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कश्मीर विवाद: मीडिया पर सेंसर, अखबार जब्त

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 July 2016, 8:43 IST
(एजेंसी)

शनिवार को लगभग आधी रात के समय जम्मू-कश्मीर के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया समूह ग्रेटर कश्मीर कम्युनिकेशंस के कार्यालय में लगभग 25 पुलिसकर्मी धड़धड़ाते हुए घुसे और अंग्रेजी दैनिक ग्रेटर कश्मीर की प्लेटों को अपने कब्जे में ले लिया.

इसके साथ ही उन्होंने उस समय तक छप चुके उर्दू दैनिक कश्मीर उज्मा की करीब 50 हजार प्रतियों को भी जब्त कर लिया.

पुलिस ने ग्रेटर कश्मीर प्रिंटिंग प्रेस के फोरमेन बीजू चौधरी और दो अन्य कर्मचारियों को भी गिरफ्तार कर लिया.

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मीर इकबाल अखबार के आॅनलाइन संस्करण में लिखते हैं, ‘पुलिसकर्मियों ने वहां मौजूद कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार किया और उनके मोबाइल फोन भी छीन लिये. जिन कर्मचारियों ने विरोध करने का प्रयास किया उनकी पिटाई भी की गई.’

इसके अलावा सरकार ने पूरे श्रीनगर में आधी रात में मारे गए छापों के जरिये दूसरे अन्य उर्दू और अंग्रेजी क्षेत्रीय अखबारों की प्रतियों को भी जब्त कर लिया.

इसके साथ ही केबल टीवी का प्रसारण भी बंद करवा दिया गया और लोगों को राष्ट्रीय समाचार और मनोरंजन चैनलों को देखने से महरूम कर दिया गया.

कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई

दैनिक कश्मीर आॅब्जर्वर के संपादक सज्जाद हैदर कहते हैं, ‘जिस समय पुलिस ने जब्ती की कार्रवाई की उस समय तक आधे अखबार छप चुके थे. हमें इस बारे में कोई पूर्व-सूचना भी नहीं दी गई थी. हो सकता है कि सरकार ने ऐसा कोई आदेश दिया भी न हो या फिर यह अघोषित आपातकाल हो. यह आपातकाल से भी बुरा है. यह कहने को जनता के द्वारा निर्वाचित एक सरकार द्वारा पैदा की जा रही अराजकता की स्थिति है. बिना किसी आदेश या कारण बताए प्रेस का गला घोटा जा रहा है. हमारे पूरे दिन के खर्चे और छपाई में हुए खर्चे का हर्जाना अब कौन भरेगा.’

इसी तरह दैनिक कश्मीर राइजिंग का लगभग एक चौथाई हिस्सा उस समय तक छप चुका था जब उनकी प्रिंटिंग प्रेस में पुलिस का एक दस्ता अखबार की प्रतियां जब्त करने पहुंचा.

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संपादक शुजात बुखारी कहते हैं, ‘यह बेहद दुःखद है. सबसे अजीब बात यह है कि कुछ भी आधिकारिक तौर पर नहीं हो रहा है, लेकिन यह हमारे साथ कोई पहली बार नहीं हो रहा है. कश्मीर की पत्रकारिता 1989 के बाद से ऐसी कई चुनौतियों का सामना कर चुकी है. सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यह अत्याचार उस सरकार के द्वारा किया जा रहा है जो लोकतांत्रित तरीके से चुने जाने का दावा करती है.’

अब्दुल्ला सरकार में भी हुआ था

वर्ष 2010 में भी तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस कांग्रेस गठबंधन सरकार ने भी इसी तरह स्थानीय अखबारों का वितरण रोकने के लिये उनकी प्रतिया जब्त करवा ली थीं.वास्तव में उस समय तो प्रशासन ने श्रीनगर में पत्रकारों की आवाजाही तक को प्रतिबंधित कर दिया था. श्रीनगर के सभी पत्रकारों के कर्फ्यू पासों को निरस्त कर दिया गया था.

वास्तव में उस समय तो प्रशासन ने श्रीनगर में पत्रकारों की आवाजाही तक को प्रतिबंधित कर दिया था. श्रीनगर के सभी पत्रकारों के कर्फ्यू पासों को निरस्त कर दिया गया था.

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हालांकि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने आज एक ट्वीट के माध्यम से कहा है ‘महबूबा सरकार द्वारा कश्मीर में मीडिया पर अचानक हमला एक दमनात्मक कार्रवाई है’.

इसके बाद बुखारी ने ट्वीट किया, ‘भूमिकाओं में बदलाव. 2010 में जब एनसी सरकार ने मीडिया का दमन करने के आदेश दिये थे तब पीडीपी ने भी ऐसे ही बयान जारी किये थे.’

नहीं पहुंच सकी जनता तक जानकारी

स्थानीय समाचार पत्रों और केबल टीवी पर सरकार द्वारा लगाई गई इस रोक के चलते करीब 95 प्रतिशत से अधिक आबादी तक किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं पहुंच पा रही है.

हालांकि सरकारी अधिकारी निजी तौर पर इस पाबंदी को एक बेहद आवश्यक कदम बताते हैं और कहते हैं कि ऐसा करना ताजा हिंसा के दौर को रोकने और उससे हो सकने वाले जानमाल के नुकसान को रोकने के लिये बेहद आवश्यक है.

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नाम न छापने की शर्त पर पीडीपी के एक नेता कहते हैं, ‘हालांकि यह अंतिम उपाय के तौर पर इस्तेमाल किया गया है. लेकिन जानमाल के अधिक नुकसान को रोकने के लिये ऐसा करना सही है. हम आने वाले समय में शांति की बहाली के लिये जरूरी हर कदम उठाने के लिए तैयार हैं.’

शुक्रवार को सरकार ने इंटरनेट और मोबाइल फोन के उपयोग को पूरी तहर से बंद कर दिया जिसके चलते घाटी का संचार बाकी दुनिया से कटा रहा.

सिर्फ बीएसएनएल की ब्राॅडबैंड सेवाएं बहाल थीं. लेकिन उसके उपयोगकर्ता न के बराबर हैं. घाटी में ब्राॅडबैंड के सिर्फ 17044 उपयोगकर्ता हैं.

बेनतीजा रही पूरी कवायद

इतना कुछ करने के बावजूद राज्य में होने वाले विरोध-प्रदर्शनों पर लगाम नहीं लगाई जा सकी. ताजा हिंसा की वारदातों में तीन अन्य लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि अब यह आग जम्मू के क्षेत्रों में भी फैल रही है.

सुरक्षा बलों की प्रतिक्रिया काफी कठोर और नासमझी भरी रही. इसके फलस्वरूप घायलों और मृतकों की संख्या इतनी अधिक हुई.

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जम्मू-कश्मीर के एडवोकेट जनरल जहांगीर इकबाल गनी द्वारा शुक्रवार को हाईकोर्ट में पेश किये गए आंकड़ों के अनुसार मौजूदा संघर्ष में 1882 लोग घायल हुए हैं जिनमें से 600 को पैलट वाली चोटें लगी हैं और 124 गोलियों से घायल हुए हैं.

इसके अलावा सरकार ने एनजीओ जेएंडके पीपल्स फोरम द्वारा दायर एक पीआईएल की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश एन पाॅल वसंतकुमार और जस्टिस मुजफ्फर हुसैन अख्तर की बेंच के सामने घायलों का जिलावार ब्यौरा भी उपलब्ध करवाया.

अस्पतालों में चल रहा इलाज

अदालत को बताया गया कि घायलों में 475, 488, 143, 304, 114, 181, 39, 138, लोग क्रमशः अनंतनाम, पुलवामा, कुपवाड़ा, कुलगाम, गांदरबल, बांदीपुरा, बडगाम और बारामुला जिलों से हैं. करीब 1600 लोगों का इलाज राज्य के विभिन्न अस्पतालों में चल रहा है.

श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक की एक रिपोर्ट से सामने आया है कि कुल भर्ती किये गए घायलों में से 113 का ईलाज आंखों में छर्रे लगने से लगी चोटों के लिये, 43 गोली लगने, 69 का आंखों के आसपास चोटों, 10 की आंसू गैस के खोल से घायल होने, 14 पिटाई से घायल होने और 10 का ईलाज पत्थरों से लगी चोटों के कारण हुआ.

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वर्तमान माहौल को देखते हुए स्थितियों के इतनी आसानी से सामान्य होने के आसार कम ही हैं. कुपवाड़ा में मरे एक और युवक की पहचान शौकत मलिक के रूप में हुई है जिसके बाद मृतकों की संख्या बढ़कर 42 हो गई.

अशांति और हंगामें की कुछ वीडियो फुटेज और तस्वीरें सोशल मीडिया के माध्यम से भी दुनिया के सामने सफलतापूर्वक आई हैं.

सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रिया

दैनिक कश्मीर माॅनीटर द्वारा फेसबुक पर अपलोड किये गए एक पत्थर फेंकने वाले नकाबपोश युवक के वीडियो साक्षात्कार को 734 व्यू, 2700 लाइक्स, 3243 शेयर और 284 कमेंट मिले.

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यह युवा खुद को एक बिल्कुल अज्ञात से संगठन कारवां-ए-आजादी का मुखिया बताते हुए कहता है, ‘अगर हमारे नेता (अलगाववादी) हमें हड़ताल खत्म करने को कहते हैं तो उनकी बात कोई नहीं सुनेगा. हम किसी भी सूरत में 2008 और 2010 को दोहराना नहीं चाहते जब सबकुछ वापस सामान्य हो गया था. हमारा यह प्रतिरोध हमें आजादी मिलने तक जारी रहेगा. यह हमारी लड़ाई है, युवाओं की लड़ाई है और हम इसे एक तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाकर ही रहेंगे.’

First published: 18 July 2016, 8:43 IST
 
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