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सरकार के लिए हड़ताल का मतलब: धमकी और अनदेखी

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 8 September 2016, 7:30 IST
(पीटीआई)

नर्सेज किसी भी स्वास्थ्य केन्द्र की जीवनरेखा (लाइफलाइन) होती हैं. संकट के समय वे मरीज की निरन्तर देखभाल और परिश्रम करती हैं, किसी का भी जीवन बचाने के लिए उनकी यह सेवाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं.

यह देखते हुए उनकी वेतन बढ़ाने और भत्तों में संशोधन की यथोचित मांग को अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए. सरकार उनकी मांगों को मानने में लापरवाह है. बाहरी तौर से वह इन मांगों से इत्तेफाक भी रखती है.

गत दो सितम्बर को जब ऑल इंडिया गवर्नमेंट नर्सेज फेडरेशन (एआईजीएनएफ) के सदस्य हड़ताल पर चले गए तब सरकार ने तुरन्त ही हड़ताल को अवैध घोषित कर दिया और हड़ताल में भाग लेने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दे दी.

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दिल्ली सरकार के एक बयान में कहा गया था- 'नर्सों की हाजिरी रजिस्टर की जांच की जाएगी और जो नर्स अनुपस्थित पाई जाती हैं, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी. उनके खिलाफ आवश्यक सेवा बहाली अधिनियम (एस्मा) के तहत कार्रवाई की जाएगी जिसमें नर्सों को हिरासत में लेने, गिरफ्तारी से लेकर उनकी बर्खास्तगी तक कुछ भी हो सकता है.'

दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में, केन्द्र द्वारा संचालित अस्पतालों समेत, लगभग 20,000 नर्सेस हैं. नर्सों की इतनी भारी संख्या होने के बाद भी सरकार यूनियन के साथ बैठकर उनकी मांगों पर विचार-विमर्श नहीं कर सकी जबकि उन्होंने हड़ताल की चेतावनी पहले ही दे दी थी.

राष्ट्रीय राजधानी के अधिकांश डॉक्टरों ने स्टाफ कम होने की बात कही और हड़ताल को उत्तरदायित्व विहीन बता दिया.

हड़ताल के एक दिन बाद केन्द्र सरकार ने कहा कि महाराष्ट्र, दिल्ली और उप्र हड़ताल से आंशिक रूप से प्रभावित हुए हैं. दिल्ली सरकार के बयान में कहा गया कि कुछ स्वास्थ्य केन्द्रों और ओपीडी में केवल कॉन्ट्रैक्चुअल नर्सिंग स्टाफ के साथ स्वास्थ्य सेवाओं का प्रबंध किया गया है.

हालांकि वार्डो में मरीजों की देखभाल पर असर पड़ा है. इंटर्न और छात्र नर्सों के सहयोग से आपातकालीन सर्जरी की जा रही है और पहले से तय सर्जरी स्थगित कर दी गई हैं.

क्या मांगे यथोचित हैं?

ऑल इंडिया गवर्नमेंट नर्सेज फेडरेशन (एआईजीएनएफ) के अनुसार उनकी मुख्य मांग स्टाफ नर्सेस के लिए प्रारंभिक ग्रेड पे वर्तमान के 4,600 रुपए से बढ़ाकर 5,400 रुपए करने और नर्सिंग भत्ते को बढ़ाकर 7,800 रुपए करने की है. वर्तमान में नर्सिंग भत्ता 4,800 रुपए से शुरू होता है.

छठा वेतन आयोग लागू होने के बाद से मूल वेतन से ग्रेड पे अलग हो गया है और यह कर्मचारी के कैटेगरी/क्लास पर निर्भर है. बेसिक वेतन और ग्रेड पे का इस्तेमाल डीए और अन्य भत्तों की गणना करने के लिए किया जाता है. कर्मचारी का प्रमोशन होने पर भी यह स्थाई रहता है. सब मिल-मिलाकर नर्स को प्रारम्भिक स्तर पर औसतन दस हजार 13 हजार रुपए के बीच मिलता है.

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शहरी क्षेत्र में जीवन-यापन के खर्च को देखते हुए यह पूरी तरह से अपर्याप्त है.

