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दो साल भगवाराज: संघ अब मोदी के पीछे नहीं, साथ-साथ चल रहा है

पाणिनि आनंद | Updated on: 18 May 2016, 8:23 IST

जब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने की बात चल रही थी तो भारतीय जनता पार्टी के साथ साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतरखाने भी हलचल मची हुई थी. एक खेमे को लग रहा था कि मोदी का अतिमहात्वाकांक्षी और आत्मकेंद्रित व्यक्तित्व संघ के साथ कदमताल में उल्टा बैठता है तो दूसरे का मानना था कि संघ के लिए जो काम महत्वपूर्ण हैं उन्हें करने के लिए सत्ता में जगह बनना ज़रूरी है फिर भले ही वो मोदी के माध्यम से ही क्यों न हो. 

इस उहापोह के बीच मोदी सितंबर 2013 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने. उन्होंने अपने प्रचार के दम पर और संघ की मदद से चुनाव जीता.

जीत की ऐतिहासिकता ने मोदी को पहले से भी कहीं बड़ा बनाकर खड़ा किया. सरकार ही नहीं, भाजपा भी मोदीमय हो चुकी थी. कोपभवन में जाते वरिष्ठों को घर में ही समर्थन नहीं मिल रहा था. मोदी अब अपने कुनबे में सर्वशक्तिमान थे. मोदी ने इस दौरान राज्यों में भी एक के बाद एक जीत हासिल की. 

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महाराष्ट्र और हरियाणा इसके बड़े उदाहरण बने. कश्मीर एक बड़ी उलपब्धि बना. मोदी और मज़बूत हो गए. अब वो किसी के निर्देश के प्रति बाध्य नहीं थे. वो आगे, सब उनके पीछे. सत्ता के शीर्ष पर मोदी थे. साथ में उनके विश्वासपात्र.

पीछे पीछे संघ अपने एजेंडे के साथ आगे बढ़ रहा था. संघ के लिए अब सत्ता अपने सांस्कृतिक सुधार वाले एजेंडे का माध्यम थी और मोदी उसकी सीढ़ी. यह सब दो तरीकों से किया जाना था. पहला तो यह कि संघ अपने स्तर पर अपने एजेंडे को लेकर आगे बढ़े. 

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दूसरा यह कि संघ के लिए मोदी और उनकी सरकार रास्ता तैयार करे. संघ की ओर से सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल को भाजपा के साथ संयोजन का दायित्व दिया गया. राम माधव को संघ से मुक्त करके भाजपा में भेजा गया और संघ ने मोदी के मार्गदर्शक की भूमिका संभाल ली.

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दूसरा काम कठिन था लेकिन मोदी को यह अच्छे से पता था कि भाजपा में अपने विरोधियों को साधने के लिए संघ को खुश रखना ज़रूरी है. इसीलिए मोदी ने अपने एजेंडे के साथ संघ को संतुष्ट रखने के प्रयास किए और उन्हें इसका लाभ भी मिला. मोदी की आज की ताकत की सबसे बड़ी वजह यह है कि भाजपा में बढ़ता असंतोष भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा क्योंकि अबतक कम से कम संघ को उनसे कोई शिकायत नहीं है. 

बल्कि मोदी के सत्ता में रहने का सबसे ज़्यादा लाभ फिलहाल संघ को मिलता दिख रहा है. संघ और मोदी एक दूसरे के पूरक की तरह काम करते नज़र आ रहे हैं और इसलिए अगर किसी छिटपुट विषय पर मतभेद हो भी, तब भी संघ और मोदी एक दूसरे के रास्ते में नहीं आते. बल्कि एक दूसरे को सहारा देते हैं.

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मोदी और संघ के इस दो वर्ष के सफर में सबसे ज़्यादा फायदे में संघ ही रहा है. कम से कम संघ की वर्तमान ज़रूरत मोदी के शासन में पूरी होती दिखाई दे रही हैं. संघ से जुड़े एक वरिष्ठ इसे समझाते हैं, "मोदी ने अबतक संघ को सुना ही है. कभी कुछ कहा नहीं. 

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मोदी को पता है कि संघ जैसा अनुशासन और प्रतिबद्धता उन्हें और कहीं नहीं मिल सकती. संघ सरकार का एजेंडा नहीं चला रहा, अपने एजेंडे पर काम कर रहा है. इसमें सरकार के होने से कुछ चीज़ें अनुकूल हो जाती हैं. लेकिन सत्ता हमारी निर्भरता नहीं है. हम सत्ता में हो न हों, सांस्कृतिक जागरण और सुधार का काम जारी रहता है.”

हालांकि कुनबे के कुछ पुराने क्षुब्ध इसे दूसरी तरह से भी देखते हैं. "संघ की खामोशी समझ से परे है. आर्थिक नीतियों से लेकर स्वदेशी तक और गंगा गायत्री के सवाल पर भी हम जो सोचते हैं, वैसा कुछ तो नहीं हो रहा. फिर कैसे मान लें कि संघ या किसी भी राष्ट्रवादी हिंदुत्ववादी संगठन को इससे लाभ मिला है”.

