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आईएस: एनआरआई बने भारत की सुरक्षा के लिए खतरा?

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 1 December 2015, 11:46 IST
QUICK PILL
  • पेरिस हमले के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के राडार पर अप्रवासी भारतीय. इस्लामिक आतंकवादियों के जाल में फंसने की सबसे अधिक आशंका.
  • भारतीय सुरक्षा एजेंसिया कई नौजवानों पर रख रही हैं नज़र. प्रभावित नौजवानों को समझाने के लिए मनोवैज्ञानिकों और धर्मगुरुओं की मदद ली जा रही है.

पेरिस हमले ने दुनियाभर में कट्टरपंथी आतंकवाद की नई सिहरन पैदा कर दी है. पश्चिम समेत दुनिया के ज्यादातर देश हाईअलर्ट पर हैं. इस खतरे का असर भारत पर भी मंडरा रहा है. बीते कुछ महीनों में भारतीय युवाओं के आईएस से जुड़ने और सीरिया जाने की खबरों ने इस खतरे को बढ़ा दिया है.

भारतीय खुफिया एजेंसियों के मुताबिक इस समय करीब 23 भारतीय युवा सीरिया में इस्लामिक स्टेट के साथ लड़ रहे हैं. एक युवक की मौत भी हो चुकी है. अनाधिकारिक आंकड़ा और बड़ा हो सकता है. भारत पर आतंकी खतरे की संभावना तब और भी बढ़ जाती है जब कि पेरिस में हुआ हमला मुंबई में हुए 26/11 हमले की तर्ज पर हुआ है.

भारत लंबे समय से पाकिस्तान समर्थित इस्लामिक आतंकी समूहों के निशाने पर रहा है. पेरिस जैसे बड़े हमले का भारत और दुनिया के सुरक्षा परिदृश्य पर कई प्रभाव हो सकते हैं, मसलन दुनिया भर में फैले छोटे-छोटे कट्टरपंथी समूहों को और ज्यादा हमले करने की प्रेरणा मिल सकती है, आईएसआईएस, लश्कर, अल कायदा जैसे संगठनों में नए रंगरूटों की भर्ती की होड़ लग सकती है.

भारत में इस तरह की चिंताएं अतीत में सच भी साबित हुई है. जब भी आतंकी हमले हुए हैं, लश्कर और हिज्बुल में बड़ी संख्या में नए लोग शामिल हुए हैं.

आईबी के एक अधिकारी बताते हैं, “अब तक आईएस अपनी गतिविधियां सीरिया और इराक के आस-पास चला रहा था. ऐसा पहली बार हुआ है जब इतने बड़े पैमाने पर अपने सुरक्षित दायरे से बाहर निकल कर आईएस ने इतने बड़े हमले को अंजाम दिया है. जाहिर है यह घटना दुनिया भर में कट्टरपंथी संगठनों में नई जान फूंकने का काम करेगी. कट्टरपंथी संगठन इस मौके का फायदा उठाने की कोशिश करेंगे. भारत भी अब इससे अछूता नहीं है इसलिए हम बेहद सतर्क होकर दिन प्रतिदिन की घटनाओं पर नजर रख रहे हैं.”

आईबी और रॉ के स्तर पर देश के भीतर से लेकर विदेशों तक सरगर्मी बढ़ी हुई है

दरअसल पेरिस में हुआ हमला और भारत के युवाओं का आईएस की ओर झुकाव, इन दोनों के मेल ने भारत की आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा रखे हैं. पेरिस हमले के बाद सभी सुरक्षा एजेंसियां जिनमें आईबी, रॉ और एनआईए आदि आते हैं, की सक्रियता बढ़ गई है.

आईबी सूत्र के मुताबिक देश के भीतर और बाहर खुफिया तंत्र को अति सक्रिय कर दिया गया है, ताकि भारत पर किसी तरह के हमले को रोका जा सके. इसके अलावा उन तमाम सुरक्षा योजनाओं पर भी एक बार फिर से विचार शुरू हो चुका है जिन्हें 2008 के मुंबई हमले के बाद तैयार किया गया था, पर लागू नहीं किया जा सका.

