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केरलः अंगदान का 'फैशन' कहीं मानवता पर भारी न पड़ने लगे

बिनो के जॉन | Updated on: 24 June 2016, 8:05 IST

रविवार, 29 मई को केरल के कोट्टायम जिले में स्थित पाला के एक बिशप राष्ट्रीय समाचार पत्रों के पहले पन्ने पर सुर्खियों में रहे. जिस देश में हर दूसरे दिन संकीर्णता और बदला लेने की खबरें सुर्खियां बनती हैं, बिशप जैकब मुरिकैन ने अपने गुर्दे दान देने का फैसला किया, वह भी एक हिंदू के लिए.

बिशप के इस काम को ईसाई धर्म के अपराध और पापमुक्ति के आंतरिक गुण के तौर पर एक निस्वार्थ बलिदान के रूप में चित्रित किया गया. उससे भी बड़ी बात यह है कि इस घटनाक्रम में प्राप्तकर्ता एक हिंदू होने के कारण बड़ा धर्मनिरपेक्ष संदेश भी था.

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लेकिन वास्तव में बिशप ने केरल की सिर्फ उस नवीनतम चिकित्सा सनक में प्रवेश किया था, जो पिछले पांच वर्षों में आम हो गई है. यह सनक है अंगदान और अंग प्रत्यारोपण की.

इस सामाजिक क्रांति का जश्न लंबे लेखों में मनाया जा रहा है, जैसा द कारवां पत्रिका के एक लेख में मनाया गया है.

सुव्यवस्थित प्रणाली

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में अंगदान महत्वपूर्ण है. केरल के एक सरकारी दस्तावेज के अनुसार, देश में अंगदान दर केवल 0.08 प्रति दस लाख है.

अब जबकि इस काम के लिए एक पूरी प्रणाली विकसित हो गई है तो केरल और तमिलनाडु में अंग प्रत्यारोपण आनन-फानन में हो रहे हैं. सभी तरह की जरूरी व्यवस्था बन गई है, जिसके तहत 'हरित गलियारों (ग्रीन कॉरिडोर)' का निर्माण भी तत्काल किया जा रहा है, जिसके माध्यम से अंगों को तेज गति से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है.

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लेकिन इस सबके बीच इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि अंग प्रत्यारोपण के लिए समय से पहले ही किसी रोगी को मृत घोषित कर दिए जाने का खतरा निहित है तो प्रक्रियाओं के पालन न करने और मानवीय लगाव पर आर्थिक लोभ के हावी होने का खतरा भी है.

एक 'ईसाइयत' वाला काम

लोगों को अंगों को दान देने के लिए प्रोत्साहित करने का सामाजिक आंदोलन फादर डेविस चिरामेल ने शुरू किया था, जब 2008 में उन्होंने अपने गुर्दे दान देने का ऐलान किया था. वास्तव में, जब बिशप मुरिकैन ने इस 28 मई को अपने गुर्दे दान करने के फैसले की घोषणा की, उस समय भी फादर चिरामेल उनके साथ मौजूद थे.

वर्ष 2008 के बाद से, पादरियों और ननों पर भारी दवाब है कि वे ईसाई धर्म की पापमुक्ति की भावना के तहत अपने अंगों को दान करें. ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सिर्फ केरल में ही 15 पादरियों और छह ननों ने अपने अंग दान कर दिए हैं (इंडियन एक्सप्रेस का आंकड़ा).

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वास्तव में यह आंदोलन तब तेज हुआ जब वी-गार्ड इलेक्ट्रॉनिक स्टेबलाइजर्स के निर्माता, यूसुफ चित्तिलापिल्ली ने इसे कॉर्पोरेट समर्थन दिया. उन्होंने कॉरपोरेट गवर्नेंस में कई ईसाई धर्म के विचार शामिल किए हैं जैसे- विचारों की पवित्रता, सीधापन, किसी तरह का अत्यधिक लाभ न लेना आदि-आदि.

चित्तिलापिल्ली अंग दान के लिए एक पुरस्कार भी देते हैं और सक्रिय अभियान चलाते हैं.

गरीबों पर दबाव

जैसे ही किसी गरीब के रिश्तेदार को मस्तिष्क मृत घोषित किया जाता है तो उन पर अंगों को दान करने के लिए भारी दबाव डाला जाता है. ऐसे लोगों को पूरी तरह से व्यावसायिक नजरिए से देखा जाने लगता है.

उदाहरण के लिए, पिछले साल एक अंग मात्र दो घंटे में (सड़क मार्ग से सामान्य समय चार घंटे का होता है) तिरुवनंतपुरम से कोच्चि ले जाया गया था. इस काम में पुलिस ने पूरी दूरी तक 'हरित गलियारा' बनाकर खास मदद दी थी. खास बात यह है कि यह हरित गलियारा मिनटों में बना दिया गया था.

