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#जेटली की पोटली: स्वास्थ्य बजट में इन 5 बिंदुओं पर गौर करना चााहिए

कैच ब्यूरो | Updated on: 16 February 2016, 22:36 IST
QUICK PILL
  • मोदी सरकार ने पहले से ही अपर्याप्त स्वास्थ्य बजट में 5.7 प्रतिशत की \r\nकटौती करते हुए इसे साल 2014-15 के 35163 करोड़ रुपये से घटाकर साल 2015-16\r\n में 33152 करोड़ कर दिया था.
  • साल 2013-14 के बाद से स्वास्थ्य क्षेत्र में होने वाले बजटीय आवंटन में 20 प्रतिशत की कटौती हो चुकी है. लेकिन क्या साल 2016-17 के वार्षिक बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली स्वास्थ्य बजट की धनराशि को बढ़ा कर जनता को किये मोदी के वादे को पूरा करेंगे.

यालप्पा धांगे का चार वर्षीय बेटा लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकीमिया से पीड़ित है जो एक प्रकार का कैंसर है. इसका इलाज बेहद महंगा है और मरीज को बहुत अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है. धांगे को अपने बेटे का इलाज टाटा मेमेरियल अस्पताल में करवाने के लिये आने वाले दो वर्षों में चार लाख रुपये से भी अधिक की जरूरत पड़ेगी.

अपने बीमार बेटे के इलाज के लिये पैसे जुटाने के क्रम में महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित सोलापुर जिले से ताल्लुक रखने वाले एक छोटे किसान धांगे अब तक 50 हजार रुपये में अपने खेत बेचने के अलावा विभिन्न धर्मार्थ संस्थाओं के माध्यम से करीब एक लाख रुपये जुटाने में सफल रहे हैं. उन्हें सरकार की किसी भी मदद की उम्मीद नहीं है.

अगर धांगे ने एक सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा योजना जिसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के नाम से जाना जाता है, उसमें नामांकन करवा रखा होता या फिर उनकी पहुंच सस्ती जीवन रक्षक दवाओं तक होती तो शायद उन्हें अपने बीमार बेटे के इलाज के लिये खेत नहीं बेचना पड़ता.

महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित सोलापुर जिले के एक किसान धांगे को बीमार बेटे के इलाज के लिये अपने खेत को बेचना पड़ा

सरकारी स्तर पर धांगे जैसे लोगों के लिये कई नीतियां और योजनाएं संचालित की जा रही हैं लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन नीतियों को अब तक प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जा सका है.

एनडीए ने साल 2015 के अपने पिछले बजट में भारत की स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं में विस्तार और सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए एम्स की तर्ज पर और भी अधिक अस्पतालों की स्थापना करने और स्वास्थ्य बीमा पर टैक्स को कम करने की बात रखी थी.

हालांकि इसके साथ ही सरकार ने पहले से ही अपर्याप्त स्वास्थ्य बजट के आवंटन में 5.7 प्रतिशत की कटौती करते हुए इसे साल 2014-15 के 35163 करोड़ रुपये से घटाकर साल 2015-16 में 33152 करोड़ कर दिया. कुल मिलाकर साल 2013-14 के बाद से स्वास्थ्य क्षेत्र में होने वाले बजटीय आवंटन में 20 प्रतिशत की कटौती हो चुकी है.

यह भी एक आश्चर्यजनक सच्चाई है कि नरेंद्र मोदी सरकार एक नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य, बीमा नीति, चिकित्सा शिक्षा और बड़ी फार्मा कंपनियों को विनियमित करने संबंधी अपने प्रमुख चुनावी वादों को भी पूरा करने में कामयाब नहीं हो पाई है. लेकिन अब जब वित्तमंत्री साल 2016-17 के वार्षिक बजट की तैयारियों में जुटे हैं तो क्या वे एनडीए सरकार द्वारा किये गए चुनावी वादों को पूरा करने का प्रयास करेंगे.

नरेंद्र मोदी सरकार नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा नीति संबंधी अपने प्रमुख चुनावी वादों को पूरा करने में कामयाब नहीं हो पाई है

कैच ने कई डाॅक्टरों, एक्टिविस्टों और विशेषज्ञों से इस बारे में बात की कि वित्तमंत्री को बजट तैयार करते समय स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र को प्रोत्साहन देने के लिये किन तात्कालिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिये.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का क्रियान्वयन

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति सार्वभौमिक स्वास्थ्य की कवरेज सुनिश्चित करने, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने और सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क दवाओं एवं डायग्नाॅस्टिक के उपयोग को बढ़ावा देने की नीति है.

