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'विनम्रता' और 'उदारता' से लबरेज झुंड को माफ करता हूं'

अभिषेक पराशर | Updated on: 19 January 2016, 22:40 IST
QUICK PILL
  • जो चीज केंद्रीय मंत्री बंडारु दत्तात्रेय बर्दाश्त नहीं कर सकते थे वह था हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में चल रही छात्रों की गतिविधियां. उनकी नाक के नीचे विश्वविद्यालय में उन्हें एक वेमुला मंजूर नहीं था. 
  • दत्तात्रेय का राष्ट्रविरोधी संगठन वेमुला का घर था जिसमें उसे अपने लोग दिखाई देते थे. वे वेमुला की तरह ही आजाद ख्यालों से लबरेज थे और विश्वविद्यालय से बाहर धकियाए जाने के बावजूद उन्होंने वेमुला का साथ नहीं छोड़ा था.

17 अगस्त 2015 को केंद्रीय मंत्री बंडारु दत्तात्रेय ने सिकंदराबाद का जनप्रतिनिधि होने का हवाला देते हुए शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी को एक चिट्ठी लिखी. चिट्ठी में उन्होंने जो लिखा वह किसी जवाबदेह सांसद से ज्यादा एक ऐसे व्यक्ति की बात थी 'जो जातिवाद, अतिवाद और राष्ट्र-विरोधी' राजनीति से देश पर आसन्न खतरे से चिंतित था. देश को टूटते वह नहीं देख सकता था.

दत्तात्रेय को देश की ऐसी किसी 'आदर्श' व्यवस्था के टूटने से कोई तकलीफ नहीं थी जहां माफिया राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं, चुनावों के पहले जातीय समीकरणों की गोटियां बिछाई जाती हैं, छोटे-छोटे वोट के ठेकेदारों को पैसा खिलाया जाता है और सांसद या विधायक बनने वालों में अक्सर अपराधी भी होते हैं. दत्तात्रेय को यह सब बर्दाश्त था.

एक बेगुनाह की मौत का बोझ उठाने की ताकत राष्ट्रवाद ही दे सकता है

जो चीज वो बर्दाश्त नहीं कर सकते थे उसके लिए उन्होंने चिट्ठी लिखी. हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में चल रही छात्रों की गतिविधियां. उनकी नाक के नीचे, (कथित) उनके विश्वविद्यालय में उन्हें एक वेमुला मंजूर नहीं था. उन्होंने जिस अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन को याकूब मेमन की फांसी की सजा के खिलाफ विरोध किए जाने पर राष्ट्रविरोधी करार दिया था उसे वेमुला ने अपना परिवार बताते हुए आखिरी खत लिखा है.

दत्तात्रेय का राष्ट्रविरोधी संगठन दरअसल वेमुला का घर था जिसमें उसे अपने लोग दिखाई देते थे. वे वेमुला की तरह ही आजाद ख्यालों से लबरेज थे और विश्वविद्यालय से बाहर धकियाए जाने के बावजूद उन्होंने वेमुला का साथ नहीं छोड़ा था. इतना आजाद ख्याल जिसके सामने मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा गया.

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लेकिन वेमुला ने अपने सभी गुनहगारों को माफी देते हुए खुदकुशी के फैसले के लिए खुद को जिम्मेदार ठहराने की औपचारिकता निभाई. खुदकुशी के बाद कानून कैसे काम करता है यह उसे पता था. वरना यह लिखने की जरूरत नहीं होती, 'मेरे दोस्तों और दुश्मनों को मेरे जाने के बाद परेशान मत करना.' यह चिंता दोस्तों के लिए थी और उसने दुश्मनों को भी माफ कर दिया.

यह एक 'राष्ट्रविरोधी, जातिवादी और अतिवादी' वेमुला के विचार थे जो अब हमारे बीच नहीं है. और जिन्हें 'राष्ट्र की फिक्र है, जो जातिवादी और अतिवादी' नहीं हैं वह आज भी हमारे बीच हैं. वेमुला ने क्रूर फैसला लेते हुए इस कथित 'विनम्रता और उदारता से लबरेज' झुंड को माफ कर दिया.

उदारता और विनम्रता भी कैसी?

जो थाली में परोसे जाने वाले व्यंजन (मांसाहारी-शाकाहारी) से तय होती है. विनम्रता ऐसी कि एक छोटी असहमति भी गाली-गलौज में तब्दील हो जाती है. संस्कृति ऐसी जो कपड़े से खतरे में पड़ जाती है. और देशभक्ति ऐसी जो एक विरोध प्रदर्शन से दरक जाती है. मैं देशभक्त और मेरी बात नहीं मानी तो सामने वाला गद्दार. और गद्दार तो फिर जीने का हक कैसा? राष्ट्रविरोधी तो रहने का हक कैसा?

वेमुला को मरना ही था उसे मरने के लिए छोड़ा था तुमने और तुम्हारे राष्ट्रप्रेम ने. तुम उसके गुनाहगार थे और उसने तुम्हें सभी गुनाहों से बरी कर दिया. यह बोझ लिए कैसे जिंदा रह सकते हो तुम? सही कहा! इतनी ताकत 'राष्ट्रप्रेम' ही दे सकता है जिसके रास्ते में यह छोटी-मोटी कुर्बानियां होती रहती हैं. फिर तुम क्यों नहीं कुर्बान होते? वेमुला ही क्यों?

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क्योंकि वह 'राष्ट्रविरोधी' होते हुए माफ कर सकता है. तुम्हें तुम्हारे सबक की सजा देने के लिए खुद को खत्म कर सकता है. जो यह कहने की ताकत जुटा सकता है, 'मेरे लिए आंसू मत बहाना. मैं आया और चला गया. जिंदा रहने से ज्यादा मरकर मैं खुश रहूंगा.' उस दुनिया में जहां मेरी पहचान मेरे विचारों से नहीं होगी. मेरे होने से होगी.

तुम्हारे राष्ट्र में यह संभव नहीं था. इसलिए उसे जाना पड़ा. उसे जाने का दुख नहीं था. वह आहत भी नहीं था. बस उसके भीतर शून्य बड़ा हो रहा था. उसे उसकी परवाह नहीं थी और यह उसे ठीक नहीं लग रहा था. इसलिए उसने यह किया. इसके लिए राष्ट्र जिम्मेदार नहीं हो सकता. उसके सामने वेमुला की क्या बिसात? हां, राष्ट्रवादी हो सकते हैं. तो फिर इस शून्य में वह सभी राष्ट्रवादी ही क्यों नहीं समा जाते.

First published: 19 January 2016, 22:40 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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