Home » इंडिया » NotesForMrJaitley : Clear the bad loan mess and aim for sustainable growth
 

नॉन परफार्मिंग एसेट को दुरुस्त कर अपनी परफार्मेंस सुधार सकते हैं जेटली

नीरज ठाकुर | Updated on: 6 February 2016, 8:38 IST
QUICK PILL
  • बैंकों के बढ़ते एनपीए को देखते हुए 8 फीसदी ग्रोथ रेट को पूरा करने में खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. बैंकों के लिए नए प्रोजेक्ट की फंडिंग करने में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.
  • सितंबर 2015 के अंत में पीएसयू बैंकों का एनपीए 3.14 लाख करोड़ रुपये रहा है जो पिछले साल की समान तिमाही के 2.5 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 25.19 फीसदी अधिक है.

करीब दो हफ्ते बाद भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली बजटीय भाषण दे रहे होंगे और इस बात की पूरी संभावना है कि वह अगले वित्त वर्ष के लिए 8 फीसदी ग्रोथ का लक्ष्य रखेंगे. हालांकि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को मजबूत बैकिंग सेक्टर की जरूरत होगी ताकि बड़ी परियोजनाओं की आसान फाइनेंसिंग की जा सके.

तो क्या भारतीय बैंक में जेटली के महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की फंडिंग की क्षमता है? भारत का बैंकिंग सेक्टर पीएसयू बैंकों के दबदबे वाला सेक्टर है जिसमें 70 फीसदी बाजार पीएसयू बैंकों के हाथों में है. सितंबर 2015 के अंत में पीएसयू बैंकों का एनपीए 3.14 लाख करोड़ रुपये रहा है जो पिछले साल की समान तिमाही के 2.5 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 25.19 फीसदी अधिक है.

वित्त वर्ष 2015-16 के लिए एनपीए की हिस्सेदारी नियोजित खर्च का 68 फीसदी है. हालांकि यह रकम वास्तविक रकम के मुकाबले बेहद छोटी है. अगर हम इसमें उन परिसंपत्तियों को भी जोड़ दें जिनके डिफॉल्ट का खतरा है तो यह रकम सरकार की तरफ से 7.5 फीसदी वृद्धि दर के लक्ष्य को हासिल करने के लिए की जाने वाली खर्च से भी ज्यादा होगी.

बैंक खुद से अपनी पूंजी नहीं पैदा करते हैं. उनके लिए ब्याज की बड़ी भूमिका होती है. ऐसे में एनपीए वाले कर्ज की संख्या में बढ़ोतरी होने का मतलब है कि बैंकिंग सेक्टर के पास अर्थव्यवस्था में निवेश करने वाली रकम में कमी ही आएगी.

क्यों हैं बैंकों की खराब हालत?

2001 में एनपीए 12 फीसदी था जिसे 2008 में कम कर 2.4 फीसदी किया गया. हालांकि वैश्विक मंदी की स्थिति में यूपीए सरकार ने अर्थव्यवस्था पर किए जाने वाले खर्च को बढ़ाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश की. इससे वृद्धि दर को मजबूती मिली और मंदी के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था टिकी रही. इसके अलावा भारतीय बैंकों को भी इंफ्रा सेक्टर में निवेश करने का हौसला मिला.

आरबीआई के एक आकलन के मुताबिक बैंकों को कई रियायतें प्रदान की गई ताकि वह इंफ्रा सेक्टर को कर्ज दे सकें. आज की तारीख में कर्ज से लदी 10 कंपनियों में से 8 कंपनियां इंफ्रा सेक्टर से हैं और इन पर कुल 5.83 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है.

इनमें से अधिकांश कंपनियां अभी तक अपने प्रोजेक्ट को शुरू भी नहीं कर पाई है या फिर उन्होंन इतना भी मुनाफा नहीं कमाया है ताकि वह अपने कर्ज के ब्याज का भुगतान कर सके.

भारतीय बैंकों ने इंफ्रा कंपनियों के कर्ज पुनर्गठन को मंजूरी दी जिसमें उन्हें कुछ सालों के लिए भुगतान से राहत मिली. यह उम्मीद की गई कि कुछ सालों में वह मुनाफा कमाने लगेंगी लेकिन ऐसा हो पाया या नहीं, इसकी जानकारी किसी को नहीं है.