केन्द्रीय वेतन आयोग में नर्सेस को हमेशा ही सबसे नीचे के पायदान पर रखा जाता है. इसका सीधा अर्थ होता है कि वेतन वृद्धि, इन्क्रीमेन्ट्स और भत्तों के लिए उनके पास कम ही अवसर होते हैं. नर्सेस एसोसिएशन ने मांग की है कि नर्सेज के पे ग्रेड को अपग्रेड करते समय उन्हें यूनीफॉर्म भी दी जाए.

विभिन्न नर्सेज यूनियन की मांग में भत्तों की मांग दूसरे वर्ग में रखी गई है. वेतन आयोग ऑल इंडिया गवर्मेन्ट नर्सेस फेडरेशन (एआईजीएनएफ) की कई मांगों को सुनने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि भत्तों में वृद्धि करने की कोई जरूरत नहीं है. उनकी अन्य मांगों में जोखिम भत्ता और नाइट ड्यूटी एलाउन्स भी शामिल है. सभी अन्य राज्य सरकारों द्वारा इन भत्तों को दिया भी जा रहा है.

प्रतिउत्तर

पूरे देश में नर्सों की हड़ताल पर सरकार ने अपनी प्रतिक्रिया किस तरह जताई, आइए, देखते हैं? सरकार ने धमकी दी कि यदि वे काम पर नहीं आएंगे तो हड़ताल में भाग लेने वालों को वह गिरफ्तार करना शुरू कर देगी. शनिवार को, दिल्ली सरकार ने कहा कि नर्सेज जो काम पर आने की रिपोर्ट नहीं करेंगी, उन्हें आवश्यक सेवा बहाली अधिनियम के तहत हिरासत में लिया जाएगा और इसके परिणामस्वरूप उनकी नौकरी भी जा सकती है.

जब सरकार की यह धमकी भी काम में नहीं आई तो उसने गिरफ्तारी की चेतावनी दी. इसी कवायद के तहत बाहरी दिल्ली के डॉ. अंबेडकर अस्पताल के दो पुरुष नर्सों को अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया. जबकि हड़ताल शनिवार को ही वापस ले ली गई थी.

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और भी बुरी बात यह रही कि हड़ताल के पहले ही दिन दो सितम्बर को राम मनोहर लोहिया अस्पताल की 80 से ज्यादा नर्सेज को दिल्ली पुलिस ने कथित रूप से उस समय हिरासत में ले लिया जब वे हड़ताल में भाग लेने जा रहे थी.

वर्तमान में, पूरी दिल्ली में डेंगू, चिकुनगुनिया सहित तमाम मौसमी बीमारियां फैली हुईं है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हर दिन सैकड़ों की संख्या में मरीजों का तांता लगा है. ऐसे में हड़ताल का यह समय हड़ताल पर ही सवालिया निशान लगाता है, पर यह भी रेखांकित किया जाना महत्वपूर्ण है कि नर्सेज यूनियन ने हड़ताल पर उसी समय जाने का निश्चय कर लिया था जब पूरे देश में दो सितम्बर को कर्मचारियों की हड़ताल प्रस्तावित हुई थी. यह एकता जरूरी थी.

एआईजीएनएफ ने स्पष्ट किया कि हड़ताल के दौरान सभी नर्सें गंभीर रोगियों को अटैण्ड करना बंद नहीं करेंगे.

उस समय भी, जब हालात काबू से बाहर होते जा रहे थे, सरकार ने चिकित्सकों और मरीजों की मदद के लिए और अधिक कॉन्ट्रैक्चुअल स्टाफ की भर्ती करना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं, सरकार ने नर्सिंग स्टाफ की मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की बजाय ठेका कर्मचारियों से सम्पर्क करना शुरू कर दिया जो किसी भी तरह से पूर्णकालिक कर्मचारी के समान फायदेमंद नहीं हो सकते थे.

इस सप्ताह की शुरुआत में जब सरकार ने मीडिया को हड़ताल के बारे में ब्रीफ किया था तो केन्द्रीय स्वास्थ्य सचिव सीके मिश्रा ने हड़ताल से निबटने के लिए हर तरह के कदम उठाने की बात कही थी. इसमें एस्मा लागू करने और कॉन्ट्रैक्चुअल आधार पर नर्सेज को हायर करना भी था. उन्होंने चिकुनगुनिया और डेंगू के मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए हड़ताल के समय को लेकर आक्रोश जताया था.

