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तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी धार्मिक भेदभाव को रोक पाने में अक्षम होगा!

अभिषेक पराशर | Updated on: 19 December 2015, 7:28 IST
QUICK PILL
  • मंदिरों में पुजारियों की नियुक्तियों के मामले में अहम फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि जन्म और जाति के आधार पर पुजारियों की नियुक्ति में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता. इस मामले में संविधान सबसे ऊपर है.
  • अक्टूबर महीने में ही उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में एक 90 साल के दलित व्यक्ति की इसलिए हत्या कर दी गई थी क्योंकि वह अपनी पत्नी, बेटे और भाई के साथ मंदिर में घुसने की कोशिश कर रहा था.

तमिलनाडु में राज्य सरकार के आदेश के मुताबिक किसी भी जाति के व्यक्तियों को मंदिर में पुजारी बनाए जाने की व्यवस्था के खिलाफ मीनाक्षी मंदिर के पुजारियों की अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि जन्म और जाति के आधार पर पुजारियों की नियुक्ति में फर्क नहीं किया जा सकता. यह संविधान की भावना के खिलाफ है. इस संबंध में संविधान को तरजीह दी जानी चाहिए.

सनातनी परंपरा में मंदिरों का रखरखाव और उसका संचालन पुजारियों के हाथ में होता है. अमूमन इस पद का निर्धारण जाति और कुल के आधार पर होता आया है. आज भी पुजारियों के पद पर एक जाति विशेष का ही प्रभुत्व है. इसने एक नियम का रूप ले लिया है.  

एनिहिलेशन ऑफ कास्ट में आंबेडकर साफ तौर पर लिखते हैं, 'पुजारी एकमात्र ऐसा पेशा है जिसके लिए किसी ज्ञान की जरूरत नहीं. यह किसी नियम से संचालित नहीं होता. पुजारी बनने के लिए किसी का पुजारियों की जाति में पैदा होना ही काफी है.' 

अनादि काल से चली आ रही परंपरा के नाम पर एक तबका इसे जायज ठहराता रहा है. दलित बुद्धिजीवी कंवल भारती बताते हैं, 'जाति व्यवस्था हिंदू धर्म का सच है. हिंदू धर्म अभी तक दलितों को मंदिर में प्रवेश देने का मन नहीं बना पाया है. ऐसे में पुजारियों की नियुक्ति में एक खास जाति के वर्चस्व को तोड़ना तो बहुत दूर की बात है.'

आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर सनातनी परंपरा का हवाला देते हुए पुजारियों की सत्ता पर ब्राह्मणों का एकाधिकार बताते हैं. 

स्वामी दीपांकर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करार देते हुए इसकी समीक्षा किए जाने की जरूरत बताते हैं. उन्होंने कहा, 'पुजारियों की सत्ता ब्राहणों के हाथों में ही रहनी चाहिए क्योंकि यह परंपरा अनादि काल से चली आ रही है.' वह कहते हैं, 'शुद्धि जैसा काम कोई व्यक्ति किसी दलित पुजारी से क्यों कराएगा?' जाहिर है जातिगत श्रेष्ठता का बोध रखने वालों की एक बड़ी संख्या है जिनका जिक्र स्वामी दीपांकर कर रहे हैं.

Durga_Temple_File photo

वे कहते हैं कि साधना का हक सबको है लेकिन पुजारियों की सत्ता पर सिर्फ ब्राह्मणों का हक है. उन्होंने कहा, 'ब्राहणों के पास इसके अलावा बचा ही क्या है. अगर आप उससे यह अधिकार भी छीन लेंगे तो वह क्या करेगा? वह प्रतिवाद करेगा.' पुजारियों की सत्ता पर ब्राह्मणों के दावे को वह एक मिथक से सही साबित करने की कोशिश करते हैं, 'ब्राह्मण पुजारी इसलिए क्योंकि इसको पूजना श्रीकृष्ण का मुख पूजने जैसा है.' 

संविधान और श्रीकृष्ण की सत्ता में टकराव के मामले में दीपांकर साफ कहते हैं कि 'वह श्रीकृष्ण को तरजीह देंगे न कि संविधान को.' 

अक्टूबर महीने में ही उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में एक 90 साल के दलित व्यक्ति की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि वह अपनी पत्नी, बेटे और भाई के साथ मंदिर में घुसने की कोशिश कर रहा था. संजय तिवारी नामक व्यक्ति ने उन पर कुल्हाड़ी से हमला कर उन्हें आग के हवाले कर दिया. 

गुजरात के द्वारका मंदिर में प्रवेश के दौरान पूर्व मंत्री कुमारी शैलजा से जाति पूछे जाने के मुद्दे पर संसद में जबरदस्त हंगामा हुआ

कर्नाटक में दो नवंबर को दुटरागांव में एक दलित को मंदिर में जाने से रोक दिया गया वहीं करीब दो महीने पहले उत्तर भारत में देहरादून के गोबला गांव में दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं दिए जाने की खबर सामने आने पर बहुजन समाज पार्टी ने विरोध प्रदर्शन किया. 

