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आॅपरेशन ब्लूस्टार की बरसी और पंजाब का माहौल

राजीव खन्ना | Updated on: 4 June 2016, 8:39 IST
QUICK PILL
  • आॅपरेशन ब्लूस्टार को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर भारतीय सेना ने वर्ष 1984 में 3 जून से 8 जून के बीच अंजाम दिया था.
  • भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ो के अनुसार आॅपरेशन ब्लूस्टार में कुल  492 साधारण नागरिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.
  • इस हमले के चार महीने बाद ही इंदिरा गांधी के दो सिख अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी जिसे आॅपरेशन ब्लूस्टार के बदले के रूप में देखा जाता है.

छह जून को आॅपरेशन ब्लू स्टार की 32वीं बरसी से पहले विधानसभा चुनावों के मुहाने पर खड़े पंजाब के लोगों ने अपना दिल थाम रखा है. राज्य में बीते एक वर्ष के दौरान सामाजिक-धार्मिक और सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्रों में घटे घटनाक्रम के मद्देनजर इस बरसी की खासी महत्ता है. चुनावों में एक वर्ष से भी कम का समय बचा होने के चलते इन घटनाक्रमों और प्रतिक्रियाओं के जारी रहने की पूरी उम्मीद की जा रही है.

आॅपरेशन ब्लूस्टार को भारतीय सेना ने वर्ष 1984 में 3 जून से 8 जून के बीच अंजाम दिया था. इसके तहत अमृतसर स्थित हरमिंदर साहिब परिसर से आतंकियों और उनके नेता जरनैल सिंह को बाहर निकाल कर मंदिर पर नियंत्रण किया गया था.

इस आॅपरेशन को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर अंजाम दिया गया था. इसके तुरंत बाद पंजाब के अंदरूनी और ग्रामीण क्षेत्रों में छिपे संदिग्ध आतंकियों को निशाना बनाते हुए आॅपरेशन वुडरोज़ भी प्रारंभ किया गया.

भारत सरकार के आधिकारिक अनुमानों के अनुसार आॅपरेशन ब्लूस्टार में कुल मिलाकर 492 साधारण नागरिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था जबकि मानवाधिकर संगठनों का अनुमान इससे कहीं अधिक लोगों के प्रभावित होने का था. इस अभियान में सेना के 83 जवानों की जान गई जबकि 200 से भी अधिक कर्मी घायल हुए.

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अपने सर्वोच्च धार्मिक पीठ पर हुई इस सैन्य कार्रवाई को लेकर सिख समुदाय के भीतर बेहद नाराजगी का माहौल था. इसके अलावा लोगों में इस बात को लेकर भी काफी असंतोष था कि सरकार ने ऐतिहासिक कलाकृतियों और सिख संदर्भ पुस्तकालय में रखी पांडुलिपियों को अपने कब्जे में लेने के बाद उसमें आग लगा दी.

सिख समुदाय ब्लूस्टार की तुलना अहमद शाह दुर्रानी के आक्रमण के दौरान हुए ‘‘प्रसिद्ध नरसंहार’’ से करता है

इस हमले के चार महीने बाद ही इंदिरा गांधी के दो सिख अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी जिसे आॅपरेशन ब्लूस्टार के बदले के रूप में देखा जाता है. इसकी परिणति सिख विरोधी दंगों के रूप में हुई जिसमें सिख समुदाय के लोगों को निशाना गनाया गया और दिल्ली सहित देशभर में उनका बड़े पैमाने पर नरसंहार किया गया.

आॅपरेशन ब्लूस्टार अब ऐतिहासिक महत्व की घटना का रूप ले चुका है और सिख समुदाय इसकी तुलना 1762 में अहमद शाह दुर्रानी के आक्रमण के दौरान हुए ‘‘प्रसिद्ध नरसंहार’’ से करता है.

बीते एक वर्ष एक दौरान पंजाब में धार्मिक तनाव बढ़ता ही जा रहा है. इसकी शुरुआत बीते वर्ष एक जून को फरीदकोट जिले के गांव बुर्ज जवाहर सिंह वाला में गुरू ग्रंथ साहिब को अपवित्र करने की घटनाओं की एक विस्तृत श्रृंखला के साथ हुई.