आईबी और रॉ के स्तर पर देश के भीतर से लेकर विदेशों तक सरगर्मी बढ़ी हुई है. पेरिस हमले के फौरन बाद गृह मंत्रालय ने टेरर फंडिंग पर सेंट्रल डेटाबेस बनाने का महत्वपूर्ण फैसला भी किया है. 

आईबी का टेक्निकल सर्विलांस पर जोर

संभवत: 2008 के बाद भारतीय खुफिया ब्यूरो के लिए यह सबसे कठिन समय है, विशेषकर देश के अंदर और बाहर दोनों जगह काम करने वाले आधिकारियों के लिए. एजेंसी उन लोगों पर तो नजर रख रही है जो भारत में हैं और आईएस के प्रति हमदर्दी रखते हैं. लेकिन असल समस्या कहीं और छुपी है. 

इस्लामिक स्टेट की निगाह उन भारतीयों पर टिकी हुई है जो विदेशों में नौकरी आदि कर रहे हैं. यूरोप और अरब के तमाम देशों में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं. इस समूह के आईएस के चंगुल में फंसने की संभावना बहुत अधिक है. पूर्व आईबी चीफ सैय्यद आसिफ इब्राहिम से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक अप्रवासी भारतीयों पर मंडरा रहे इस संकट पर सार्वजनिक चिंता जाहिर कर चुके हैं. भारत आईएस की योजना में बहुत खास स्थान रखता है.  

भारत एक हद तक अपने यहां से आईएस लड़ाकों की भर्ती को रोकने में सफल रहा है लेकिन आईएस की रिक्रूटमेंट स्ट्रैटजी भी कम प्रभावशाली नहीं है. भारत के मुकाबले वह अप्रवासी भारतीयों की बहकाने में कामयाब रहा है. खुफिया एक्सपर्ट जयदेव रानाडे के मुताबिक साइबर कम्यूनिकेशन के दौर में इस्लामिक स्टेट की वीडियो अपील और वेबसाइट के जरिए भर्ती की रणनीति कामयाब हुई है.

हालांकि आईबी के पूर्व निदेशक अरुण भगत कहते हैं कि चुनौती बड़ी होने के बावजूद एजेंसियों का काम पहले से आसान हुआ है. कुवैत, कतर, यूएई जैसे मुल्कों के साथ सूचनाएं साझा करने का तालमेल पहले से बेहतर हुआ है. नए समझौतों से राहत मिली है. पहले ये संगठन खुद को आतंक के खतरे से महफूज समझते थे, लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह से अरब के देशों में आतंकवाद फैला है उसने तमाम अरब देशों को बाकी दुनिया से तालमेल बिठाने के लिए मजबूर किया है.

इंडियन डायस्पोरा का रेडिकलाइजेशन

कुछ आंकड़ों से मामले की गंभीरता को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. 2012-13 में आई अप्रवासी मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट बताती है कि इराक में सिर्फ 18,000 भारतीय रह रहे थे. जबकि 17 मई, 2010 को आयी इराक बिजनेस न्यूज़ की एक रिपोर्ट कुछ और ही कहानी बयान करती है. रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 50,000 भारतीय कामगार इराक में काम कर रहे थे. इनमें से बड़ी संख्या में लोग कुवैत और यूएई के रास्ते इराक पहुंचे थे. इसकी वजह ये थी कि भारत ने 2004 से 2010 के बीच खाड़ी युद्ध और अस्थिरता के चलते नए लोगों के इराक जाने पर रोक लगा दी थी. लिहाजा अप्रवासी मंत्रालय के आंकड़े जो कह रहे हैं उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. 

भारत सरकार आईएस समर्थकों के प्रति बहुत सतर्क रवैया अपना रही है. अब तक अरीब मजीद, अफशां ज़बीं और मेंहदी मसरूर बिस्वास के खिलाफ ही कानूनी प्रक्रिया चल रही है. 

जितने भी युवकों में अब तक आईएस के प्रति हमदर्दी देखने को मिली है उनकी काउंसिलिंग करके उनपर बारीकी से नजर रखी जा रही है

अरीब मजीद के कट्टरपंथियों से जुड़ने पर उनके वकील वहाब ख़ान ने कैच को बताया, "वो एक आम मुस्लिम नौजवान है जैसे किसी दूसरे घर का मुस्लिम बच्चा होता है. उसके मां-पिता ने बड़ी उम्मीदों से पाला, बड़ा किया और पढ़ाया था लेकिन वह हालात का शिकार हो गया."

