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बसपा में बगावत: बहनजी से बिछड़े सभी बारी-बारी

अतुल चंद्रा | Updated on: 1 July 2016, 12:57 IST

बहुजन समाज पार्टी के विधायक दल के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या के मायावती के खिलाफ प्रस्तावित शक्ति प्रदर्शन से एक दिन पहले ही पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता आरके चौधरी ने शुक्रवार को पार्टी को अलविदा कह दिया. वे मिर्जापुर से पार्टी के जोनल काॅआॅर्डिनेटर थे.

अपने अन्य पूर्ववर्तियों की तरह इस पूर्व मंत्री ने भी बसपा सुप्रीमो मायावती पर आगामी विधानसभा चुनाव के लिये पार्टी के टिकटों की नीलामी करने का आरोप लगाया.

मायावती पर जुबानी हमला बोलते हुए चौधरी ने आरोप लगाया कि पार्टी के संस्थापक कांशीराम की मौत के बाद पार्टी के लिये जी-जान लगाकर काम करने वाले दिग्गज नेताओं को पार्टी में वह महत्व नहीं दिया जा रहा है जिसके वे हकदार हैं.

मौर्या से बिल्कुल उलट चौधरी को एक सच्चा बसपाई इसलिये नहीं माना जा सकता क्योंकि वे एक बार पहले भी वर्ष 2001 में पार्टी से इस्तीफा दे चुके हैं. हालांकि 2014 के लोकसभा चुनावों से ऐन पहले 2013 में उन्हें दोबारा पार्टी मे शामिल किया गया. उन्होंने लखनऊ की मोहनलालगंज विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा लेकिन जीतने में असफल रहे.

बीएसपी से अलग होने के बाद चौधरी ने पूर्व विधानसभाध्यक्ष बरखू राम वर्मा से हाथ मिलाते हुए राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी का गठन किया जिसने मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी का समर्थन किया. हालांकि 2013 में उनकी घरवापसी के बाद आरएसपी का विलय बीएसपी के साथ कर दिया गया था. चौधरी ने अपनी पार्टी के पुनरुद्धार को लेकर अभी चुप्पी ही साध रखी है.

चौधरी 2004, 2007 और 2012 विधानसभा चुनावों और 2009 के लोकसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं और हर बार असफल ही रहे हैं. बीएसपी के सूत्रों का दावा है कि वे 2017 के चुनावों में मोहनलालगंज से चुनाव लड़ना चाह रहे थे लेकिन मायावती ने उनके इस अनुरोध को ठुकरा दिया था.

चौधरी 2001 में भी बसपा से इस्तीफा दे चुके हैं, उन्हें 2013 में दोबारा पार्टी में शामिल किया गया था

व्यक्तिगत रूप से देखा जाए तो चौधरी के बीएसपी छोड़ने के फैसले का पार्टी पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा क्योंकि वे पार्टी से अलग होने के बाद अपने लिये कोई मुकाम बनाने में असफल ही रहे थे. इस घटना को अगर पार्टी छोड़ रहे या पार्टी छोड़ने का मन बना रहे कुछ दूसरे नेताओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इसका कुछ महत्व है. प्रत्येक इस्तीफे के बाद जो संदेश बाहर जाता है वह यह है कि समय के साथ पार्टी पर मायावती की पकड़ कमजोर हो रही है और वह भी तब जब वे सबसे बुरे दौर में हैं.

शुक्रवार को आयोजित होने वाली ‘कार्यकर्ताओं की बैठक’ को लेकर बेहद व्यस्त चल रहे स्वामी प्राद मौर्या ने कहा कि उन्होंने अभी तक चौधरी से बात नहीं की है. यह भी उन्होंने उस सवाल पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा जिसमें उनसे पूछा गया था कि क्या चौधरी शुक्रवार की बैठक में शामिल होने जा रहे हैं?

चौधरी के इस्तीफे के बाद बीएसपी के तीन अन्य वरिष्ठ दिग्गजों के भी पार्टी छोड़ने की अटकलें गर्म हैं. पूर्व विधानसभाध्यक्ष सुखदेव राजभर, बीएसपी के उत्तर प्रदेश इकाई के प्रमुख राम अचल राजभर और लालजी वर्मा भी जल्द ही मौर्य और चौधरी के नक्शेकदम पर चल सकते हैं.

हालांकि लालजी वर्मा और सुखदेव राजभर से संपर्क नहीं किया जा सका वहीं राम अचल राजभर के सहयोगी जिन्होंने फोन काॅल का जवाब दिया का कहा था कि यह जानकारी शरारत के अलावा कुछ नहीं है. राम अचल पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बैठक में व्यस्त थे.

जब स्वामी प्रसाद मौर्य से पूछा गया कि क्या इनमें से कोई नेता उनकी शुक्रवार की बैठक का हिस्सा बनेगा तो उनका कहना था कि वर्तमान समय में मायावती जिस प्रकार का व्यवहार पार्टी के सहयोगियों के प्रति दिखा रही हैं आने वाले दिनों में अधिक से अधिक नेता पार्टी से किनारा करते दिखाई देंगे.

मौर्य के मुताबिक जल्द ही बसपा के कई और नेता मायावती से किनारा करते नजर आएंगे

जिस समय चौधरी ने पहली बार पार्टी छोड़ी थी ठीक उसी समय एक और वरिष्ठ नेता ओम प्रकाश राजभर ने भी 2002 में पार्टी से इस्तीफा देकर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की स्थापना की थी लेकिन उनका यह प्रयोग भी अन्यों की तरह विफल ही रहा था.

एक वोटकटवा समूह के रूप में उन्हें सिर्फ एसबीएसपी के राजभर वोट बैंक में सेंध लगाने के अलावा और कोई प्रसिद्धी नहीं मिली. पार्टी ने 2004, 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों और 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में किस्मत आजमाई लेकिन खाता तक खोलने में विफल रही.

2007 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने 97 प्रत्याशी चुनावी में उतारे जिनमें से सिर्फ तीन ही अपनी जमानत बचाने में सफल रहे. पार्टी को कुल 491,347 वोट मिले जो राज्य में पड़े कुल मतों के 0.94 प्रतिशत होते हैं.

2012 के विधानसभा चुनावों में पार्टी का मत प्रतिशत और गिरकर 0.63 प्रतिशत तक पहुंच गया और 52 उम्मीदवारों में से चार की जमानत जब्त हुई. इसके अलावा इन्हें मिले मतों की संख्या भी गिरकर 477,330 पहुंच गई.

बीजेपी ने पूर्वाचल में अपना वर्चस्व बढ़ाने के लिये एसबीएसपी के साथ हाथ मिलाया है. इनके पास विधानसभा को 135 सदस्य देने वाले इस क्षेत्र में 8 विधायक हैं.

पार्टी छोड़ने वाले अन्य नामों में कांशीराम के वफादारों में माने जाने वाले राज बहादुर, दीनानाथ भास्कर और दद्दू प्रसाद मुख्य हैं. इसके अलावा सोनेलाल पटेल, जुगल किशोर और बाबूलाल कुशवाहा मायावती के ‘लाचली और तानाशाह’ रवैये के चलते पार्टी छोड़ चुके हैं. अंतिम तीनों में से कुशवाहा करोड़ों रुपये के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) घोटाले के आरोपियों में से एक हैं.

First published: 1 July 2016, 12:57 IST
 
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