बीते वर्ष इस नीति को तैयार करते समय स्वास्थ्य मंत्रालय ने दावा किया था. इस नीति का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य को शिक्षा की तरह ही देश के प्रत्येक नागरिक के लिये मौलिक अधिकार बनाने का है.

हालांकि यह नीति कामयाब नहीं रही. अधिकतर विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्यक्रम में निजी क्षेत्र की भागीदारी को न बढ़ा पाना इसकी विफलता का मुख्य कारण हैं.

इस योजना से संबंधित मसौदा बीते एक वर्ष से सार्वजनिक है लेकिन इस बात में स्पष्टता का बिल्कुल अभाव है कि सरकार अपनी प्राथमिकताओं का चुनाव करने से पहले क्या करना चाहती है.

एक व्यापक सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा प्रदान करना

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर किया जाने वाला फुटकर खर्च करीब 60 फीसदी है जो विश्व में सबसे अधिक है. इस पर काबू पाने के लिये एनडीए सरकार लगातार सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा योजना लागू करने के अपने इरादे को दोहराती आई है. हालांकि यह योजना अभी तक अमल नहीं हुआ है और अब तक यह एक ‘इरादा’ ही बनी हुई है.

हालांकि बीती यूपीए सरकार द्वारा प्रारंभ की गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, निजी और सरकारी दोनों ही अस्पतालों में निःशुल्क ईलाज की सुविधा प्रदान करवाती है. इससे स्थिति में कुछ सुधार तो हुआ है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ एक योजना के माध्यम से 'सभी को स्वास्थ्य बीमा' प्रदान नहीं किया जा सकता.

यूपीए सरकार द्वारा प्रारंभ की गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, निजी और सरकारी दोनों ही अस्पतालों में निःशुल्क ईलाज की सुविधा प्रदान करवाती है

सेंटर फाॅर क्रोनिक कंडीशंस एंड इंजरीज, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के सहनिदेशक प्रोफेसर विक्रम पटेल कहते हैं, 'वर्तमान बीमा योजनाएं सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने का खर्च वहन करती हैं. आज के समय में आवश्यकता सिर्फ एक सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा की नहीं बल्कि एक अधिक सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा की है जिसमें दवाओं इत्यादि जैसे बाहरी खर्चे भी शामिल हों.'

रोग उन्मूलन कायक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना

भारत ने एचआईवी/एड्स, टीबी और मलेरिया के मामलों को कम करने के लिये पर्याप्त प्रयास किये हैं. लेकिन बजट की कमी के चलते राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम और राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम जैसे प्रयासों में बहुत बेहतरीन प्रदर्शन करने के बाद ठहराव सा आ गया है.

सच्चाई यह है कि साल 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद निरंतर एचआईवी और टीवी से संबंधित दवाओं के खत्म होने की खबरें सामने आती रही हैं जिसके चलते इन उन्मूलन कार्यक्रमों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है.

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की प्रमुख डा. सौम्या स्वामीनाथन कहती हैं कि, 'सरकार के लिये यह बेहद आवश्यक है कि वह पहले से ही सुनियोजित रोग नियंत्रण कार्यक्रमों पर अपना ध्यान केंद्रित करे. इन कार्यक्रमों में इस बात को लेकर स्पष्टता है कि वे इनके माध्यम से क्या हासिल करना चाहते हैं.'

वे आगे कहती हैं, 'टीबी कार्यक्रम के पास साल 2012-17 के लिये एक बहुत ही बेहतरीन पंचवर्षीय योजना थी. अगर हमें पूरे फंड प्राप्त होते हैं तो हम टीबी नियंत्रण की दिशा में जो हासिल कर पाए हैं, उससे कहीं बेहतर करने में सफल होते.'

भारत में फाईलेरिया और कालाजार जैसी बीमारियां उन्मूलन के कगार पर हैं

उनका कहना है, 'फाईलेरिया और कालाजार जैसी बीमारियां उन्मूलन के कगार पर हैं. इसे पाने के लिये बस एक अंतिम प्रयास आवश्यक है और उसके लिये उचित बजट का आवंटन सबसे बड़ी आवश्यकता है,'

वायदा की हुई निःशुल्क दवा योजना को लागू करना

इस सरकार ने लगातार जीवन रक्षक दवाओं को निःशुल्क उपलब्ध करवाने के बारे में बात की है. लेकिन राज्य सरकारों को ऐसी योजनाओं के लिये प्रोत्साहित करने के अलावा इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किये गए हैं.