वहाब खान कहते हैं, "फिलहाल एनआइए ने उससे पूछताछ पूरा कर लिया है और चार्जशीट भी दाख़िल कर दी है. उसकी रिहाई के लिए मैंने भी ज़मानत अर्ज़ी लगा रखी है."

जितने भी युवकों में अब तक आईएस के प्रति हमदर्दी देखने को मिली है उनकी काउंसिलिंग करके उनपर बारीकी से नजर रखी जा रही है. मगर पूर्व निदेशक अरुण भगत कहते हैं कि सिर्फ खुफिया एजेंसियां इनपर निगरानी नहीं रख सकतीं. ऐसे मौकों पर समाज और परिवार की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है. उन्हें पता होता है कि उनके बच्चे कहां जा रहे हैं और किससे संपर्क रख रहे हैं.

इस्लामिक स्टेट के खिलाफ भारतीय धार्मिक गुरुओं की तरफ से आए फतवे और हैदराबाद में हुए विरोध प्रदर्शनों को अरुण भगत बहुत अहम कड़ी मानते हैं. वह कहते हैं कि भीतर से आवाज उठने पर अतिवादी संगठनों के प्रति हमदर्दी रखने वाले युवाओं का मन बदलता. वह खुद से सवाल करने लगता है कि अगर वह सही है तो उसके समाज के लोग सड़क पर क्यों उतर रहे हैं? अरुण भगत के मुताबिक अगर इंटेलिजेंस, पुलिस और कम्युनिटी के बीच तालमेल और बढ़ाया जाए तो स्थानीय स्तर पर होने वाली आतंक की सुगबुगाहट को टाला जा सकता है.

अतीत में भी बेंगलुरु और हैदराबाद आईएम और सिमी के बड़े केंद्र के रूप में बदनाम हुए थे

आईएस के प्रति झुकाव की दूसरी वजह मौजूदा सरकार में अल्पसंख्यकों के प्रति नकारात्मक रवैया रखने वालों की बहुलता है. इसके खिलाफ देश और दुनिया में जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई है. असहिष्णुता को लेकर बहस छिड़ी हुई है. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी सरकार की किरकिरी हो रही है. इससे सरकार दबाव में है. खुफिया एजेंसियों को उस तरह खुलेआम लोगों की धरपकड़ करने की छूट नहीं मिल पा रही है, जैसी 2008 के आस-पास देखने को मिलती थी. 

सिर्फ शक के आधार पर बड़ी संख्या में पकड़े गए मुस्लिम युवकों को कोर्ट द्वारा बरी करने से भी एजेंसियां सतर्क होकर काम कर रही हैं. जब तक पूरी तरह से पुख्ता न हो जाय, एजेंसियां किसी पर हाथ नहीं डाल रही. हालांकि एनआईए का नजरिया एकदम अलग है.

एनआईए के एक अधिकारी के मुताबिक समस्या को शुरुआत में ही खत्म करने की जरूरत है. इसके लिए लोगों को सजा देनी हो तो हमें पीछे नहीं हटना चाहिए. इससे आईएस के प्रति हमदर्दी रखने वालों में भय का संदेश जाएगा. गृहमंत्रालय इस विकल्प पर लंबे समय से विचार कर रहा है. 

पूर्व नौकरशाह और सुरक्षा विशेषज्ञ जयदेव रानाडे के मुताबिक इस्लामिक स्टेट से जुड़ने वाले युवाओं में सिर्फ गरीब और अनपढ़ ही नहीं है. पढ़े-लिखे और अमीर युवा भी खिलाफत या अंतरराष्ट्रीय जिहाद का हिस्सा बनने के लिए आईएस के अभियान से जुड़ना चाहते हैं. इनमें बड़ी संख्या उन युवाओं की है जो रोजी-रोटी की तलाश में विदेशों में रहते हैं. मगर राहत यह है कि ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप के मुस्लिम युवा जिस रफ़्तार से कट्टरपंथ की तरफ़ बढ़ रहे हैं, उसके मुक़ाबले भारत में यह आंकड़ा कम है. 

