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एक पलायन यह भी: 35 हजार मुसलमान बनारस छोड़ गए

आवेश तिवारी | Updated on: 29 June 2016, 7:37 IST

'आप कैराना की बात करते हैं. इन आंखों में देखिए. बनारस हमारे बच्चों का बचपन खा गया. उनकी मां सपनोंं में चीख-चीख कर उन्हें बुलाती है. वो आते भी हैं लेकिन फिर लौट जाते है.'

65 साल के नुरुल जब यह बात कहते हैं तो उनका शरीर कांप रहा होता है और आंखें मानो बाहर आ जायेंगी. मगर आंखें नहीं एक समुन्दर बाहर आता है. बनारस के मदनपुरा में सड़कें और बाजार इन दिनों रोजेदारों से पटी पड़ी है. वैसे तो आम दिनों में भी यहां की गलियों, सड़कों और दुकानों पर टोपी और लुंगी पहने हर उम्र के लोग गपशप करते नजर आते हैं, लेकिन रमजान के मौके पर भीड़ बढ़ जाती है.

मदनपुरा से लगभग छह किलोमीटर दूर जैतपुरा में भी यही माहौल है. अंतर बस इतना है कि मदनपुरा की तरह जैतपुरा में आलीशान बिल्डिंग चौड़ी सड़कें नजर नहीं आती है. आम बनारसी मदनपुरा को अमीर मुसलमानों का और जैतपुरा को गरीब मुसलमानों का मोहल्ला बताता है, हालांकि दोनों ही मोहल्लों में बनारसी सिल्क के ताने-बाने के बीच बुनकरों के सपने पलते बढ़ते रहे हैं. लेकिन अब यह ताना-बाना और यह सपने बुरी तरह से टूट चुके है.

हिन्दू-मुस्लिमों की दूरियों के बीच घने होते रहे मोहल्ले

रामजन्म भूमि आन्दोलन के बाद से लगभग चार लाख की आबादी वाले इन दोनों मुहल्लों में बहुत कुछ बदला है. बनारस में बुनकरों की कुल आबादी सरकारी आंकड़ों में 5 लाख बतायी जाती है. लेकिन सर्वाधिक मुस्लिम घनत्व वाले यही दो मोहल्ले हैं. इनमें एक बड़ी तादात बुनकरों की है.

दुखद यह है कि पलायन करने वाला मुसलमान वो है जो मजदूरी करके अपना पेट भरा करता था

बाबरी मस्जिद के विध्वंस काल के बाद से बनारस के इन दो मोहल्लों से लगभग 35 हजार मुसलमान देश के अलग अलग राज्यों में पलायन कर चुके हैं. यह आंकड़ा 1990 के बाद से बंद हुए हथकरघा कारखानो में काम करने वाले मजदूरों की अनुमानित संख्या है. ये मजदूर बनारसी साड़ी बनाने के काम में लगे हुए थे. दुखद यह है कि पलायन करने वाला मुसलमान वो है जो मजदूरी करके अपना पेट भरा करता था.

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यह बात अजीबो गरीब मगर सच है कि आज के बनारस में पैसे वाले मुसलमान मुंहमांगी कीमत देकर मुस्लिम आबादी में अपना घर ढूंढ रहे हैं तो वहीं मुस्लिम आबादी में रहने वाले हिन्दू भी कौड़ियों के दाम पर अपने घर मकान जमीन बेचकर हिन्दू बहुल आबादी की ओर रुख कर रहे हैं.

विवेकानंद विद्यालय में शिक्षक तेजनारायण का घर जैतपुरा में हुआ करता था. लेकिन पिछले महीने उन्होंने अपना मकान बेच दिया. अब वो फव के मोहल्ले में एक पुराने मकान तोड़ कर अपना नया घर बनवा रहे हैं.

गदौलिया चौराहे से सटी एक चाय की अड़ी पर बैठे रईस से यह पत्रकार पूछता है कि मदनपुरा में हिंदुओं के घर कितने हैं वो कहते हैं यहां अब कोई हिन्दू नहीं रहता. ये सारे बदलाव 1990 के बाद से हुए हैं.

गुजरात में भटक रही बनारसियत

गुजरात के सूरत, बंगलुरु और मुंबई की ओर हुए इस पलायन की भयावहता का अंदाजा जनगणना विभाग की सूची से लगाया जा सकता है. आंकड़े बताते हैं कि 1990-91 में वाराणसी और चंदौली के 75,324 हथकरघा कारखानों में करीब 1.24 लाख बुनकर काम करते थे जबकि 1,700 पावरलूम में 7000 बुनकरों को काम मिला हुआ था.