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा था कि नर्सों की नौ मांगों में से सात मांगे मान ली गईं हैं. 12 सितम्बर को होने वाली अगली वार्ता में अन्य मांगों पर भी चर्चा की जाएगी. वेतन आयोग ने नर्सेज के वेतन मामले में जो संस्तुति की है, उनमें से दो मांगों को अभी नहीं माना जा सका है. मिश्रा ने यह भी कहा कि आयोग ने भत्तों पर जो सिफारिशें की है, उस पर वित्त सचिव की अध्यक्षता वाली समिति निर्णय लेगी.

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फाइल वित्त मंत्रालय के पास भेज दी गई है. नर्सेज यूनियन के प्रतिनिधियों की समिति सदस्यों के साथ 12 सितम्बर को होने वाली बैठक में इस पर चर्चा होगी. कोई न कोई रास्ता निकल आएगा. ऑल इंडिया गवर्मेन्ट नर्सेज फेडरेशन, जिसके बैनर तले वेतन और भत्तों को बढ़ाए जाने को लेकर हड़ताल की गई थी, के सदस्यों का कहना है कि मंत्रालय द्वारा हड़ताल के पहले दिन से ही धमकाया गया, नौकरी से बर्खास्त करने की धमकी दी गई और यहां तक कि यह भी कहा गया कि अगर दो दिन के भीतर हड़ताल वापस नहीं ली तो सरकारी मकान खाली करना होगा.

एआईजीएनएफ के प्रवक्ता लीलाधर रामचंदानी ने कहा, 'उनकी मांगों पर बैठक करने और विचार-विमर्श करने के स्थान पर मंत्रालय ने कर्मचारियों को काम पर वापस आने का दबाव डालने और उन्हें चेतावनी देने का रास्ता अख्तियार किया.' रामचंदानी के अनुसार हड़ताल शुरू होने के पहले बैठक करने के उनके प्रस्ताव पर मंत्रालय ने कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी.

उन्होंने कहा कि हड़ताल के दूसरे दिन राष्ट्रीय राजधानी के विभिन्न सरकारी अस्पतालों के 16-17 नर्सों के एक शिष्टमंडल जब स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा वार्ता के लिए आमंत्रित किया गया, तो कोई भी अधिकारी शिष्टमंडल से मिलने ही नहीं आया. एआईजीएनएफ ने यह भी स्पष्ट किया है कि हड़ताल के दौरान सभी नर्सें इमर्जेन्सी और गंभीर रोगियों को अटैण्ड करना बंद नहीं करेंगे.

समर्थन का अभाव

हड़ताल का यह मुद्दा इसलिए भी जोर नहीं पकड़ सका क्योंकि अधिकांश चिकित्सकों ने स्टाफ कम होने की शिकायत की थी और नर्सेज के साथ सहानुभूति दिखाने के स्थान पर यह भी कहा था कि सर्जरी और ऑपरेशन करने में देर हो रही है या उन्हें कैंसिल करना पड़ रहा है. जब नर्सेज की मांगों और उनके हालातों पर बात की गई तो राष्ट्रीय राजधानी के अधिकांश डॉक्टरों ने स्टाफ कम होने की बात कही और हड़ताल को उत्तरदायित्व विहीन बता दिया.

उधर, मीडिया की ओर से भी नर्सेज को तवज्जो नहीं दी गई, उनकी हड़ताल हेडलाइंस नहीं बनीं और मीडिया का ध्यान मरीजों की परेशानी पर रहा. मीडिया का ध्यान हड़ताल के मुद्दों से ज्यादा इस पर भी रहा कि सरकार कैसे इस स्थिति से निबटेगी?

ऐसे में यदि सरकार, केन्द्र और राज्य दोनों ही यह मानते हैं कि स्वास्थ्य संकट के चलते सैकड़ों मरीजों को परेशानी होगी तो क्या सरकार को कम से कम यूनियन के साथ विचार-विमर्श नहीं कर लेना चाहिए था और यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि महत्वपूर्ण स्टाफ हड़ताल पर न जाए.

First published: 8 September 2016, 7:30 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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