कम पढ़े लिखे भारतीय धार्मिक अतिवादियों का सबसे आसान शिकार बन गए हैं

भारत में किन्हीं वजहों से जो युवा पहले से रेडिकलाइज या सेमी रेडिकलाइज हैं, इंटलिजेंस एजेंसियां उनपर निगरानी बनाए हुए हैं. उनकी काउंसलिंग के लिए मनोवैज्ञानिकों से लेकर धार्मिक गुरुओं तक की मदद ली जा रही है. इससे बड़ी चुनौती खाड़ी देशों में रह रहे अप्रवासी भारतीयों की है जहां आईएस का प्रोपगैंडा वहां आसानी से फलफूल रहा है. 

आईबी अफसर के मुताबिक संदिग्धों के ईमेल, सोशल मीडिया अकाउंट आदि पर पैनी निगाह रखने के साथ ही ऐसे तमाम लोगों की शिनाख्त की गई है जो नियमित तौर पर अतिवादी संगठनों की वेबसाइटें खंगालते रहते हैं. ऐसे लोगों के मोबाइल फोन इंटर्सेप्ट करने के साथ ही मैनुअल निगरानी भी जारी है. अफसर का कहना है कि संदिग्ध पोस्टर और सीडी बनाने वाले, अवैध तरीके से रुपए जुटाने वाले और भड़काऊ उपदेश देने वाले धार्मिक गुरु भी राडार पर हैं. आईबी ने ऐसे 150 संदिग्धों की सूची गृह मंत्रालय को सौंपी है. 

पेरिस हमले के फौरन बाद आईबी की तरफ से लिखी गई चिट्ठी में भी ‘इंडियन डायस्पोरा’ की ओर से उत्पन्न चुनौतियों का जिक्र किया गया है. इसकी वजह अप्रवासी भारतीयों और आईएस के बीच लगातार उजागर होते मामले हैं. तकरीबन 70 लाख भारतीय खाड़ी और पश्चिम एशियाई देशों में फिलहाल रह रहे हैं. 

खाड़ी देशों में मोसाद और रॉ के सिक्रेट एजेंट्स एक्टिव

मिडिल ईस्ट मामलों के एक्सपर्ट कमर आग़ा कहते हैं, "अतिवादी धार्मिक गुरुओं और संगठनों के लिए खाड़ी देशों में अपना एजेंडा चलाना आसान है. जुमे की नमाज में दिए जाने वाले उन्मादी उपदेश से युवा बहकते हैं. इनका शुरुआती रुझान जमात या अतिवादी विचार तक सीमित होता है मगर चरमपंथ की दुनिया में दाखिल होने का दरवाजा भी यहीं से खुलता है.” आईएस से जुड़ रहे भारतीय नौजवानों पर ऐसे उन्मादी गुरुओं और संगठनों की छाप साफ दिखती है.

खाड़ी के देशों में रोजी-रोटी की तलाश में गए ज्यादातर लोग मजदूर और अकुशल कामगार हैं. हर शुक्रवार को होने वाले बिना किसी रोकटोक के धार्मिक गुरुओं के अतिवादी भाषण इनके मन पर बुरा असर डाल रहे हैं. कम पढ़े लिखे भारतीय धार्मिक अतिवादियों का सबसे आसान शिकार बन गए हैं. 

अतिवादी धर्मगुरुओं के भाषणों का असर

रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के एक अफसर कहते हैं कि विदेशी जमीन पर अतिवाद का शिकार हो रहे भारतीय नौजवानों को रोकना नए किस्म की चुनौती है. मगर इन देशों में मोसाद की गहरी पैठ है. नई सरकार में मोसाद और भारतीय खुफिया एजेंसी के साथ बेहतर तालमेल की शुरुआत हुई है. लिहाजा, संदिग्ध नौजवानों पर निगरानी आसान हुई है. जैसे ही ये युवा किसी संदिग्ध रूट पर निकलने की कोशिश करते हैं, उन्हें हिरासत में लेने की कोशिश की जाती है. 

