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आठ दिन में दो बार बंटा विपक्ष, "एकता" पर सवाल

स्कंद विवेक धर | Updated on: 2 July 2017, 13:35 IST

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की अगुवाई में भले ही भाजपा और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एकजुटता दिखाने की कोशिश करते हों, लेकिन अहम मौकों पर उनमें बिखराव सामने आ जा रहा है. बीते जून में ही आठ दिनों के भीतर सत्तारूढ़ भाजपा दो महत्वपूर्ण अवसरों पर विपक्ष को बांटने में सफल दिखी.

विपक्ष में पहला बड़ा बिखराव राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन के मुद्दे पर दिखाई दिया. इसमें भाजपा दलित चेहरे के दांव में फंसकर कांग्रेस को अंतिम वक्त पर न सिर्फ दलित उम्मीदवार उतारना पड़ा, बल्कि विपक्ष के साझा उम्मीदवार की पेशकश करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का साथ भी गंवाना पड़ा. इतना ही नहीं, भाजपा कई गैर-एनडीए और गैर-यूपीए दलों जैसे कि एआईएडीएमके, बीजेडी और टीआरएस का भी समर्थन हासिल करने में सफल रही.

विपक्ष की एकता को दूसरा बड़ा झटका जीएसटी लॉन्चिंग के कार्यक्रम में शामिल होने या न होने के मसले पर लगा. इस बार यूपीए के खास घटक दल एनसीपी ने ही कांग्रेस, टीएमसी और वामदलों के विपरीत कार्यक्रम में शामिल होने का फैसला किया. एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार खुद कार्यक्रम में शामिल हुए. एनसीपी के अलावा समाजवादी पार्टी और जदयू ने भी कार्यक्रम में शिरकत की.

आखिर विपक्ष की एकता बार-बार बिखर क्यों जा रही है? इस सवाल के जवाब में राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं, "भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कूटनीतिक सूझबूझ से अपने कदम उठा रहे हैं. जैसे कि राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए कुछ दलों ने मांग रखी थी कि उम्मीदवार को हार्डलाइनर नहीं होना चाहिए, उम्मीदवार गैर-राजनीतिक नहीं होना चाहिए आदि. भाजपा ने रामनाथ कोविंद के रूप में ऐसा उम्मीदवार उतार दिया जो ये शर्तें पूरा करता है. ऐसे ही जीएसटी के कार्यक्रम के मामले में भी कांग्रेस को यह उम्मीद थी कि कार्यक्रम में मोदी पूरा श्रेय खुद ले लेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं."

 

बकौल चौधरी, "भाजपा जहां इतनी चतुराई से निर्णय कर रही है वहीं कांग्रेस अभी विपक्षी दलों के साथ बिग ब्रदर जैसा व्यवहार कर रही है. कई निर्णय वह बिना विपक्षी दलों में आम राय बनाए हुए ही ले ले रही है. इससे भी विपक्षी दलों की एकता बिखर रही है."

जीएसटी कार्यक्रम के बहिष्कार के पैटर्न को देखें तो निर्णय लेने में विपक्ष के दलों का एकाकी रवैया सामने भी आता है. जीएसटी कार्यक्रम के बहिष्कार की घोषणा सबसे पहले तृणमूल कांग्रेस ने की, इसके बाद कांग्रेस ने भी कार्यक्रम में न जाने का ऐलान किया, कांग्रेस के बाद लालू यादव की राजद और वाम दलों के कार्यक्रम का बहिष्कार करने का फैसला किया. एक साथ फैसला न लेने से सभी दल अपने-अपने तरीके से निर्णय लेते रहे.

हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के इस बिखराव के लिए राजनीतिक विश्लेषक अभय दुबे कांग्रेस को दोष देते हैं. दुबे कहते हैं, "विपक्ष की एकता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस दल के कंधे पर होती है, जिसकी अगुवाई में चुनाव लड़ा जाता है. राज्यों के चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियां इसकी अगुवाई कर सकती हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ये जिम्मेदारी कांग्रेस की है. दुबे कहते हैं कि अगर वास्तव में विपक्ष की एकता को बनाए रखना है ताे कांग्रेस को आज ही बताना होगा कि 2019 का चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जाएगा. अगर राहुल गांधी को उम्मीदवार घोषित करना है तो भी अभी घोषित कर उस पर विपक्षी दलों की सहमति ली जाए. यदि राहुल के नाम पर सहमत नहीं होते तो कांग्रेस की जिम्मेदारी है कि वह दूसरा चेहरा ढूंढ़े, जिस पर सभी सहमत हों. बिना 2019 का लक्ष्य बनाए विपक्ष में एकता नहीं लाई जा सकती."

बहरहाल, चुनाव आयोग ने उप-राष्ट्रपति पद के लिए भी चुनाव की घोषणा कर दी है. विपक्ष को एक और मौका मिला है कि वह अपनी एकता को प्रदर्शित करे. अब देखना है कि इस चुनाव में भी कहीं विपक्ष की एकता एक बार फिर तो नहीं बिखर जाएगी.

First published: 2 July 2017, 13:35 IST
 
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