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लेकिन 2009-2010 में वाराणसी में हथकरघा बुनकरों की संख्या घटकर 95,372 रह गई तो हथकरघा कारखाने 52 हजार रह गए. मदनपुरा के रफीक अंसारी कहते हैं, 'हमारे यहां शायद ही कोई परिवार ऐसा होगा जिसके यहां से कोई न कोई बाहर न गया हो.' रफीक कहते हैं बाहर जाने वाले ज्यादातर लड़के हैं इसलिए हमारे मोहल्ले अब बुजुर्गों के मोहल्ले बन गए हैं.

बनारस से इतने बड़े पैमाने पर हुए पलायन को समझने के लिए आमतौर पर हथकरघा उद्योग की बदहाल स्थिति को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है. निस्संदेह हिंदुस्तानी बाजार में चीन के प्रवेश और बनारसी साड़ियों की नक़ल पर पर आधारित सूरत का साड़ी उद्योग इस पलायन की एक वजह रहा है. लेकिन तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है जो बेहद भयावह है, राजनीतिक है, लेकिन उस पर कोई राजनीतिक दल बात नहीं करता.

राम-नाम पर दंगों ने तोड़ डाले मोहब्बत के धागे

बनारस से हुए इस बड़े पलायन के पीछे दंगों का एक पूरा इतिहास जिम्मेदार रहा है. 1989 से 1992 के दौरान बनारस शहर में सात बार दंगे हुए और सात बार कर्फ्यू लगा. 

इन सबका नतीजा यह हुआ कि बुनकर जुलाहों में डर और आतंक का गहरा अंधेरा छाने लगता था

उस वक्त को याद करते हुए लेखक साहित्यकार रामाज्ञा शशिधर कहते हैं, ''बाबरी मस्जिद ध्वंस से पहले पूरा बनारस मिथकीय, प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक गतिविधियों का ’थियेटर’ बन गया. दुर्गा पूजा और मोहर्रम ने काशी में दंगों का दंगल इस कदर शुरू किया कि शांति, साधना, शास्त्रार्थ, करघे और शहनाई के मुहल्ले छोटी-छोटी अयोध्याएं और छोटे-छोटे पाकिस्तान में तब्दील किए जाने लगे. गली-मुहल्ले में राम मंदिर के लिए ईंट के नाम पर बड़े पैमाने पर जुलूस, नारे, भगवा ध्वजारोेहण, गाय-बैलों की यात्रा होती थी.”

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इस दौरान अनेक स्तरों पर चंदा उगाही होती थी. शाम होते ही बनारस की छतों पर घंटा घड़ियाल चीखने लगते थे. इन सबका नतीजा यह हुआ कि बुनकर जुलाहों में डर और आतंक का गहरा अंधेरा छाने लगता था. इस दौरान लोहता और मदनपुरा क्षेत्र में दंगों के दौरान कई जानें गईं. इस माहौल ने जुलाहे बुनकर और हिन्दू साड़ी गद्दीदारों के बीच भी तनाव बढ़ा दिया.

नतीजा पलायन के रूप में सामने आया. इन सबका परिणाम हुआ कि बनारस के नगर निगम, विधानसभा क्षेत्रों और लोकसभा पर बीजेपी का कब्जा हो गया जो आज तक एकछत्र शासनारूढ़ है.

क्या बनारस का मुसलमान भयभीत है

हम काशी के मुस्लिम बहुल इलाकों में घूमते हुए यह सवाल कई लोगों से पूछते हैं कि क्या बनारस का मुसलमान भयभीत है? जवाब दो ही मिलते हैं. या तो नहीं या फिर खामोशी. नई सड़क के गुलाम रसूल बताते हैं, ''मैं रामापुरा में रहता हूं चारों ओर हिन्दू, एक घर मेरा.”

रसूल बताते हैं जब बाबरी मस्जिद के ढहने के बाद दंगे भड़के तो उनके घर वाले रामापुरा से नई सड़क यह कहकर ले आये कि तुम्हारे साथ कुछ बुरा न हो जाए, लेकिन हुआ उल्टा, जब वे नई सड़क आ गए तो वहां से पुलिस वालों ने पकड़ लिया खैर अच्छी बात यह थी कि उन्हें हिन्दुओं ने छुडाया.

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लेकिन सारे मुसलमान इतने खुशनसीब नही रहे. मदनपुरा और जैतपुरा के मेरे कई साथी उस आंधी के शिकार हो गए, जो नहीं हुए उन्होंने भय से पलायन करना ही ठीक समझा.

गुलाम रसूल कहते हैं कि वह भय अब नहीं है, जिन्हें जाना था वह बनारस छोड़ कर जा चुके हैं, अब जो हैं वो जानते हैं कि बनारस उनका नसीब है उन्हें बनारस की ही मिटटी में मिल जाना है.

First published: 29 June 2016, 7:37 IST
 
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