खाड़ी और पश्चिम एशियाई देशों के बीच खुफिया सूचनाएं साझा करने करने के लिए भारत एक मजबूत नेटवर्क भी तैयार कर रहा है. यूएई की तरफ से भेजी गई आईएस की संदिग्ध अफशां ज़बीं उसी की एक बानगी हैं.

इस संबंध में देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने नवंबर के तीसरे हफ्ते में एक अहम मीटिंग भी की है. इस मीटिंग में खाड़ी समेत तमाम दूसरे देशों में रह रहे भारतीयों को इस्लामिक स्टेट के असर से बचाने के उपायों पर चर्चा हुई.

जयदेव रानाडे के मुताबिक रॉ समेत सभी इंटलिजेंस एजेंसियं यह मॉनिटर कर रही हैं कि प्रभावित युवा किस पैमाने पर इनकी गिरफ्त में हैं. एजेंसियां सीधे उन स्रोतों पर भी हमलावर होने की तैयारी में हैं जहां से युवाओं के ज़हन को जहरीला बनाने का खेल चल रहा है.

खुद नहीं आएंगे आईएस के लड़ाके

अभी तक इंटलिजेंस ब्यूरो के पास ऐसा कोई इनपुट नहीं है कि मुस्लिम युवा भारत में इस्लामिक स्टेट की जमीन बनाने की कोशिश में हैं. आईएस की तरफ से संघर्ष करने के लिए सभी भारतीय संदिग्धों ने अभी तक सीरिया और ईराक का रुख किया है.

बावजूद इसके खुफिया एजेंसियां भारतीय युवाओं को हर कीमत पर कट्टरपंथी होने से रोकना चाहती हैं. रानाडे कहते हैं कि हमारी इंटलिजेंस एजेंसियों का इन्फ्रास्ट्रक्चर बहुत समृद्ध नहीं है. लिहाजा, स्टेट गवर्नमेंट को अपने सर्किल का इंटलिजेंस नेटवर्क मज़बूत करना ही होगा. लोकल इंटलिजेंस यूनिट अतिवादी तत्वों पर नजर रखने में कारगर हो सकती हैं. 

वरिष्ठ पत्रकार और पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ कमर आग़ा कहते हैं कि किसी बड़े आतंकी हमले के लिए फौज भेजने की जरूरत नहीं पड़ती. फ्रांस में आईएस के लड़ाके खुद नहीं गए बल्कि रेडिकलाइज हो चुके एक दर्जन स्थानीय बाशिंदों से हमला करवाया.

पूरे यूरोप में फ्रांस की खुफिया एजेंसी की साख है, बावजूद इसके 14 नवंबर के भयावह हमले को रोका नहीं जा सका. यही वजह है कि भारतीय एजेंसियां भी खासी चौकन्नी हैं. डर भी यही है कि कहीं अतिवाद के शिकार भारतीय नौजवान ऐसे हमले की साजिश में ना जुट जाएं.

हैदराबाद-बेंगलुरु हाई एलर्ट

भारत में आईएस की बढ़ती गतिविधियों के केंद्र में देश के दो दक्षिणी शहर सबसे ऊपर हैं. हैदराबाद और बेंगलुरु. इसके अलावा भी खुफिया एजेंसियां आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के कई शहरों पर पैनी नजर रख रही हैं. इसकी वजह ये है कि दक्षिण भारत के ये तीनों राज्य हाल के दिनों में आईएस से लगाव रखने वालों के गढ़ के रूप में उभरे हैं. इसके अलावा अतीत में भी बेंगलुरु और हैदराबाद आईएम और सिमी के बड़े केंद्र के रूप में बदनाम हुए थे.

भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान में जमे आतंकी संगठन हैं

हैदराबाद, कोच्चि, गुवाहाटी, लखनऊ और मुंबई में तैनात एनआईए की टीमें सभी संदिग्ध हलचलों पर सूचनाएं इकट्ठा कर किसी भी तरह की आतंकी हमले को टालने की कोशिश में हैं. एनआईए की टेरर फंडिंग एंड फेक करेंसी सेल (टीएफएफसी) यह भी पता लगा रही है कि किन-किन जगहों पर अवैध तरीकों से पैसे का लेन-देन किया जा रहा है.

