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लाभ के पद और कानून के लंबे हाथों में फंसी आम आदमी पार्टी

सौरव दत्ता | Updated on: 16 June 2016, 17:26 IST

केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच शब्द वाणों की बौछार जारी है. इस वजह से दिल्ली की राजनीति में उबाल आ गया है. विवाद की वजह आप के 21 विधायकों की सदस्यता खतरे में पड़ना है. आप सरकार ने इन विधायकों को संसदीय सचिव बनाया था. उनकी सदस्यता इस आधार पर खतरे में है कि यह लाभ का पद है.

इन विधायकों के संरक्षण के लिए आप सरकार जो विधेयक लाई थी, उसे राष्ट्रपति ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया है. भाजपा ने इस मुद्दे पर आप को घेर लिया है. भाजपा इस घटना को आप की उड़ान भरती महत्वाकांक्षाओं की क्रैश लैंडिंग करार दे रही है. 

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दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं कि मोदी न खुद काम करते हैं न हमें काम करने दे रहे हैं.

राजनीतिक वाद-विवाद को अगर एक ओर रख दिया जाए तो कानून क्या कहता है? अंतिम रूप से वही मान्य होगा जो सुप्रीम कोर्ट और संविधान के अनुच्छेद 141 में वर्णित किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ही कानून की अंतिम व्याख्या सुनिश्चित करता है.

मामले की पहेली

सबसे पहले इस पर विचार करना चाहिए कि इस मामले में कानून क्या कहता है और पहले के उदाहरण क्या हैं? मुख्य मुद्दा यह है कि अरविन्द केजरीवाल ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी पर केन्द्र सरकार (नरेंद्र मोदी जो भारत के प्रधानमंत्री हैं) के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया है.

राष्ट्रपति ने दिल्ली विधानसभा सदस्य (अयोग्यता को हटाना) विधेयक-2015 में संशोधन को मंजूरी देने से इनकार कर दिया. यह विधेयक संसदीय सचिवों को लाभ के पद के दायरे से बाहर रखने के लिए लाया गया था.

संसद द्वारा भी इस कानून को मान्यता प्रदान की गई है. संविधान के जानकारों के अनुसार लाभ के पद की व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 102 (1) (ए) में की गई है जिसके तहत प्रावधान है कि कोई भी लोकसेवक जो सार्वजनिक पद पर है, उसे सरकार से किसी भी तरह के भत्ते लेने की अनुमति नही दी जाएगी.

अन्य राज्यों में भी संसदीय सचिव हैं और वहां यह वैध है तो फिर भाजपा केवल दिल्ली में इस पर क्यों सवाल उठा रही है

उधर, केजरीवाल का कहना है कि उनके 21 विधायकों ने सरकार से एक भी पैसा नहीं लिया है, कोई भी सरकारी सुविधा नहीं ली और दिल्ली के उपनगरीय इलाकों में बस्तियों में रह रहे हैं. 

वास्तव में दिल्ली विधानसभा सदस्य (अयोग्यता ठहराने ) संबंधी विधेयक, 1991 को 1997 में संविधान संशोधन के जरिए बदला गया था. इसमें संसदीय सचिवों के साथ ही छूट की लम्बी सूची थी. 

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केजरीवाल का यह भी कहना है कि अन्य राज्यों में भी संसदीय सचिव हैं और वहां यह पद वैध है तो फिर भाजपा केवल दिल्ली में इस पर क्यों सवाल उठा रही है.

क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट

भारत का सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट है. सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि लाभ के पद के सवाल को विशुद्ध रूप से हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार तय किया जाना चाहिए. काम की प्रकृति, वेतन तथा अन्य भत्तों के अनुसार भी इसे तय किया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने यही बात बार-बार कही है. वर्ष 2006 में समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन को जब यूपी फिल्म डेवलपमेन्ट काउंसिल का चेयरमैन बनाया गया था तो वह भी लाभ के पद के आरोपों से घिर गईं थीं. चुनाव आयोग की सिफारिश को मानते हुए राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने जया बच्चन की राज्यसभा सदस्यता खत्म कर दी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए कहा था कि चूंकि उन्होंने नगद या किसी भी रूप में कोई वित्तीय लाभ नहीं लिए हैं अतः चुनाव आयोग के पास उनकी राज्यसभा की सदस्यता को अयोग्य ठहराने का कोई अधिकार नहीं है.

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इसके बाद 2009 में तृणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी और अहमदाबाद के एक एनजीओ कंज्यूमर एजूकेशन रिसर्च सोसाइटी ने पार्लियामेन्ट (प्रीवेन्शन आफ डिसक्वालीफिकेशन एमेन्डमेन्ट एक्ट) 2006 को शीर्षस्थ कोर्ट में चुनौती दी थी. 

इसके तहत 55 लाभ के पदों को इसके दायरे से बाहर कर दिया गया. इन 55 मामलों में किसी को भी अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.

अशोक कुमार भट्टाचार्य बनाम अशोक बिस्वास (1985 ) और गुरु गोबिन्द सिंह बनाम श्रीहरि प्रसाद घोषाल (1964) के मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट व्यवस्था दी थी कि संसद की शक्तियां राजनीतिक विरोध और रणनीतिक कलह से ऊपर हैं.

इस प्रकार अब तक जो हालात हैं उनमें कुछ कहना जल्दबाजी होगी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबको इंतजार है.

First published: 16 June 2016, 17:26 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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