सबसे बुरी घटना बड़गड़ी गांव में हुई जहां गुरू ग्रंथ साहिब के 110 से भी अधिक पन्ने एक गुरूद्वारे के बाहर जमीन पर पड़े मिले. अगले तीन महीनों के दौरान फिरोजपुर, फरीदकोट, मुक्तसर, संगरूर, नवाशहर, आदमपुर और तरनतारन में भी ऐसी ही घटनाओं के साक्षी बने.

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जनता के बीच बड़े पैमाने पर आक्रोश फैल गया. फरीदकोट के बेहबल कलां गांव के निकट पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर की गई गोलीबारी में दो व्यक्तियों की मौत ने लोगों के आक्रोश को और अधिक हवा दी.

राज्य मेें राष्ट्रपति शासन लगाये जाने की मांग के बीच बड़ी संख्या में अकाली राजनेताओं और यहां तक कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने सरकार के पवित्र पुस्तकों की सुरक्षा में विफल रहने के विरोध में इस्तीफा दे दिया. खंडूर साहिब विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक रमनजीत सिंह सिक्की ने इसके विरोध में इस्तीफा तक दे दिया और उनकी पार्टी ने उपचुनाव में भाग भी नहीं लिया.

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हालांकि पवित्र पुस्तकों को अपवित्र करने के मामले में कुछ लोगों को गिरफ्तार जरूर किया गया है लेकिन इस पूरे प्रकरण के पीछे कौन था इसे लेकर कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आ पाई है.

सीबीआई को इस मामले की जांच सौंपने के बावजूद अभी तक कुछ भी ठोस सामने नहीं आ पाया है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित जांच आयोग ने बेहबल कलां में लोगों पर अकारण गोलीबारी करने के लिये पुलिस को बराबर का दोषी पाया है.

खंडूर साहिब उपचुनाव में कांग्रेस के भाग न लेने की घोषणा करते हुए पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष अमरिंदर सिंह ने प्रकाश सिंह बादल पर निशाना साधते हुए कहा, ‘‘अपवित्रीकरण के लिये किसी को सजा देने की बात तो दूर यह सरकार अभी तक एक भी दोषी की पहचान तक नहीं कर पाई है. न ही अबतक शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलीबारी करने और बेकसूरों की जान लेने वाले दोषी पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है. राज्य में ऐसी नियंत्रित अस्थिरता को बढ़ावा देना बादल का निर्णय था.’’

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पवित्र पुस्तकों के अपमान का मामला अभी तक लोगों के जेहन में जिंदा है. सिख कट्टरपंथियों ने 10 नवंबर को शरबत खालसा का आयोजन किया जिसमें पवित्र पुस्तकों के अपमान और डेरा सच्चा सौदा प्रमुख बाबा राम रहीम को क्षमादान देने को लेकर सरकार की कड़े शब्दों में आलोचना की गई.

कट्टरपंथियों ने हाल ही में बैसाखी मेले में भी तलवंडी साबू में एक और शरबत खालसा के आयोजन का आह्वान किया है.

अमृतसर के चाबा गांव में अयोजित हुए शरबत खालसा में इस मंडली ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा नियुक्त किये गए जत्थेदारों के समानांतर लोगों की नियुक्ति की.

सरकार का सारा जोर यह सुनिश्चित करने पर रहेगा कि यह जत्थेदार ब्लूस्टार की बरसी पर अकाल तख्त तक न पहुंचने पाएं. शीर्ष स्थान अकाल तख्त के लिये शरबत खालसा ने ध्यान सिंह मांड को कार्यकारी जत्थेदार के रूप में नियुक्त किया है. वे पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे जगतार सिंह हरावा की गैरहाजिरी में इस पद को संभालेंगे जिन्हें शरबत खालसा के दौरान अकाल तख्त का जत्थेदार चुना गया था.

सरकार का सारा जोर यह सुनिश्चित करने पर रहेगा कि यह जत्थेदार ब्लूस्टार की बरसी पर अकाल तख्त तक न पहुंचने पाएं

इस बात की पूरी संभावना है कि मांड 6 जून को होने वाले कार्यक्रम में भाग लेने का पूरा प्रयास करेंगे. सिखों के धार्मिक क्षेत्र में हाल के दिनों में घटे घटनाक्रम ने जलती हुई आग को हवा देने का काम किया है. इनमें मुख्य रूप से धार्मिक प्रवचन देने वाले रणजीत सिंह ढंढ़रियावाले पर हुआ हमला शामिल है जिसमें वे बाल-बाल बच गए. हालांकि कुछ दिन पूर्व लुधियाना के नजदीक उनके काफिले पर हुए इस हमले में उनके निकट सहयोगी भुपिंदर सिंह की मौत हो गई.