राजन की चेतावनी

आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने हाल ही में सरकार के ऊंचे ग्रोथ रेट की महत्वाकांक्ष की आलोचना की थी. उन्होंने कहा, 'कुछ साल पहले ही दुनिया ब्राजील की अर्थव्यवस्था की तारीफ कर रही थी और 2010 मे यह 7.6 फीसदी की दर से आगे भी बढ़ी. लेकिन पिछले साल इसकी अर्थव्यवस्था सिकुड़कर 3.8 फीसदी पर आ गई और इसका कर्ज जंक की श्रेणी में डाला जा चुका है. इस साल भी वृद्धि दर ठीक नहीं रहेगी. तो फिर क्या गलत हुआ?'

राजन ने कहा, 'ब्राजील ने तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश की. वैश्विक मंदी के बाद 7.6 फीसदी की ग्रोथ रेट की वजह से सरकारी सहायता में आई तेजी रही. ग्रोथ रेट को बढ़ाने के दबाव की वजह से सेंट्रल बैंक पर ब्याज दर घटाने का दबाव डाला गया और उसका नतीजा यह हुआ कि अब वह ब्याज भुगतान करने के लिए परेशान हो रहे हैं. इसके अलावा ब्राजील ने सब्सिडी वाले लोन की मदद से प्रोजेक्ट की फंडिंग की. 

टैक्स में छूट देकर इंडस्ट्री की मदद की गई वहीं गैसोलिन और बिजली पर प्राइस कंट्रोल लगाया गया जिसकी वजह से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बड़ा नुकसान हुआ.' 

साफ तौर पर राजन ब्राजील की मिसाल देकर भारत की स्थिति को साफ करने की कोशिश कर रहे थे. राजन ने कहा कि सरकारी सहायता से बहुत तेजी से आगे नहीं बढ़ा जा सकता जैसा कि हमने 2010 और 2011 में किया था. 

ऐसे जेटली को अपने पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम से यह सीखने की जरूरत होगी क्या भारत में वाकई में 8 फीसदी की दर से आगे बढ़ने की क्षमता है? अगर हां तो इसके लिए पैसा कहां से आएगा और फिर क्या कंपनियों के पास कर्ज चुकाने की क्षमता है.

क्या भारत के बैंक इस संकट की स्थिति से बाहर निकल सकते हैं?

इसका जवाब इस पर निर्भर करता है कि सरकार डिफॉल्टर्स पर भुगतान करने के लिए कितना दबाव डालती है. बैंक एम्प्लॉएज फेडरेशन के महासचिव विश्वास उतगी कहते हैं, 'सरकार आंकड़ों के मुताबिक कुल 7,265 डिफॉल्टर्स हैं जिनके पर बैंकों का 64,000 करोड़ रुपये का बकाया है. उन्हें भुगतान करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए.'

उतगी ने कहा कि डिफॉल्टर्स की सूची में और लोगों के नाम को शामिल किया जाना चाहिए और साथ ही बड़े कारोबारियों के नाम को सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि उन पर भुगतान के लिए दबाव बन सके. हालांकि खुद आरबीआई गवर्नर इस मामले में सुस्त रहे हैं.

ऐसे में सवाल यह है कि अगर कोई आम आदमी डिफॉल्ट करता है तो बैंक उसे ईएमआई का भुगतान करने के लिए परेशान कर सकते हैं तो फिर बड़े कारोबारियों के साथ ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? एनपीए की बढ़ती मात्रा को छिपाने के लिए बैंक सीडीआर जैसे तरीकों की मदद लेते हैं और इससे उन्हें अपनी बैलेंस शीट में इसे बतौर एनपीए दिखाने से छूट मिल जाती है.

आरबीआई ने इस मामले में सख्ती बरतते हुए सभी बैंकों को यह आदेश दिया है कि अप्रैल 2015 के बाद से सभी नए सीडीआर को एनपीएम के तौर पर दर्ज किया जाए. हालांकि अभी तक इस मामले में कोई तरक्की नहीं हो पाई है. 

First published: 6 February 2016, 8:38 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी