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ओआईसी तो कम से कम कश्मीर की बात न ही करे तो बेहतर

सादिक़ नक़वी | Updated on: 27 September 2016, 4:47 IST
QUICK PILL
  • पाकिस्तान के बाद अब ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन भी कश्मीरियों के मुद्दे पर टांग अड़ा रहा है.वहीं पाकिस्तान को अलग-थलग करने की अपनी योजना के तहत भारत तेजी से ओआईसी के सदस्य देशों तक पहुंच बना रहा है.

ओआईसी ने हाल ही फिर से कश्मीरियों के स्वायत्ता के अधिकार की वकालत की थी. सामरिक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है चूूंकि भारत का पाला ओआईसी से पड़ेगा ही, इसलिए इसे इस बहुपक्षीय समूह के बयान या प्रस्तावों को बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए. उनका तर्क है कि जब तक सदस्य देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध ठीक चल रहे हैं, इस तरह के प्रस्तावों से ज्यादा नुकसान नहीं होगा, भले ही पाकिस्तान लगातार इस तरह की कूटनीतिक चालें चलता रहता है.

दरअसल, भारत के सऊदी अरब, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के साथ अच्छे रणनीतिक संबंध हैं, जबकि ओआईसी बड़े पैमाने पर कुछ देशों के खतरनाक सांप्रदायिक एजेंडे की वजह से बंटा हुआ है. साथ ही विशेषज्ञों का तर्क है कि मध्य पूर्व के गंभीर हालात के चलते ओआईसी के लिए अपने ही नजदीकी मसलों से निपटना मुश्किल हो रहा है.

ओआईसी के महासचिव इयाद अली मदनी ने हाल ही में घाटी के हालात पर चिंता व्यक्त की और कश्मीर विवाद का समाधान ‘कश्मीरी जनता की इच्छानुसार’ तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुरूप करने का आह्वान किया. एक तरह से कश्मीर पर पाकिस्तानी रवैये को ही दोहराया। इससे पूर्व इस्लामाबाद के एक दौरे के दौरान मदनी ने कहा था, ‘हमें जनमत संग्रह का डर नहीं होना चाहिए.’

कश्मीर जाएगी टीम

ओआईसी स्वतंत्र मानवाधिकार आयोग के वर्तमान मुखिया तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप ताईपे एर्दाेगन और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच हुई एक बैठक के बाद तुर्की ने कहा कि संगठन कश्मीर में एक तथ्यान्वेषी टीम भेजेगा. भारत न तो इसकी सराहना करेगा और न ही शायद इसकी इजाजत देगा. ओआईसी के विदेश मंत्रियों ने भी संगठन के स्वतंत्र स्थायी मानवाधिकार आयोग को कहा है कि वह मंत्रिपरिषद के अगले सत्र में कश्मीर के हालात पर रिपोर्ट प्रस्तुत करे.

पाकिस्तान को अलग-थलग करने की अपनी योजना के तहत भारत तेजी से ओआईसी के सदस्य देशों तक पहुंच बना रहा है। उरी हमले के बाद से, राजनयिक एड़ी चोटी का जोर लगाते हुए लगातार ओआईसी के सदस्य देशों से फोन पर सम्पर्क करने की कोशिशों में लगे हैं ताकि हमले पर उनसे पाक की निंदा वाले वक्तव्य ले सकें. संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर आतंकवाद के खिलाफ भारतीय कार्रवाई का समर्थन किया जबकि कतर ने इसे एक आपराधिक कृत्य बताया. अरसे से पाकिस्तान के एक प्रमुख सहयोगी रहे सउदी अरब ने भी हमले की निंदा करते हुए इसे आतंकी कार्रवाई बताया.

तुर्की का रुख़ पाकिस्तान की तरफ?

भारत दुनिया में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देशों में से एक है, और यह सवाल उठता रहता है कि इसे ओआईसी में शामिल करना चाहिए या नहीं। 2012 में जयपुर में तत्कालीन केंद्र सरकार की अग्रणी पार्टी कांग्रेस के चिंतन शिविर में इस सवाल को यह कहकर टाल दिया गया कि यह देश की धर्मनिरपेक्ष नीतियों के अनुरूप नहीं है.

जहां तक कश्मीर पर तुर्की के रुख का सवाल है, यह विचाराधीन रखा जाना चाहिए। तुर्की, जहां हाल ही हुई तख्तापलट की कोशिश को नाकाम कर दिया गया, पाकिस्तान का महत्वपूर्ण सहयोगी है और इनके बीच आपस में सैन्य सहयोग के रिश्ते हैं, इस मसले पर उलझा हुआ लगता है, क्योंकि यह भारत के साथ रिश्ते बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

कुछ समय पूर्व, भारत की एनएसजी सदस्यता के सवाल पर तुर्की ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान के आवेदनों को नत्थी किया जाए हालांकि पाकिस्तान के आवेदन पर चर्चा नहीं होनी थी. इससे समूह में भारत के प्रवेश के अवसरों को झटका लगा था. तुर्की के विदेश मंत्री ने औपचारिकता के नाते उरी हमले पर एक बयान जारी किया था, जिसमें कुछ खास नहीं कहा गया.

आलोचना

भारतीय सामरिक मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, ओआईसी एक बेकार बहुपक्षीय समूह है, जो धर्मनिरपेक्ष अरब लीग का एक विकल्प कहा जा सकता है, जो कि मुस्लिम उम्मा के चुनिंदा मुद्दों को उठाता है. यद्यपि कश्मीर इसके लिए यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है, वहीं संगठन ने फिलीस्तीन के मुद्दे पर कुछ खास नहीं किया है. इसके अलावा, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जरूर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ बोल रहे हैं. दूसरा, यह कि सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान और तुर्की सहित सदस्य देश, मध्य पूर्व में आपसी संघर्ष में उलझे हैं लेकिन ओआईसी अपने अपराधों को नजरंदाज कर अपनी सुविधा से मुद्दे चुनता है।

इस साल के शुरू में, आयोजित संगठन के 13 वें शिखर सम्मेलन में यह तथ्य प्रमुख रूप से उबर कर सामने आया कि ओआईसी सऊदी विदेश नीति का एक मोहरा है, जब इसने आतंकवाद का समर्थन करने के लिए ईरान का विरोध किया और इस तरह सीरिया और यमन जैसे देशों के आंतरिक मामलों में दखल दिया. सउदी, का ऐसा करना चकित करने वाला है, जो खुद सीरिया और यमन में गड़बड़ियां करता रहता है.

तुर्की के दबाव में ओआईसी ने फतेउल्लाह गुलेन के हिजमत को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया जबकि मिस्र ने इस कदम का विरोध किया था। एर्दोगन ने हाल ही तख्तापलट की कोशिश के लिए भी गुलेन के हिजमत को दोषी ठहराया और ऐसा करके विरोध के सारे स्वरों को दबा दिया.

बलूचिस्तान, पाकिस्तान में निर्वासन में रह रहे कुछ लोगों ने सवाल उठाया है कि कश्मीरियों की तरह ओआईसी कभी उन्हें अपने सम्मेलनों के लिए क्यों नहीं आमंत्रित करता है. बीआरपी के एक नेता ने ट्विटर पर सवाल किया कि अगर ओआईसी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता है तो बलूच भी मुसलमान हैं. यूएनजीए 71 बैठक में बलोच नेताओं को क्यों नहीं आमंत्रित किया गया?

First published: 27 September 2016, 4:47 IST
 
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