इसमें आश्चर्यजनक रूप से गिरावट आई है. लोगों के पास अपने स्टाफ को देने के लिए पैसा नहीं है. 

अगर अगले एक पखवाड़े तक यही हालत जारी रही तो रबी की बुवाई पर असर पड़ेगा. अर्थव्यवस्था की पूरी की पूरी आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो जाएगी. जो आदेश जारी किए जाएंगे, उन्हें न तो पूरा किया जा सकेगा और न ही उनका सम्मान किया जा सकेगा. एक्सपोर्ट, खासकर लघु एवं वित्तीय आकार के इंटरप्राइजेज में गिरावट आएगी और लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ेगा. पहले से ही कुछ अर्थशास्त्रियों ने अनुमान लगा लिया है कि अगले छह महीनों में जीडीपी की विकास दर में ज़बरदस्त गिरावट आ सकती है. 

क्या नोटबंदी का फ़ैसला अर्थव्यवस्था में किसी भी तरह से मददगार साबित हो सकता है? 

अगर कालाधन बाहर आता है और लोग अपनी ज्यादा आय घोषित करते और ज्यादा आयकर चुकाते हैं तो इससे जीडीपी के अनुपात में कर अदायगी बढ़ेगी और प्रत्यक्ष कर संग्रह में बढ़ोतरी होगी. मगर समस्या यह है कि लोगों ने पहले ही अपने कालेधन को स्वर्णाभूषणों और विदेशी विनिमय आदि में बदल लिया है. इसका सीधा मतलब यही है कि हम अपने लोगों के लिए मुश्किल हालात पैदा कर रहे हैं. यह हमारी अर्थव्यवस्था का दुखद अध्याय है. इसका कोई फ़ायदा मिलने वाला नहीं है. 

कब तक अर्थव्यवस्था के स्थिर होने की उम्मीद है?

अभी सरकार की ओर से ऐसे किसी प्लान या टाइमलाइन के बारे में पता नहीं चला है. कब पर्य़ाप्त मात्रा में नगदी होगी और कब लोग आसानी से बिना किसी बंदिश के अपना ही धन निकाल सकेंगे. साफ़ पता चलता है कि सरकार ने विधिवत रूप से इसकी कोई योजना नहीं बनाई थी और नए नोट का इंतजाम भी नहीं है. फिलहाल यही संकेत हैं कि अर्थव्यवस्था को स्थिर होने में कई महीने लगेंगे जो अर्थव्यवस्था के लिए काफी अनर्थकारी होगा.

कौन से सेक्टर्स नोटबंदी से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे? 

पूरी आतंरिक अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुज़र रही है. किसान, छोटे कारोबारी, दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले गरीब लोग इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे और इसका सबसे ज्यादा असर उन्हीं पर होगा.

First published: 27 November 2016, 8:12 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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