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देश में 2 करोड़ अनाथालय, क्या बच्चों को मिल सकता है ओबीसी आरक्षण?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 26 September 2016, 2:27 IST
QUICK PILL
  • एक आंकड़े के मुताबिक देश में दो करोड़ अनाथालाय हैं जहां 10 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते अनाथ हो गए बच्चों के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग ने  ओबीसी आरक्षण का सुझाव दिया है. 
  • वहीं ओबीसी कार्यकर्ताओं और ओबीसी का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ किसी भी श्रेणी को ओबीसी सूची में शामिल करने का विरोध करती ही हैं.

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने सुझाव दिया है कि अनाथ बच्चों को अन्य पिछड़ा वर्ग की केंद्रीय सूची में शामिल किया जाना चाहिए ताकि उन्हें सूची में शामिल बाकी जातियों की ही तरह आरक्षण का लाभ दिया जा सके. यह प्रस्ताव उन बच्चों के लिए है, जो 10 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते ही अनाथ हो गए हों, जिनके कोई संरक्षक नहीं हों और उन्हें सरकारी अनाथालय या सरकारी अनुदान प्राप्त अनाथालय या स्कूल में भर्ती करवाया गया है. 

आयोग ने हाल ही यह प्रस्ताव पास कर के सामाजिक न्याय मंत्रालय को भेज दिया है. अब सरकार इस प्रस्ताव पर विचार करेगी और इसके क्रियान्वयन की संभावनाएँ तलाशेगी. अगर ऐसा हो जाता है तो यह देश की आरक्षण नीति में बड़ा बदलाव साबित होगा. हालांकि कुछ राज्यों में पहले से ही यह प्रावधान लागू है. तमिलनाडु, तेलंगाना और राजस्थान कथित तौर पर ओबीसी सूची में आने वाले अनाथ बच्चों को कई सालों से आरक्षण देते आ रहे हैं. आयोग की सिफारिश है कि ऐसा ही नियम केंद्रीय ओबीसी सूची में भी लागू किया जाए.  

आंकड़ों का गणित

एक एनजीओ एसओएस बालग्राम द्वारा 2011 में किए गये एक अध्ययन के अनुसार, देश में इस समय 2 करोड़ अनाथालय चल रहे हैं. सरकार के पास ऐसा कोई डेटा उपलब्ध नहीं है. विडंबना यह है सरकार जानती है कि देश में कितने ओबीसी हैं लेकिन यह बताती नहीं है. 2011 की जातीय जनगणना के आँकड़े अभी तक सार्वजनिक नही किए गये हैं. जबकि बहुत से वर्ग इसे जारी करने की माँग करते रहे हैं. कुछ ओबीसी राजनेता मानते हैं कि देश की 50 प्रतिशत यानी 60 करोड़ आबादी ओबीसी है. 

अड़चनें

आयोग में ही यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से मंजूर नहीं किया गया क्योंकि कुछ सदस्यों को इस पर आपत्ति थी. आयोग के एक सदस्य डॉ. शकील-उज-जमान अंसारी ने कैच को बताया कि उन्होंने इसलिए नाराज़गी ज़ाहिर की कि क्योंकि उन्हें लगा कि अभी इस सुझाव पर काफी काम किया जाना बाकी है. वे कहते हैं पारंपरिक रूप से आयोग केवल उन्हीं जातियों को केंद्रीय सूची मे शामिल करता है जो बाकी सभी राज्यों की सूची में पहले से दर्ज हैं. आमतौर पर इस आधार पर जातियों को केंद्रीय सूची में दर्ज नहीं किया जाता कि वे राज्य की सूचियों में शामिल नहीं हैं. 

अंसारी ने कहा कि सही मायनों में यह नियम किसी भी श्रेणी को केंद्रीय सूची में शामिल करने से पहले लागू होना चाहिए. साथ ही संकेत दिया कि इससे अनाथ बच्चों की राह में मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं क्योंकि सिर्फ 3 राज्य ही ऐसे हैं जो उन्हें ओबीसी मानते हैं. इसके अलावा एक और अड़चन है. ओबीसी कार्यकर्ताओं और ओबीसी का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ किसी भी श्रेणी को ओबीसी सूची में शामिल करने का विरोध करती ही हैं.

राजनीतिक प्रतिक्रिया

राष्ट्रीय जनता दल प्रवक्ता मनोज झा ने कैच को बताया कि यह प्रस्ताव दरअसल संवेदनशील न्याय के परिप्रेक्ष्य में लाया गया है लेकिन इसका स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों से कोई लेना देना नहीं है. उन्होंने कहा कि ऐसा कदम संविधान के अनुच्छेद 15 व 16 में बताई गयी ओबीसी की परिभाषा के अनुरूप नहीं है जो कि देश में आरक्षण का आधार हैं. और ना ही अनुच्छेद 340 के अनुरूप जिस के अनुसार आयोग काम करता है. झा ने कहा यह एक ज्वलंत समस्या के प्रति बेहद कमजोर रवैया है और सरकार को अनाथों के कल्याण के लिए अलग से उपाय करने होंगे.

प्रस्ताव की आलोचना सरकार में भी हुई। भाजपा सांसद हुक्म देव नारायण यादव ने भी कैच से कहा कि यह प्रस्ताव सही नहीं है क्योंकि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की संवैधानिक परिभाषा में अनाथों को शामिल नहीं किया गया है. उन्होंने कहा कि ओबीसी को पहले ही आजा अजजा की तरह अपनी जनसंख्या के अनुपात में कम आरक्षण मिलता है. ऐसे में ओबीसी सूची में और ज्यादा जातियों को शामिल करने से इनको मिलने वाले कुल आरक्षण में और कमी आएगी. यादव ने कहा कि सरकार और न्यायापालिका, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 50 प्रतिशत कोटे की सीमा को हटाकर, ओबीसी के लिए तय 27 प्रतिशत सीमा को बढ़ाए.

पहले भी हुआ

आयोग ने इससे पहले ऐसा ही प्रस्ताव ट्रांसजेंडरों के लिए पेश किया था कि उन्हे ओबीसी सूची में शामिल कर लिया जाए. इसका भी इतना ही विरोध हुआ था, आखिरकार केंद्र सरकार को यह विचार छोड़ देना पड़ा था. ट्रांसजेंडर लोगों (संरक्षण का अधिकार) विधेयक अगस्त में लोक सभा में पेश किया गया था. उसमें ट्रांसजेंडरों के आरक्षण की कोई बात नहीं कही गयी. अगर नये प्रस्ताव के साथ भी ऐसा ही कुछ होने की आशंका है तो सरकार और आयोग को इसके लिए अभियान छेड़ना होगा या फिर यह विचार त्यागना ही ठीक है. 

First published: 26 September 2016, 2:27 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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