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इसे एक उपलब्धि के तौर पर दर्शाया गया था, सरकार की दक्षता के एक उदाहरण के रूप में इसका स्वागत हुआ था. लेकिन किसी ने भी उसके बारे में कोई बात नहीं की, जिसका अंग ले जाया जा रहा था. आखिरकार वह एक शव था, जिसकी मानवता छीन ली गई थी. उसके परिवार ने तो सिर्फ एक फार्म पर हस्ताक्षर भर किए थे.

अंगदान के मामले में उदारता की जिम्मेदारी हमेशा गरीब पर ही रहती है

जिन लोगों को मस्तिष्क मृत घोषित किया गया, उनमें से कुछ पर किया गया अध्ययन बताता है कि वे सभी गरीब परिवारों से थे.

तीन वर्षीय अंजना की पिछले साल अगस्त में तिरुवनंतपुरम में मृत्यु हो गई और उसे राज्य में सबसे कम उम्र का अंगदाता घोषित किया गया था. उसके मामले में एक रिपोर्ट में कहा गया, "उसके माता-पिता ने रिश्तेदारों की सहमति न होने के बावजूद अंगदान का अनुरोध स्वीकार कर लिया."

कई अन्य मामलों में और इस मामले में भी जीत की भावना ज्यादा थी, उस त्रासदी की भावना कहीं नहीं थी, जिसने एक बाल जीवन छीन लिया था. परिवार की पीड़ा को भी कोई महत्व नहीं दिया गया.

एक अखबार की रिपोर्ट में कहा गया कि "अंजना गुरुवार से एसएटी अस्पताल में भर्ती थी. उसे शनिवार की रात को मस्तिष्क मृत घोषित किया गया था, इसके बाद उसका जिगर, दोनों गुर्दे और कॉर्निया [खराब] दान कर दिया गया."

इस बात का कहीं एक लाइन में भी जिक्र नहीं था कि उसकी मौत कैसे हुई या वह कहां रहती थी या अंगदान की अनुमति किसने दी?

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सोचने वाली बात है कि क्या किसी ने भी यह नहीं कहा कि अंजना को कुछ और दिनों के लिए निगरानी में रखा जाना चाहिए? 

क्या कोई भी उन जख्मों की ओर नहीं देखना चाहता था जिनका दर्द वह लगातार झेल रही थी या उसके लक्षण देखकर क्या उसे बचाने के लिए कोई बेहतर उपचार प्रदान नहीं किया जा सकता था?

पहले दिन को अंजना मस्तिष्क मृत घोषित कर दिया गया और अगले ही दिन उसे एक अंगदाता घोषित कर दिया गया, और तीसरे दिन उसके अंगों को किसी और में प्रत्यारोपित भी कर दिया गया.

हिन्दू अखबार के अनुसार, कोयम्बटूर के पास एक और मामले में "अपने दु:ख के समय भी एक गरीब धोबी परिवार की उदारता ने आठ लोगों की जान बचा ली."

गरीब दुर्घटना मृत्यु पीड़ितों को अब व्यापारिक शव के रूप में देखा जाने लगा है, जबकि अमीर ज्यादा से ज्यादा मेडिकल टेस्ट, जीवन रक्षक प्रणाली पर जोर देते हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि उदारता की जिम्मेदारी हमेशा गरीब पर ही रहती है.

मानदंड, जिनका कोई पालन ही नहीं करता

मानव अंग अधिनियम-1994 के तहत किसी व्यक्ति को मस्तिष्क मृत घोषित किए जाने से पहले कई प्रक्रियाएं अपनानी जरूरी होती हैं. लेकिन, 2008 के बाद 'अंगदान आंदोलन' के उदय से सचेत हुई केरल सरकार ने सख्त मानदंडों की एक पूरी श्रृंखला तैयार की, जिसके तहत अंग प्रत्यारोपण के लिए किसी व्यक्ति को मस्तिष्क मृत घोषित किया जा सकता है.

सरकार की 2011 की अधिसूचना के अनुसार, "इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि मृतक दाता के अंग दान के एक परोपकारी उद्देश्य के साथ और समाज को योगदान के रूप में एक उदार और धर्मार्थ तरीके से किया जाता है, यह आवश्यक है कि इस अंग दान में सभी मोर्चों पर पारदर्शिता बरती जाए जिससे यह सुनिश्चित हो कि अंगदाता के रिश्तेदारों की भावना का पर्याप्त रूप से सम्मान हुआ है." इस अधिसूचना पर प्रमुख सचिव राजीव सदानंदन द्वारा हस्ताक्षर किए गए हैं.

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सख्त प्रक्रिया कहती है कि डॉक्टरों की दो अलग-अलग टीमों द्वारा दो चिकित्सा परीक्षण होने चाहिए. दोनों परीक्षणों के बीच कम से कम छह घंटे का अंतर होना चाहिए.

डॉक्टरों की टीम के गठन की भी अपने आप में एक विस्तृत प्रक्रिया है, जिसे पूरा करने में कम से कम एक दिन लग जाएगा.

  • प्रत्यारोपण से जुड़े चिकित्सक को दोनों में से किसी भी परीक्षण टीम में शामिल होने की अनुमति नहीं है.
  • इन दोनों दो सदस्यीय चिकित्सक दलों में से एक रेजिडेंट मेडिकल प्रेक्टिसनर बाहर के सरकारी अस्पताल से होना चाहिए और उसका चयन एक पैनल द्वारा किया जाना चाहिए.
  • परीक्षण करने वाली टीम में शामिल न्यूरो सर्जन भी बाहर के अस्पताल से होना चाहिए.
  • इसके अलावा, प्राप्तकर्ताओं का निर्णय भी विभिन्न निर्धारित मानदंडों के तहत किया जाना है. विदेशी नागरिकों को सिर्फ उसी अवस्था में अंगदान किया जा सकता है जब भारतीयों की पूरी रजिस्ट्री (अंग प्राप्त करने के इच्छुक लोगों का डाटाबेस) में से कोई भी विभिन्न कारणों में अंगदान के लिए फिट ना हो.

यदि इन सभी प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है तो किसी व्यक्ति को औपचारिक रूप से 'मस्तिष्क मृत' घोषित करने में कम से कम 24 घंटे लगेंगे. लेकिन वर्तमान में, चार या पांच घंटे में यह काम कर दिया जाता है. नियमों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए अंगों को तुरंत काटा जाता है और 24 से 48 घंटों में तो परिवहन और प्रत्यारोपण सब पूरा कर दिया जाता है.

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इसके अलावा, सभी मानदंडों का उल्लंघन करते हुए अकसर विदेशियों को भारतीयों के अंग प्रत्यारोपित किए जा रहे हैं.

लेकिन तिरुवनंतपुरम में सबसे वरिष्ठ न्यूरो सर्जन में से एक मानते हैं कि डॉक्टरों को खुद को ही इस तरह के सरकारी नियमों की जानकारी ही नहीं है.

केरल में अभी जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसके तहत देखभाल करने वाला डॉक्टर दावा करता है कि मरीज का मस्तिष्क मर चुका है और जल्द ही उसी अस्पताल का एक न्यूरोसर्जन इसकी पुष्टि कर देता है.

ऊपर वर्णित मानदंडों में से किसी का भी पालन नहीं किया जा रहा है.

क्या मस्तिष्क मृत और पूर्ण मृत बराबर हैं?

ज्यादातर मामलों में इसका उत्तर हां है. लेकिन विशेषज्ञों द्वारा एमआरआई और ईईजी के माध्यम से सावधानीपूर्वक परीक्षण से मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में रक्त प्रवाह का पता लग सकता है, जिसका मतलब होगा कि मरीज कोमा में है और 'ब्रेन डेड' नहीं है. उसके पुनर्जीवित होने का भी अवसर हो सकता है.

केरल और तमिलनाडु में कुछ मामले में एक मरीज को मस्तिष्क मृत घोषित करने में दिखाई गई जल्दबाजी अत्यधिक खतरनाक है. विशेषकर तब, जब अगर डॉक्टरों की दो निर्धारित समितियां साथ न बैठी हों और मामले का मूल्यांकन न किया हो.

ऑस्ट्रेलिया के एक बड़े डॉक्टर ने इस संवाददाता से बातचीत में बताया कि "किसी मरीज को मस्तिष्क मृत घोषित करने के लिए पुतलियों का फैल जाना, प्रकाश के प्रति कोई प्रतिक्रिया न देना, नाड़ी या दिल की धड़कन का उपस्थित न होना और ईसीजी पर सीधी लाइन होना आवश्यक हैं."

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अधिकांशतः यह प्रक्रिया अपनाई जाती है, लेकिन एक दुर्लभ पुनर्जीवन के लिए जरा सा भी समय नहीं दिया जाता. यहां कुछ गड़बड़ है, जहां कुछ विशेषज्ञ और अधिक समय दिए जाने की जरूरत महसूस करते हैं, विशेषकर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारी प्रगति के कारण जगी उम्मीद से:

मेयोक्लीनिक डॉट ओआरजी के अनुसार, "यह सुनिश्चित करने के लिए कि मस्तिष्क पूरी तरह मृत है और वह पुनर्जीवित नहीं हो सकता, चिकित्सकों को आवश्यक रूप से कोमा का कारण निर्धारित करना चाहिए, उस स्थिति से बचना चाहिए जो इसकी नकल हो सकती है, और कुछ निर्धारित समय अवधि तक यह सुनिश्चित करने के लिए रोगी का निरीक्षण करना चाहिए कि पुनर्जीवन संभव नहीं है." यह महत्वपूर्ण 'समय की अवधि' कभी दी ही नहीं जाती.

शर्तों के अनुसार, यहां तक कि उन रोगियों के मामले में भी पुष्टि हस्ताक्षर प्राप्त किए जाने चाहिए जो अंग दान की इच्छा व्यक्त कर चुके हों, और उनके रिश्तेदार भी इससे इनकार कर सकते हैं. इनमें से किसी का पालन नहीं किया जाता. गरीब परिवारों को अंगदान के लिए लगभग मजबूर कर दिया जाता है. उन्हें बाहर की राय के लिए मौका तक नहीं दिया जाता.

First published: 24 June 2016, 8:05 IST
 
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