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एक साथ नहीं हो सकते लोकसभा और विधानसभा के चुनाव

चारू कार्तिकेय | Updated on: 13 April 2016, 8:23 IST
QUICK PILL
  • राज्यसभा की कमेटी ने दिसंबर 2015 में सौंपी रिपोर्ट में पूरे देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा का चुनाव कराए जाने की सिफारिश की है.
  • कमेटी की अध्यक्षता कांग्रेस के नेता ईएम सुदर्शन नचियप्पन के हाथों में थी. इसमें राज्यसभा के 9 और लोकसभा के 20 सांसद शामिल थे. 

पूरे देश में एक साथ चुनाव कराए जाने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विचार संसदीय समिति की सिफारिश से प्रेरित लगता है. हालांकि समिति में जाहिर किए गए विचार गलत तर्क और बेतुके प्रस्ताव पर आधारित है. इस रिपोर्ट में पहले कराए गए कई अध्ययनों का जिक्र किया गया है. इसके साथ ही कई अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का जिक्र करते हुए समाधान पेश करने की बात की गई है जो न केवल विरोधाभासी है बल्कि उन्हें लागू करना भी असंभव है.

राज्यसभा की कमेटी ने दिसंबर 2015 में यह रिपोर्ट सौंपी थी. कमेटी की अध्यक्षता कांग्रेस के नेता ईएम सुदर्शन नचियप्पन के हाथों में थी. इसमें राज्यसभा के 9 और सदस्य के साथ लोकसभा के 20 सांसद शामिल थे. कमेटी में सभी दलों के सांसदों को जगह दी गई थी.

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मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों ने समिति को लिखित में अपना विचार दिया जिनमें से अधिकांश विचार को समिति ने खारिज कर दिया. समिति ने यह माना कि अधिकांश विचार सैद्धांतिक तौर पर इस विचार के समर्थन में थे.

समिति को लगा कि जिन दलों ने इसका विरोध किया है उसकी वजह उन्हें प्रस्ताव का मौजूदा संवैधानिक और विधायी ढांचे के खिलाफ जाना लगता है.

कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई, एआईएमआईएम और एनसीपी ने इस प्रस्ताव का विरोध किया जबकि एआईडीएमके, एजीपी, इंडियन यूनियम मुस्लि लीग, डीएमडीके और शिरोमणि अकाली दल ने इसका समर्थन किया. 

कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई, एआईएमआईएम और एनसीपी ने एक साथ चुनाव कराए जाने के प्रस्ताव का विरोध किया

हालांकि इन्होंने भी प्रस्ताव को लेकर आपत्ति जरूर जताई. एआईडीएमके ने कहा कि अगर इस नीति को लागू कर दिया गया तो कई जटिलताएं पैदा हो जाएंगी. वहीं शिरोमणि अकाली दल ने दो मुद्दे उठाए.

समिति ने चार अहम तर्कों के आधार पर संसद और विधानसभा का चुनाव एक साथ कराए जाने की सिफारिश की थी.

  1. चुनाव में बहुत ज्यादा खर्च होता है और चुनाव आयोग की तरफ से तय की गई खर्च सीमा से ज्यादा उम्मीदवार पैसा खर्च करते हैं. इसके बाद अलग-अलग चुनाव कराए जाने की वजह से ज्यादा खर्च होता है. चुनाव आयोग के मुताबिक लोकसभा, विधानसभा और केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव कराए जाने पर हर साल करीब 4,500 करोड़ रुपये खर्च होता है.
  2. चुनाव की वजह से आचार संहिता लागू होती है और  इस कारण विकास कार्यों को बाधा पहुंचती है. इससे सरकारों के काम-काज और नीति निर्माण पर असर होता है.
  3. लगातार चुनाव से सामान्य जनजीवन बाधित होता है और आवश्यक वस्तुओं के आदान-प्रदान पर असर पड़ता है. राजनीतिक रैलियों से ट्रैफिक में दिक्कतें आती हैं और साथ ही वायु प्रदूषण भी होता है.
  4. चुनाव के दौरान अक्सर कर्मचारियों को चुनावी ड्यूटी में लगा दिया जाता है. 2014 में सीटू की 1077 कंपनियां जबकि सीएपीएफ की 1349 कंपनियां तैनात की गई थीं क्योंकि इस साल ओडिशा, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के साथ लोकसभा के भी चुनाव हुए थे.

गैर राजनीतिक रुख

रिपोर्ट में हालांकि इस बात का जिक्र नहीं किया गया है कि कैसे एक साथ चुनाव कराए जाने से उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले खर्च में कमी आएगी. नहीं इसमें यह बताया गया है कि आचार संहिता लागू होने के कारण नीति निर्माण में किस तरह से बाधा आती है.

वहीं चुनाव की वजह से सामान्य जनजीवन में होने वाली बाधा का जिक्र करना गैर राजनीतिक और बेतुका रुख है. चुनाव लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा होते हैं और भारत में यह किसी त्योहार की तरह होता है.

लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाने के पीछे  सबसे अहम कारण चुनाव में होने वाला खर्च है

समिति की सिफारिश के बाद ही इस देश में सभी चुनावों को एक साथ कराए जाने की बहस शुरू की जा रही है. इसमें कहा गया है कि लोकसभा या विधानसभाओं के कार्यकाल को किसी कीमत पर नहीं बढ़ाया जाना चाहिए. रिपोर्ट में हालांकि आपातकाल जैसे अपवाद का जिक्र किया गया है. हालांकि चुनाव आयोग किसी भी सदन के कार्यकाल खत्म होने के छह महीने पहले चुनाव की घोषणा कर सकता है.

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इस मामले में लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को एक साथ कराए जाने का एक ही तरीका है कि इसे दो चरणों में पूरा किया जाए. विधानसभाओं का चुनाव नवंबर 2016 में जबकि लोकसभा का चुनाव जून 2019 में कराया जाए.

दूसरे चरण के चुनाव को लेकर रिपोर्ट कहती है कि इसे 2019 के आम चुनाव के साथ कराया जा सकता है.

चुनाव को लेकर रिपोर्ट में जो कुछ समाधान बताया गया है वह अधूरा ही है क्योंकि इसमें विधानसभा चुनाव के साथ लोकसभा चुनाव को कराए जाने को लेकर स्पष्ट ढांचें का जिक्र नहीं किया गया है. शायद इसलिए क्योंकि इसकी संभावना न के बराबर है.

First published: 13 April 2016, 8:23 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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