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2026 तक देश की 33% संसदीय ताकत उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में सिमट जाएगी

अभिषेक पराशर | Updated on: 6 May 2016, 10:43 IST
QUICK PILL
  • अगले एक दशक में लोकसभा में उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से आने वाले सांसदों की संख्या मौजूदा 29 फीसदी से बढ़कर 33 फीसदी हो जाएगी.
  • अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश की आबादी 24.9 करोड़ होगी और उसके सांसदों की संख्या 96 होगी. जबकि बिहार की आबादी 11.4 करोड़ और उसके सांसदों की संख्या 44 होगी. वहीं पश्चिम बंगाल की आबादी 10.1 करोड़ होगी और उसके सांसदों की संख्या 39 होगी.

चीन की बूढ़ी होती आबादी के मद्देनजर अगले कुछ दशकों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत को यहां की बढ़ती युवा आबादी से जोड़कर देखा जा रहा है.

अर्थशास्त्र में युवा आबादी की ताकत को डेमोग्राफिक डिविडेंस के तौर पर आंका जाता है और इसका जिक्र भारत के पिछले तीन आर्थिक सर्वेक्षण में भी किया गया है.

वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में डेमोग्राफिक  डिविडेंस से मिलने वाला लाभ डेवेलपमेंट मॉडल के साथ अन्य कई बातों पर निर्भर करता है. यह ग्रोथ आधारित डिवेलपमेंट मॉडल के मुकाबले जॉब आधारित डेवेलपमेंड मॉडल की मदद से युवाओं की बड़ी आबादी को जीडीपी से जोड़ने में मदद मिलती है. यह सीधे-सीधे सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है.

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सुपरपावर बनने की दिशा में भारत को उसके डेमोग्राफिक डिविडेंड से मिलने वाले फायदे और ताकत के बारे में अभी कहना मुश्किल है लेेकिन इसकी वजह से अगले दशक में भारत की संसदीय राजनीति की शक्ल पूरी तरह से जरूर बदल जाएगी.

फिलहाल लोकसभा में 29 फीसदी सांसद उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल से आते हैं. गंगा के समतल मैदान के डेमोग्राफिक डिविडेंड पर कोटक सिक्योरिटीज की ताजा रिपोर्ट ने इस पर रोशनी डाली है. अगले एक दशक में लोकसभा में इन राज्यों की भागीदारी मौजूदा 29 फीसदी से बढ़कर 33 फीसदी हो जाएगी.

साफ शब्दों में कहा जाए तो लोकसभा में एक तिहाई सांसद इन राज्यों के होंगे जबकि बाकी के दो तिहाई सांसद पूरे देश से आएंगे.

अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश की आबादी 24.9 करोड़ होगी और उसके सांसदों की संख्या 96 होगी

अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश की आबादी 24.9 करोड़ होगी और उसके सांसदों की संख्या 96 होगी. जबकि बिहार की आबादी 11.4 क रोड़ और उसके सांसदों की संख्या 44 होगी. वहीं पश्चिम बंगाल की आबादी 10.1 करोड़ होगी और उसके सांसदों की संख्या 39 होगी.

फिलहाल उत्तर प्रदेश से 80 सांसद चुनकर आते हैं जबकि बिहार से निर्वाचित होने वाले सांसदों की संख्या 40 है. वहीं पश्चिम बंगाल से आने वाले सांसदों की कुल संख्या 42 है.

रिपोर्ट में गंगा के मैदानी भाग में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल को शामिल किया गया है. भारत की आधी आबादी वाले इस इलाके में प्रजनन दर देश के राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा रही है.

बिहार की एक महिला औसतन 3.4 बच्चों को जन्म देती हैं जबकि उत्तर प्रदेश में यह औसत 3.1 है. देश की महिलाओं के लिए यह औसत दर 2.3 है. रिपोर्ट के मुताबिक अगर जनसंख्या के आधार पर भारत की संसदीय सीटों को पुनर्निधारण किया जाता है तो गंगा के मैदानी भागों में आने वाले राज्यों से लोकसभा में 275 सांसद जाएंगे.

1971 की जनगणना के आधार पर संविधान में हर राज्य सेे आने वाले सांसदों की संख्या तय कर दी गई थी. हालांकि इसमें समय-समय पर परिसीमन होता रहा है. लेकिन इसके तहत संसदीय क्षेत्रों की सीमा को बदला गया ताकि आबादी के लिहाज से उन्हें प्रतिनिधित्व मुहैया कराया जा सके. इस दौरान कम प्रजनन वाले राज्यों के राजनीतिक हितों की हिफाजत के लिए पिछले 45 वर्षों के दौरान राज्यों से आने वाले सांसदों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया.

उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में कुल 39.4 करोड़ आबादी रहती है तो कुल आबादी की एक तिहाई है

कोटक की रिपोर्ट बताती है कि 2026 के बाद संविधान को इस समीकरण में बदलाव करना होगा. आबादी के लिहाज से भारत के चार बड़े राज्यों में से तीन राज्य गंगा के मैदानी इलाकों से आते हैं. 

उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में कुल 39.4 करोड़ आबादी रहती है तो कुल आबादी की एक तिहाई है. वहीं महाराष्ट्र देश का दूसरा बड़ा आबादी वाला राज्य है. महाराष्ट्र की आबादी 11.2 करोड़ है.

मैदानी इलाकों से आने वाले इन तीन बड़े राज्यों में से एक बिहार में पिछले साल चुनाव हो चुका है. वहीं पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं जबकि लोकसभा सीटों के लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 2017 में विधानसभा के चुनाव होने हैं.

बढ़ेगी सांसदों की संख्या?

गंगा के मैदानी इलाकों से आने वाले सांसद करीब 25 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि देश के दूसरे हिस्से से आने वाले सांसद 20 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ती आबादी के अनुपात में अगर सीटों की संख्या में बदलाव नहीं किया गया तो 2026 में गंगा के मैदानी भाग से आने वाला एक सांसद जहां 29 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करेगा वहीं अन्य इलाकों से आने वाला सांसद 23 लाख लोगों का प्रतिनिधि होगा.

आबादी और प्रतिनिधित्व के अनुपात को इस तरह से समझा जा सकता है कि 2011 की जनगणना के मुताबिक जहां भारत का एक सांसद औसतन 22 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा था वहीं ब्रिटेन में एक सांसद महज 65 लाख लोगों का नेता था.

भारत ने जब 1971 की जनगणना यानी 54.8 करोड़ की आबादी के आधार पर 543 सांसदों की संख्या तय की तब प्रति 10 लाख लोगों पर एक सांसद रखा गया. बाद में आबादी बढ़ती गई लेकिन सांसदों की संख्या में उस अनुपात में बदलाव नहीं किया गया.

डेमोग्राफिक डिविडेंड के बारे में अक्सर कहा जाता है कि अगर इसे सही तरीके से मैनेज नहीं किया गया तो इसे डिजास्टर में तब्दील होते देर नहीं लगेगी. 

बड़ी युवा आबादी को देश की अर्थव्यवस्था में शामिल किए जाने की योजना कैसे आगे बढ़ेगी, यह घरेलू नीतियों के साथ बहुत हद तक वैश्विक आर्थिक नीति की दिशा पर भी निर्भर करेगा. हालांकि अगले एक दशक में भारत की युवा आबादी लोकसभा के राजनीतिक समीकरण जरूर बदल देगी. 

First published: 6 May 2016, 10:43 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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