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सार्वजनिक परिवहन की दशा सुधारने में सफल रहे हैं ओला और उबर

नीरज ठाकुर | Updated on: 30 July 2016, 7:53 IST
QUICK PILL
  • राज्य सरकार अपने पारंपरिक वोट बैंक यानी ऑटो चालकों के समूह को खुश करने के लिए उबर और ओला जैसे एग्रीगेटर्स को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि यह महानगर की परिवहन व्यवस्था को सुधारने में काफी हद तक सफल रहे हैं.
  • जो ड्राइवर एग्रीगेटर्स के जरिए वाहन चला रहे हैं वह कभी ऑटो चलाते थे. आज वह अपना खुद का काम कर रहे हैं और महीने में 40,000 से 70,000 रुपये महीने कमा रहे हैं. यह एक ऑटो ड्राइवर को मिलने वाली रकम से करीब तीन गुणा ज्यादा है.

कुछ साल पहले का समय याद कीजिए. महानगर में रहने वाले लोगों के लिए ऑटो रिक्शा भाड़े पर लेने के लिए कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता था. 

दिल्ली में ऑटो से यात्रा करने वाले हर व्यक्ति के पास सुनाने के लिए कितना कुछ है. कभी उम्मीद से अधिक भाड़े की मांग, किसी रूट पर जाने से मना कर देना जैसी समस्याएं आम थी. दशकों तक दिल्ली शहर में ऑटो रिक्शावालों का आतंक कायम रहा. बेसाख्ता कहीं जाने से मना कर देना, बेशर्मी से दोगुना-तीन गुना किराया मांगना उनकी पहचान बन चुकी थी. मीटर जैसी चीजें बेमानी हो चुकी हैं.

किसी दिन अगर ऑटो वाले ने आपसे पूछे बिना चलने के लिए हामी भर दी तो आपकी आंखे खुली रह जाती थी. दिल्ली में ओला और उबर जैसे टैक्सी एग्रीगेटर के आने के बाद यह सभी समस्याएं काफी हद तक खत्म हो गई. 

मामूली कीमत पर आपको एयर कंडीशन में यात्रा करने का आनंद मिलता है और आपको टैक्सी के ड्राइवर के साथ झिकझिक भी नहीं करनी होती. यहां पर ड्राइवर आपके साथ बेहद सौम्य बर्ताव करता है जो आपके लिए खुशी से कम नहीं होता. हालांकि इनके साथ कुछ अप्रिय घटनाएं भी हुई हैं लेकिन दिनों दिन इन एग्रीगेटर्स की सेवा में सुधार हो रहा है.

अब इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आपको कहां जाना है. आपका उबर ड्र्राइवर आपसे कहां जाना है, के बारे में नहीं पूछता. उसके फोन पर एक मैसेज मिलता है जिसमें पिक अप लोकेशन मिलता है. फिर वह तय समय के भीतर तय जगह पर पहुंचता है.

अगर फिर भी कस्टमर असंतुष्ट हो जाए तो वह रेटिंग के जरिये ड्राइवर के खिलाफ फीडबैक देते हुए उसके खिलाफ शिकायत भी कर सकता है. अगर खराब रेटिंग मिली तो ड्राइवर को मिलने वाली इंसेंटिव में कटौती कर दी जाती है.

तकनीक का इस्तेमाल

इन टैक्सी एग्रीगेटर्स ने कुछ सालों के भीतर वह हासिल कर लिया है जो राज्य सरकार वर्षों तक करने में विफल रही है. सरकार अभी तक लोगों को दुरुस्त सार्वजनिक परिवहन मुहैया कराने में विफल रही है.

ओला और उबर ने अब कार पूलिंग जैसी सुविधाओं की शुरुआत कर दी है. कम किराए की वजह से यह सेवा मध्य वर्ग के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है. लोग अपनी कारों की बजाए तेजी से इन एग्रीगेटर्स की सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं.

सरकार और एनजीओ के लगातार कैंपेन के बावजूद लोगों का भरोसा इन एग्रीगेटर्स पर बढ़ा है. महिंद्रा एंड महिंद्रा के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने एक बार कहा था कि कैब एग्रीगेटर्स उनके कारोबार के लिए खतरा है क्योंकि अधिक से अधिक लोग अपनी कार खरीदने की बजाए सार्वजनिक परिवहन पर भरोसा दिखा रहे हैं.

वोट बैंक राजनीति को खतरा

हालांकि अब इसमें वोट बैंक की राजनीति शुरू हो गई है. ऑटो ड्र्राइवर्स आज की तारीख में बड़ा वोट बैंक है. अब उनकी आय पर खतरा मंडरा रहा है क्योंकि बड़ी संख्या में लोग किफायती ओला और उबर की तरफ जा रहे हैं.

ऑटो ड्राइवर्स ने अब कैब एग्रीगेटर्स के लिए किराए को नियंत्रित करने की मांग को लेकर राज्य सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है. सरकार भी इस मामले में अब घुटने टेक रही है.

तमिलनाडु, महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे राज्य में सरकार ने कानून बनाकर एग्रीगेटर्स की सेवाओं को नियंत्रित करने की कोशिश की है.

हालांकि उपभोक्ताओं की सुरक्षा को लेकर नियम बनाने में कोई बुराई नहीं है लेकिन सरकार के पास इन कंपनियों के लिए न्यूनतम और अधिकतम किराया तय करने का अधिकार नहीं है. हालांकि यह दुर्भाग्य है कि राज्य सरकारें कैब एग्रीगेटर्स को मोटर व्हीकल एक्ट के दायरे में ला रही हैं.

किराए को नियंत्रित कर राज्य सरकारों को क्या मिलेगा? जाहिर तौर पर वह अपने इस नए ट्र्रांसपोर्ट सिस्टम को महंगा और गैर विश्वसनीय बनाकर अपने पारंपरिक मतदाताओं का तुष्टिकरण चाहती है. एक बार फिर से लोग अपने निजी वाहनों का इस्तेमाल शुरू करेंगे और इससेे ट्रैफिक और प्रदूषण की समस्या में इजाफा होगा.

सरकार को क्या करना चाहिए?

इन सबका क्या मतलब है? उनका क्या जो समय के साथ बदलना नहीं चाहते हैं और अपने ही रुख पर कायम रहते हैं? ऑटोे लॉबी के सामने घुटने टेकने की बजाए सरकार को कैब एग्रीगेटर्स को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि वह लोगों के लिए सार्वजनिक परिवहन की स्थिति को सुधार सके.

यहां यह जानना जरूरी है कि आज जो ड्राइवर एग्रीगेटर्स चला रहे हैं वह कभी ऑटो चलाते थे. आज वह अपना खुद का काम कर रहे हैं और महीने में 40,000 से 70,000 रुपये महीने कमा रहे हैं. यह एक ऑटो ड्राइवर को मिलने वाली रकम से करीब तीन गुणा ज्यादा है.

कैब एग्रीगेटर्स ने न केवल उपभोक्ताओं के अनुभव को बेहतर किया है बल्कि इससे चालकों को भी फायदा हुआ है. 

यह एक ऐसी व्यवस्था की है जिससे सभी को फायदा हुआ है. इसको खत्म करने का मतलब शहर की परिवहन व्यवस्था को खत्म करना है. साथ ही उन ड्राइवर्स की आजीविका को भी जो इससे जुड़े हुए हैं.

First published: 30 July 2016, 7:53 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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