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कॉमरेड बर्धन के जाने पर जनता के बदलने की कामना

अनिल यादव | Updated on: 4 January 2016, 14:58 IST

कॉमरेड एबी बर्धन एक बड़े नेता थे. उन्होंने कभी नौ लाख का सूट नहीं पहना, उनकी गाड़ी गुजरने के वक्त कभी ट्रैफिक नहीं रुका, कभी अपने बेटे को राजनीति में जबरन घसीट कर मंत्री नहीं बनवाना चाहा, भ्रष्टाचार करके करोड़ों पीटने के बाद उस पैसे से अपनी छवि का प्रबंधन नहीं किया, अपनी सहूलियत के लिए हवा का रुख देखकर पार्टियां नहीं बदली, चुनाव में अपनी पार्टी की रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए अभिनेत्रियों को नहीं बुलाया... फिर किस बात के बड़े नेता थे जो उन्हें श्रद्धांजलि पेश की जाए.

सबसे ऊपर तो यह कि बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के बाद से वे सभी धर्मों की इज्जत की बात करने लगे थे लेकिन कम्युनिस्ट थे. क्या उनकी आत्मा को शांति के लिए सनातनी श्रद्धांजलि की जरूरत भी है जिसे देने की रस्म छोड़ने की हिम्मत वे भी नहीं कर पाते जिनके लिए शरीर का पदार्थ ही सबकुछ है, आत्मा के होने में यकीन नहीं है. जिनके लिए आत्मा सिग्मंड फ्रायड का सेल्फ है वे अपनों को लाल सलाम कहते हैं और दूसरों को न जाने किस दबाव में श्रद्धांजलि देते हैं.

गनीमत है कि उन्हें अब भी सार्वजनिक तौर पर जोर से बड़ा नेता कहा जा रहा है. इसका कारण कम्युनिस्ट पार्टी का लंबे समय तक राष्ट्रीय महासचिव रहने के दौरान कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा के बड़ों नेताओं की निरंतर सोहबत के बावजूद त्याग और सादगी का बचे रहना है. जनता का यह चस्का गजब है कि किस्से मिथकीय महापुरुषों और सन्यासियों के प्रचलित हैं लेकिन त्याग, तपस्या की उम्मीद भौतिकवादी वामपंथी नेताओं से करती है.

'उनके सार्वजनिक और निजी जीवन में इतनी फांक नहीं थी कि वे कार्यकर्ता को आंखे तरेरते'

एक रोज लखनऊ के कैसरबाग में कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में एक प्रेस कांफ्रेन्स में परमाणु डील के मुद्दे पर बोल रहे थे तभी एक कार्यकर्ता उन्हें दही का कुल्हड़ लाकर दे गया जिसे थोड़ी देर बाद उन्हें पार्टी के सामूहिक भंडारे में बने खाने के साथ खाना था. उनके सार्वजनिक और निजी जीवन में इतनी फांक नहीं थी कि वे कार्यकर्ता को आंखे तरेरते. उन्होंने पेपरवेट की जगह हाथ में दही का कुल्हड़ सहेज लिया और बोलते रहे.

एक बार राज्य कार्यकारिणी की बैठक के बाद आराम करने के लिए चलने को हुए तो पता चला कि उनका वीवीआईपी गेस्ट हाउस में कमरे का आवंटन किसी सचमुच के वीआईपी के चले आने के कारण रद्द कर दिया गया है. मुलायम सिंह की सरकार थी, चाहते तो एक नये कमरे का इंतजाम हो सकता था लेकिन पार्टी के दफ्तर के किसी कमरे में तख्त पर लेट रहे. महत्वपूर्ण गेस्ट हाउस नहीं थकान थी.

अभी हाल के वर्षों तक वे रेल के किसी दर्जे में सफर कर सकते थे. पार्टी की चंडीगढ़ कांग्रेस में उनकी पहल पर फैसला हुआ था कि अजय भवन से गऊ पट्टी के राज्यों को आगे से हिंदी में सर्कुलर भेजे जाएंगे. हिंदी लिखने वाला सस्ता स्टाफ न मिल पाने के कारण अभी तक यह काम अंग्रेजी में ही चल रहा है.

त्याग, सादगी, आजादी से पहले और बाद के लंबे राजनीतिक अनुभव के बाद भी वे विफल राजनेता ही रह गए

त्याग, सादगी, आजादी से पहले और बाद के लंबे राजनीतिक अनुभव, प्रतिबद्धता, बौद्धिक ताप के बावजूद वे और उनकी पार्टी चुनावी राजनीति में जनता का समर्थन जीतने में कामयाब क्यों नहीं हुए. क्यों एक भले लेकिन विफल राजनेता ही रह गए. इसका जवाब यही है कि दो तरह की राजनीति है. एक वह जिसे जनता की कमजोरियों जातिवाद, लालच, धर्मांधता, अंधविश्वास और जहालत को हवा देकर सत्ता पर कब्जा किया जाता है और फिर मूर्खों की भीड़ को भूल जाया जाता है.

दूसरी वह जिसे जनता को बदलने के लिए किया जाता है और पानी पर लकीर बनाने की कोशिश में चुपचाप खप जाया जाता है. तब यह जनता महान कैसे है जिसे कॉमरेड बर्धन भी महान कहा करते थे. शायद वे इस उम्मीद में ऐसा कहते होंगे कि अपनी प्रशंसा सुनकर कभी तो जनता बदल जाएगी.

देश की आजादी से लेकर कर लो दुनिया मुट्ठी में वाली आजादी तक आंदोलन दर आंदोलन जनता को महसूस करते हुए वे खुद भी बदल चुके थे. अगर ऐसा न होता तो कॉमरेड इंद्रजीत गुप्त केंद्र की सरकार में गृहमंत्री न बनते जिससे खाली हुई जगह पर वे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बने थे. वे ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन सीपीएम के कॉमरेडों ने ऐसा होने न दिया जो राज्यों में तो सरकार के जरिए वाम आंदोलन को मजबूत कर रहे थे लेकिन केंद्र में आकर लोकलाज के डर से ऐसा जोखिम नहीं लेना चाहते थे.

बर्धन की आत्मा की शांति की कामना की बजाय जनता के कम जातिवादी, धर्मांध और भावुक न होने की कामना होनी चाहिए

पहले क्रांति से सत्ता पर कब्जा होगा फिर सबकुछ बदला जाएगा, इस ख्याल से वे इस ख्याल तक आ चुके थे कि पहले सत्ता पाई जाए फिर उसके जोर से वामपंथ को क्रांति की मंजिल तक ले जाया जाए.

मुझे लगता है कि कॉमरेड बर्धन की आत्मा की शांति की कामना की बजाय इस मौके पर जनता के कम जातिवादी, कम धर्मांध और भावनात्मक गुबार में इतनी आसानी से न बह जाने वाली बनने की कामना की जानी चाहिए ताकि बर्धन जैसे बड़े नेता भी कामयाब हो सकें.

First published: 4 January 2016, 14:58 IST
 
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