इतना ही नहीं राहुल गांधी और कुमारी शैलजा से लेकर असम के मुख्यमंत्री तरुण गगोई तक ने यह दावा किया कि उन्हें मंदिरों में प्रवेश करने से रोका गया.

यूपीए सरकार में मंत्री रह चुकीं कुमारी शैलजा ने कहा कि गुजरात के द्वारका मंदिर में प्रवेश के दौरान उनसे उनकी जाति के बारे में पूछा गया. कुमारी शैलजा के बयान को लेकर राज्यसभा में जबरदस्त हंगामा भी हुआ.

विश्व हिंदू परिषद के सुरिंदर जैन को ये घटनाएं अपवाद नजर आती हैं और कुमारी शैलजा और राहुल गांधी झूठे. यह सभी घटनाएं 2015 की है जब देश ने हाल ही में संविधान निर्माता भीमराव आंबेडकर औऱ उनके बनाए धर्म निरपेक्ष संविधान को याद किया है. जिन्होंने जाति व्यवस्था को हिंदू धर्म की बीमारी बताते हुए बौद्ध धर्म अपना लिया था.  

जैन कहते हैं कि विश्व हिंदू परिषद ने 'पुरोहित्व' की काबिलियत रखने वाले पिछड़ी जातियों के लोगों को भी पुरोहित बनाया है. उन्होंने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट का फैसला विरोधाभासी लगता है लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं. फैसले ने धार्मिक प्रक्रिया को मान्यता दी है.' वह बताते हैं, 'मीनाक्षी मंदिर के मामले में कोर्ट का फैसला आगम को मान्यता देता है.' 

नहीं बदलेंगे हालात

देश के कई मंदिर ऐसे हैं जहां ब्राह्मणों के एक खास समुदाय को ही पुजारी बनाए जाने की परंपरा है. मसलन तिरुपति का पुजारी एक खास ब्राह्मण उपजाति का होता है. इस भेदभाव को लेकर पूछे जाने पर जैन बताते हैं, 'संविधान परंपराओं को मान्यता देता है और उसका उल्लंघन नहीं होना चाहिए. यह बात सुप्रीम कोर्ट भी मानता है.' 

कंवल भारती कहते हैं कि विश्व हिंदू परिषद के इस दावे में सच्चाई है. उन्होंने कई पिछड़े और गैर ब्राह्मणों को धर्म के दायरे में शामिल किया है लेकिन ऐसा तभी हुआ जब उन्होंने सनातनी परंपरा के आगे आत्मसमर्पण कर दिया. विवेकानंद का उल्लेख करते हुए वह बताते हैं कि जब उन्होंने अपनी मौलिक सोच के साथ आगे बढ़ना शुरू कर दिया तो ब्राह्मणों की तरफ से उनका पुरजोर विरोध हुआ. 

सभी धर्मों के पर्सनल लॉ को देखते हुए जमीनी स्तर पर इस तरह के फैसले से किसी बड़े बदलाव की उम्मीद बेमानी है

संविधान के अनुच्छेद 16(5) की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा कि मंदिर और अन्य धार्मिक संस्थानों में किसी व्यक्ति को पुजारी बनाए जाने की प्रक्रिया में किसी समुदाय विशेष केवल 'जाति, जन्म या किसी गैर संवैधानिक तरीकों' के आधार पर न तो विशेष छूट दी जा सकती है और नहीं किसी को बाहर किया जा सकता है. अदालत ने कहा किसी भी धार्मिक संस्थान में होने वाली नियुक्ति को तभी मंजूरी दी जा सकती है जब उसमें इस तरह का भेदभाव नहीं किया गया हो.

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने इस मामले में राजनीति की गुंजाइश का हवाला देते हुए कुछ भी कहने से मना कर दिया. तो क्या इस तरह के फैसलों से अलग-अलग धर्मों के निजी कानूनों की स्थिति खत्म होगी? भारती कहते हैं कि जमीनी स्तर पर ऐसा कुछ नहीं होगा. उन्होंने कहा, 'जब किसी मामले में इस तरह का फैसला आता तो दूसरे धर्म के गुरू इस पर चुप्पी साध लेते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि समान नागरिक संहिता के मामले में सबको कुछ न कुछ खोना पड़ेगा.' 

दलितों के मंदिरों में जाने के खिलाफ विचार रखने वाले भारती ने कहा कि कोर्ट ने यह फैसला अपने कानूनी दायरे में दिया है जिसमें सभी को एक समान समझा जाता है. लेकिन सच्चाई यह है कि सभी धर्मों का अपना पर्सनल लॉ है और इस तरह के फैसलों पर उनके बीच एक आपसी सहमति होती है.

First published: 19 December 2015, 7:28 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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