हालांकि अगर कुछ राज्य अपने स्तर पर इस प्रकार की योजनाओं की शुरुआत भी करते हैं तो बिना केंद्र की सहायता के इतने अधिक समय तक संचालित होने की उम्मीद न के बराबर है.

इसके अलावा जन स्वास्थ्य अभियान के संयोजक अमित सेनगुप्ता के अनुसार सरकार ने अपनी प्रस्तावित योजना में आवश्यक रूप से शामिल होने वाली दवाओं की सूची में सिर्फ 50 दवाओं को शामिल किया है और यह संख्या बिल्कुल ही अपर्याप्त है.

इसके अलावा नेशनल फार्मास्युटिकल प्राईसिंग अथारिटी बड़ी फार्मा कंपनियों के दबाव के चलते अधिक दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने में असफल रही है.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिये दिये जाने वाले धन में वृद्धि

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राज्यों के व्यय में वृद्धि की बात सामने आने के बाद इसी महीने के प्रारंभ मे स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस मिशन के बजट को 33 हजार करोड़ रुपये से बढ़ाकर 40 हजार करोड़ करने के लिये कहा है.

उदाहरण के लिये केरल ने अपने व्यय को 51 प्रतिशत से बढ़ाकर लगभग दोगुना करते हुए 98 प्रतिशत कर दिया है. इसी प्रकार राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी व्यय में वृद्धि दर्ज की गई है जबकि बिहार अपने बजटीय आवंटन का सिर्फ 46 प्रतिशत ही उपयोग करने में कामयाब रहा है.

केरल सरकार ने अपने स्वास्थ्य व्यय को 51 प्रतिशत से बढ़ाकर लगभग दोगुना करते हुए 98 फीसदी कर दिया है

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का मुख्य ध्यान विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक स्वास्थ्य स्वयंसेवकों की नियुक्ति कर और गरीबों को इनका लाभ उठाने के लिये प्रेरित कर स्वास्थ्य सेवाओं के प्रयोग में वृद्धि करने पर केंद्रित हैै. इसके अलावा इस योजना में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता को भी पीछे नहीं छोड़ा जा सकता है.

अधिक पैसा और अधिक तेज नतीजे

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह स्पष्ट रूप से इस तथ्य को रेखांकित करता है कि स्वास्थ्य बजट में वृद्धि करना समय की आवश्यकता है.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन के प्रोफेसर पटेल का इस मामले में तर्क है कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा योजना के विस्तार के लिये 'पर्याप्त वित्तपोषण' का सबसे अधिक महत्व है.

वे कहते हैं, 'इसके अलावा वार्षिक बजट सरकार की आने वाले पांच सालों की मंशा को साफ करने में मददगार साबित होगा. सारा ध्यान स्वास्थ्य बजट को बढ़ाकर जीडीपी के कम से 3 फीसदी तक बढ़ाने पर होना चाहिये.' फिलहाल भारत मुश्किल से अपनी जीडीपी का 1 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च करता है.

जीडीपी में स्वास्थ्य बजट को बढ़ाकर कम से कम 3 फीसदी तक होना चाहिये, लेकिन भारत अभी अपनी जीडीपी का सिर्फ 1 फीसदी ही स्वास्थ्य पर खर्च करता है

डा. स्वामीनाथन एकीकृत बाल विकास योजना-मिड डे मील जैसे पोषण कार्यक्रमों में सुधार लाने और उसका विस्तार करने के लिये बजट आवंटन में वृद्धि करने पर जोर देती हैं. इसके अलावा वे गर्भवती महिलाओं, किशोरियों और बच्चों के लिये पोषण कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर भी जोर देती हैं.

वे कहती हैं, 'स्वास्थ्य अनुसंधान के क्षेत्र में अधिक निवेश की आवश्यकता है. इसके अलावा उन बीमारियों के उन्मूलन पर अधिक अनुसंधान करने की भी आवश्यकता है, जिन्हें जड़ से समाप्त किया जा सकता है. साथ ही मलेरिया, खसरा, फाइलेरिया और कुष्ठ रोग जैसी गंभीर बीमारियों के उन्मूलन का ढांचा पहले से ही तैयार किया जा चुका है. इस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है'.

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक अच्छी तरह से सोचे-समझे और बेहतर स्वास्थ्य बजट की आवश्यकता है.

First published: 16 February 2016, 22:36 IST
 
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