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नोटबंदी और राजनीति: मोदी सरकार ने जबरन मंदी का दौर ला दिया

कमल मित्र चिनॉय | Updated on: 6 December 2016, 8:12 IST
(फाइल फोटो )
QUICK PILL
  • 2000 के नोट ज्यादा संख्या में छपवा कर मोदी सरकार अपने ही तर्क के विपरीत जा रही है कि 1000 और 500 के नोट काले धन के संचय में काम आते थे. काली अर्थव्यवस्था के लिए तो 2000 के नोट और भी ज्यादा उपयोगी है. 
  • नोटबंदी से सबसे गंभीर समस्या यह हुई कि लोगों को जरूरत का सामान नहीं मिल सका क्योंकि ट्रक और अन्य वाहनों के पास डीजल खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था.

आमतौर पर नोटबंदी तब लागू की जाती है, जब अर्थव्यवस्था में बहुत ज्यादा मुद्रास्फीति बढ़ जाती है, मसलन जब 1000 रुपए के नोट की क्रय-शक्ति सिर्फ 50 रुपए रह जाती है. इन हालात में करेंसी बदलना जरूरी हो जाता है. पर भारत में यह स्थिति नहीं थी. यहां सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)7.6 प्रतिशत था. चीन से भी ज्यादा.

और काला धन?

पहली बात तो यह, जैसा कि प्रभात पटनायक जैसे अर्थशास्त्रियों ने कहा, कि काला धन जोड़ा नहीं जाता, बल्कि स्थावर संपदा, गहने, सोना आदि क्षेत्रों में घुमाया जाता है. यह वर्जिन द्वीप, केमेन द्वीप, पनामा और दुबई जैसे कर मुक्त देशों में भी भेजा जाता है.   

काले धन के संचय का कोई मतलब नहीं है क्योंकि मुद्रास्फीति के साथ रुपए का मूल्य घटता है. अनुमान है कि संचित काला धन, काले धन का महज 10 प्रतिशत है. अनमुानत: भारत में काला धन 20 से 35 प्रतिशत है, जो विश्व बैंक के अनुमान से ज्यादा है. विदेशों में कितना काला धन है, इसका सही-सही आकलन नहीं है, पर यह महत्वपूर्ण मुद्दा है.

कैश की कमी

500 और 1000 के नोटों को बंद करने का फैसला सही नहीं था क्योंकि इसकी वजह से अर्थव्यवस्था से कुल करेंसी मूल्य का 86 प्रतिशत बाहर आ गया. हालांकि कुछ समय के लिए 500 के थोड़े नोट जारी किए गए, पर पर्याप्त नहीं थे. 500 के 1,660 करोड़ नोट चाहिए. हाल की रिपोर्ट के अनुसार 5 प्रतिशत भी छपकर तैयार नहीं हैं क्योंकि इस नोट की छपाई पीएम मोदी के 8 नवंबर के भाषण से एक हफ्ते पहले शुरू की गर्ई थी.

दूसरी ओर, 2000 के नोट पीएम की घोषणा से दो महीने पहले छापे गए थे, इसलिए जल्दी उपलब्ध हो गए. और इसी वजह से कैश की भारी कमी है, खासकर अंडरबैंक्ड ग्रमीण इलाकों में. इसकी वजह से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में असंतोष बढ़ रहा है.

2000 के नोट ज्यादा संख्या में छपवा कर मोदी सरकार अपने ही तर्क के विपरीत जा रही है कि 1000 और 500 के नोट काले धन के संचय में काम आते थे. काली अर्थव्यवस्था के लिए तो 2000 के नोट और भी ज्यादा उपयोगी है. यह ज्यादा छोटा है और आसानी से छिपाया जा सकता है. 

2000 के नोट के साथ एक और गंभीर समस्या है, यह और नोटों की साइज का नहीं है, इसलिए एटीएम और बैंक में रुपए गिनने की मशीन में उसके लिए ज्यादा एडजसमेंट करने पड़े.  

जिंदगी थम गई

नोटबंदी से सबसे गंभीर समस्या यह हुई कि लोगों को जरूरत का सामान नहीं मिल सका क्योंकि ट्रक और अन्य वाहनों के पास डीजल खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था. कैश की कमी की वजह से कर्मचारियों का काम बंद हो गया. 

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हुआ. मजदूर वर्ग और सामान के उत्पादक ज्यादा संख्या में हैं, और वे शहरी बाजार से आमतौर पर सस्ते होते हैं, उनका कारोबार सबसे ज्यादा खराब हुआ.

भारत और भारत के बाहर के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि हमारा सकल घरेलू उत्पाद कम से कम 4.6 प्रतिशत गिर जाएगा. अभी एक डॉलर का मूल्य 68.12 रुपए है, वह घटकर 110 रुपए हो जाएगा और 5 बिलियन डॉलर देश से जा चुका है. इस तरह के भारी संकट को मंदी का दौर कहते हैं. मोदी सरकार को उम्मीद  थी कि नोटबंदी से आतंकवाद खत्म होगा, पर उनकी उम्मीद झूठी साबित हुई. और कैशलैश मनी? दुनिया में कैशलैश जैसी कोई अर्थव्यवस्था नहीं है. 

क्रेडिट/डेबिट कार्ड्स, पेटीएम, और अन्य प्लास्टिक मनी को खरीदारी के बाद अंतत: लौटाना पड़ेगा. जैसी कि कहावत है, मुफ्त में खाना नहीं मिलता. शायद सरकार यह महसूस करती है कि जितना कम कैश होगा, उतना ही कम काला धन होगा. 

जैसा कि मैंने पहले कहा, ज्यादातर काला धन कैश में नहीं है. जन धन खातों में हजारों करोड़ आने से, काले धन को गरीबों की ओर मोडऩे के पीएम के प्रयास पर कानूनन संदेह है. ऐसा लगता है मानो काला धन समानान्तर पनप रहा है.  

राजनीति

क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक मकसद है? पीएम मोदी ने बार-बार कहा है कि उनका मकसद भ्रष्टाचार और काले धन को खत्म करना था, जो 70 साल से भी ज्यादा समय से संचित हो रखा था. एटोर्नी जनरल रोहतगी ने भी सुप्रीम कोर्ट में कहा कि 70 सालों से अवैध कामों के लिए धन रखा हुआ है. 

पहली बात तो यह कि 15 अगस्त 1947 से 8 नवंबर 2016 का समय 69 साल का हुआ ना कि 70 साल का. और फिर पीएम 2014 में चुने गए यानि 2017 से ढाई साल पहले, इसलिए वे भी इस आरोपित भ्रष्टाचार और काले धन का काफी हिस्सा थे. 

सबसे ज्यादा गंभीर बात तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर कल्पित आरोपण है, जिन्होंने जनसंघ की स्थापना की, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर एल.के. आडवाणी तक. किसने पीएम को इस लापरवाह और तथ्यात्मक रूप से गलत अभियोगात्मक भाषण देने को विवश किया? क्या इसका संबंध संघ परिवार की अप्रत्याशित चुप्पी से है?

बहरहाल, इस दुखद त्रासदी ने शहरी और ग्रामीण गरीबों का खासतौर से नुकसान पहुंचाया है, पर उच्च मध्यम वर्ग भी बच नहीं सका. यह सब किसी आर्थिक संकट की वजह से नहीं हुआ है, बल्कि एक ऐसी नीति के फैसले से, जो गलत थी. इस फैसले ने तेजी से विकसित हो रही अर्र्थव्यवस्था में जबरन मंदी का दौर ला दिया.

First published: 6 December 2016, 8:12 IST
 
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