करीब दर्जनभर हमलावरों ने खलिस्तान के समर्थन में नारेबाजी करते हुए राहगीरों को ठंडा पेय पिला रहे एक ‘छबील’ के पास इस हमले को अंजाम दिया. भिंडरावालें को पालने-पोसने वाली दमदमी टकसाल के प्रमुख हरनाम सिंह धुम्मा खुलकर इन हमलावरों के समर्थन में सामने आ गए हैं.

इस हमले के बाद प्रदेश के तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं में ढंढ़रियावाले से मिलकर उन्हें अपना समर्थन देने की होड़ तक लग गई. वे धुम्मा के साथ वाकयुद्ध में लगे हुए हैं और इस हमले की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं.

ढंढ़रियावाले पवित्र पुस्तकों के अपमान के मामले पर मुखर रहने वालों में से एक थे. उन्होंने धुम्मा को ‘‘सरकारी संत‘‘ कहने के अलावा टकसाल की ‘दस्तर’ (पगड़ी) को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां भी कीं जिसे लेकर धुम्मा ने उनके खिलाफ बयान भी दिये.

धुम्मा ने ढंढ़रियावाले को समर्थन देने आने वाले राजनेताओं पर भी निशाना साधते हुए कहा है कि वे लोग उस वक्त कहां थे जब ढंढ़रियावाले ने उनके खिलाफ टिप्पणियां की थीं.

बादल ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि एक बार जब राज्य सरकार ने उक्त प्रकरण की जांच का जिम्मा पूरी तरह से सक्षम पुलिस को सौंप दिया है तो फिर एक केंद्रीय जांच एजेंसी को इसमें शामिल करने का कोई फायदा नहीं है. बादल ने कहा, ‘‘इस मामले में किसी भी पूर्व-नतीजे पर पहुंचने से पहले जांच का अंतिम परिणाम सामने आने तक रुकना अधिक बेहतर रहेगा.’’

अमरिंदर ने सीबीआई जांच से इंकार करने को लेकर बादल पर कड़ा हमला बोला है. उन्होंने कहा, ‘‘इस बात में कोई शक नहीं है कि बादल किसी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं और इसी वजह से उन्होंने सीबीआई जांच की मांग ठुकराई है.’’

ढंढरियांवाले पर हुए हमले से कुछ समय पहले अप्रैल में नामधारी संप्रदाय के पूर्व प्रमुख सतगुरु जगजीत सिंह की 88 वर्षीय पत्नी चांद कौर की हत्या कर दी गई थी. उनकी हत्या लुधियाना के नजदीक भैनी साहिब स्थित नामधारी संप्रदाय के मुख्यालय में गोली मारकर कर दी गई थी और उनके हत्यारे अबतक कानून के शिकंजे से बाहर हैं.

6 जून को कट्टरपंथियों के संगठन दल खालसा द्वारा बुलाये गए अमृतसर बंद के आह्वान के मद्देनजर राज्य सरकार ने सुरक्षा-व्यवस्था के तमाम उपाय किए हैं. सुरक्षा बलों ने अमृतसर के संवेदनशील क्षेत्रों में फ्लैगमार्च भी किया.

बादल का कहना है कि प्रत्येक वर्ष 1 से 6 जून तक आयोजित होने वाले घल्लूघारा सप्ताह के दौरान शांति, सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे को बनाये रखने के अलावा कानून-व्यवस्था की स्थिति को सुनिश्चित करने के लिये निश्चित सुरक्षा उपायों को उठाना सरकार का कर्तव्य है.

एसजीपीसी प्रमुख अवतार सिंह मक्कड़ ने कहा है कि केंद्र सरकार को संसद में सिख समुदाय से माफी मांगनी चाहिये. उन्होंने कहा, ‘‘सरकार की ऐसी कोई पहल ऐतिहासिक होने के साथ आपसी भाईचारे को मजबूती प्रदान करेगी. सरकार को कनाडा की सरकार से प्रेरणा लेनी चाहिये जिसने कोमागाटा मारू प्रकरण के लिये माफी मांगकर इतिहास रच दिया है.’’

First published: 4 June 2016, 8:39 IST
 
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