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दरअसल, मोदी अपनी सार्वजनिक छवि से लेकर कामकाज तक संघ को खुश रखते नज़र आए हैं. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता समझाते हैं, "मोदी से पहले क्या किसी नेता को हर विदेश दौरे में मंदिर जाते और तिलक लगाते देखा है. इससे पहले भी भाजपा की सरकार थी लेकिन यह गौरव मोदी के समय में हासिल हुआ है. यह मोदी के पक्ष में काम करता है. यह संघ को भी भाता है और हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं, समर्थकों को भी”.

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दूसरी ओर संघ और अन्य अनुशांगिक संगठन अपने एजेंडे को लेकर आगे बढ़ रहे हैं. भाजपा के नेता उसमें सुर मिलाते दिख रहे हैं. मामला गौवंश का हो, पाठ्यक्रमों में बदलाव का हो, योग का हो, संस्कृत का हो, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों में अपने लोगों की नियुक्ति का हो, संघ कई मोर्चों पर सीधे लाभान्वित होता दिख रहा है. 

दादरी से लेकर रोहित वेमुला तक के मामले में हिंदुत्ववादियों के खिलाफ कोई भी कठिन कदम नहीं उठाया गया है. सरकार वाम के पुराने गढ़ों को हिला रही है और उनके प्रतिकूल प्रचार कर पाने में सक्षम रही है.

सत्ता की शक्ति और संघ का समर्थन

मोदी गंगा की बात कर रहे हैं. अंबेडकर और ज्योतिबा को अपना बता रहे हैं. पटेल की प्रतिमा लगा रहे हैं. गांधी के स्वच्छता के नारे को अपना नारा बना रहे हैं. हिंदू आतंकवाद जैसे शब्दों को खारिज किया जा रहा है. एजेंसियां ऐसे संगठनों के प्रति लचीली नज़र आ रही हैं. संघ से आए लोगों को मुख्यमंत्री बनाया गया. उन्हें अहम ज़िम्मेदारियां दी जा रही हैं. यह सब संघ के अनुकूल जाता है. 

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अंबेडकर, गांधी, पटेल को अपने में शामिल करने का लाभ मोदी को भी है और संघ को भी. संघ अनुकूल लोगों की नियुक्ति और चयन संगठन को खुश रखते हैं. बौद्ध मतावलंबी देशों के साथ बेहतर संबंध मोदी का भी एजेंडा हैं और संघ का भी. मोदी को इससे बड़ी स्वीकारोक्ति मिलती है, संघ को बड़ी ताकत.

मोदी को बदले में संघ का समर्थन और सांगठनिक सहयोग मिल रहा है. आज स्थिति यह है कि मोदी को राज्यों में चुनावों से लेकर अपने प्रचार और बचाव तक भाजपा से ज़्यादा संघ से उम्मीद रहती है और संघ उनकी इस उम्मीद पर खरा भी उतरता है. 

मोदी के लिए उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी जो चुनौती है, उससे निपटने के लिए मोदी भाजपा के संगठन से ज़्यादा संघ के संगठन और प्रबंधन पर भरोसा करते हैं और ऐसा करना उनकी मजबूरी भी है.

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मोदी की ताकत का रथ दो पहियों पर चल रहा है- सत्ता की शक्ति और संघ का समर्थन. कम से कम मोदी को अपने शासन कौशल पर कोई संदेह नहीं है. उन्हें खुद निर्णय लेने की आदत है और खुद पर ही भरोसा करने का स्वभाव. भाजपा में मोदी को निष्ठा कम, असुरक्षा ज़्यादा दिखती है. 

उसी तरह से भाजपा में भी लोगों को मोदी से डर ज्यादा लगता है, भरोसा कम. भाजपा का संकट यह है कि पार्टी के नेता मोदी या किसी नेता से तो लड़ सकते हैं लेकिन संघ से नहीं. इसीलिए मोदी ने अपनी प्राथमिकता में संघ को रखा है, भाजपा को नहीं.

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संघ के खुश रहने तक और समर्थन मिलने तक मोदी आश्वस्त हैं. वो अपना काम कर रहे हैं. संघ अपना काम कर रहा है. संघ के पास अपना हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी एजेंडा है. मोदी उदार नेता की छवि बनाने में लगे हैं और विकास की बात कर रहे हैं. दोनों एक दूसरे के रास्ते में नहीं हैं. न एक दूसरे के पीछे. दोनों अपने अपने लोगों को अपने अपने तरीके से साध रहे हैं.

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मोदी के पीछे चलकर शुरुआत करनेवाला संघ आज मोदी के साथ साथ चलता नज़र आ रहा है. फिलहाल दोनों एक दूसरे की ताकत हैं. दोनों के पैरों में पदवेश अलग अलग दिख सकते हैं. लेकिन दोनों एक जैसे निशान छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे हैं.

First published: 18 May 2016, 8:23 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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