पूर्व आईबी निदेशक अरुण भगत टेरर फंडिंग को छिन्न-भिन्न करने की मुहिम को बहुत जरूरी मानते हैं. वह कहते हैं कि इस्लामिक स्टेट के टार्गेट पर फिलहाल यूरोपीय देश हैं. सीधा संघर्ष उन्हीं के बीच चल रहा है. लगातार हो रहे हमलों से इस्लामिक स्टेट की जमीन सिकुड़ती जा रही है. ऐसे में अगर टेरर फंडिंग पर भी लगाम कस दी जाए तो खाड़ी देशों से होने वाली भर्ती में भारी गिरावट आ जाएगी। 

सिमी और आईएम कितने मजबूत?

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल का दावा है कि इंडियन मुजाहिद्दीन के सभी बड़े आतंकी गिरफ्तार किए जा चुके हैं या फिर उन्होंने पड़ोसी देश में पनाह ले रखी है. सिमी की रीढ़ भी लगभग टूट चुकी है. लिहाजा, इस आशंका में बहुत दम नहीं है कि स्थानीय आतंकी समूह इस्लामिक स्टेट से गठजोड़ करके भारत पर हमला कर सकते हैं. अभी भी भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान में जमे आतंकी संगठन हैं.

नेपाल की सीमा आतंकियों का वीआईपी रूट

स्पेशल सर्विस ब्यूरो के खुफिया अधिकारी बताते हैं कि नेपाल की सीमा अब हमारे लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई है. दोनों देशों के बीच लगभग 18 सौ किलोमीटर लंबी सीमा है. यह पूरी तरह से खुली और अनियंत्रित है. अतीत में भी नेपाल के रास्ते का इस्तेमाल आतंकी करते रहे हैं. लेकिन फिलहाल नेपाल सीमा से जुड़ी चिंता ज्यादा गंभीर है. 

आज की तारीख में दोनों देशों के रिश्तों में वह विश्वास नहीं बचा है जैसा दशक भर पहले तक हुआ करता था. नेपाल में बदली सरकार और बदले संविधान के चलते दोनों देशों के बीच तनातनी बढ़ गई है. ऐसा मौका पहली बार आया है जब किसी नेपाली प्रधानमंत्री ने अपनी संप्रभुता को मुद्दा बनाते हुए भारत को कड़ी चेतावनी जारी की है.

खुफिया तंत्र के बीच नेपाल से लगी भारत की सीमा को आतंकियों का वीआईपी रूट भी कहा जाता है. बीते सालों में इसी रास्ते से यासीन भटकल, अब्दुल करीम टुंडा समेत कई बड़े आतंकियों को भारत लाया गया है.

बांग्लादेशी सीमा से खतरा घटा

नेपाल के विपरीत बांग्लादेश के साथ लगती सीमा पर फिलहाल राहत के संकेत हैं. आईबी के अधिकारी के मुताबिक बांग्लादेश की मौजूदा सरकार भारत सरकार के साथ पूरा तालमेल बनाकर काम कर रही है. दोनों सरकारों का मिजाज और एजेंडा आपस में मेल खाता है.

हालांकि चिंताएं वहां से भी बनी हुई हैं. हाल के दिनों में बांग्लादेश में स्थानीय स्तर पर कट्टरपंथ में इजाफा हुआ है. कई सारे उदारवादी लेखकों और ब्लॉगरों की हत्या की गई है. लेकिन सरकार की तरफ से भारत के साथ सहयोग बढ़ा है. कई सारे आतंकी कैंपों को उखाड़ा जा चुका हैं.

भारत-बांग्लादेश सीमा को पूरी तरह से सील कर दिया गया है लिहाजा वहां से आतंकियों के लिए घुसपैठ कर पाना फिलहाल मुश्किल हो गया है. बावजूद इसके असम, पश्चिम बंगाल और मेघालय की सीमा संवेदनशील है. अफसर गुजरात और महाराष्ट्र से लगी तटीय सीमा को भी चिंताजनक मानते हैं. उनका कहना है कि मुंबई हमले के बाद यहां कोस्टल राडार और सर्विलांस बनाए गए हैं लेकिन भारी ट्रैफिक होने के कारण यह इंतजाम  नाकाफी हैं.

First published: 1 December 2015, 11:46 IST
 
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