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छत्तीसगढ़: एड्स पीड़ित कम, लेकिन एड्स से मौतें सबसे अधिक

शिरीष खरे | Updated on: 28 April 2016, 22:35 IST
QUICK PILL
  • छत्तीसगढ़ में हर साल एड्स से ढाई हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस आदिवासी बहुल सूबे में एचआईवी संक्रमित लोगों की तादाद 40 हजार से कुछ ज्यादा है.
  • आंकड़े यह भी बताते हैं कि शहरों से ज्यादा गांवों में फैल रहा है जानलेवा वायरस. छत्तीसगढ़ में एड्स पीड़ितों के सेकंड स्टेज की पहचान के लिए जरूरी वायरल लोड परीक्षण की सुविधा मौजूद नहीं है.

भिलाई में एक 13 साल की एचआईवी संक्रमित बच्ची को जिला अस्पताल के डॉक्टरों ने दवा के अभाव में वयस्कों को दी जाने वाली दवा दे दी. दवा का साइड इफेक्ट हुआ और बीमार बच्ची ने दम तोड़ दिया. डॉक्टरों की लापरवाही और सरकारी असुविधाओं के चलते छत्तीसगढ़ में आए दिन इस तरह की खबरें सुनने को मिलती हैै.

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) द्वारा जारी वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ में एड्स से हर साल ढाई हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है. रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में हर साल साढ़े चार हजार से ज्यादा नए एड्स पीड़ित दर्ज हो रहे हैं.

नाको के मुताबिक फिलहाल सूबे में 40 हजार से ज्यादा ज्ञात एचआईवी संक्रमित मरीज हैं. एड्स से मरने वालों के आंकड़े बताते हैं कि रायपुर जिले में अब तक करीब 700 और दुर्ग जिले में 550 लोगों की मौत हो चुकी है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में प्रतिमाह करीब 400 नए एचआईवी के मरीज सामने आ रहे हैं

इन आंकड़ों की एक खास बात यह है कि छत्तीसगढ़ में भले ही अभी एड्स पीड़ित दूसरे राज्यों के मुकाबले कम दिखते हैं, लेकिन मौतों के मामले में यह राज्य सबसे आगे हैं. कुल मिलाकर, एचआईवी संक्रमण छत्तीसगढ़ में महामारी की शक्ल लेता जा रहा है.

राज्य में एचआइवी पीड़ितों के संगठन सीजीएनपी प्लस से जुड़े के मुकेश का दावा है कि प्रदेश में मरने वालों की संख्या सरकारी आंकडों से कहीं अधिक है. सीजीएनपी प्लस के आंकडों के मुताबिक इस समय प्रदेश के 5000 से ज्यादा एड्स पीड़ित उपचार के लिए सरकारी अस्पतालों तक नहीं पहुंच पाते हैं.

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जो एड्स पीड़ित सरकारी अस्पतालों से दूर हैं उनके बारे में सरकारी अधिकारियों को कभी पता नहीं चलता. मुकेश बताते हैं, "सही समय पर दवा नहीं लेने से पीड़ित 2 से 5 सालों में दम तोड़ देते हैं. छत्तीसगढ़ में बीते साल आठ बार दवाइयों का अकाल पड़ा. इसके पहले 2009 में भी दवाइयों की कमी का सामना करना पड़ा था. पिछले साल दवाइयों का टोटा होने से आने वाले समय में मरने वालों की तादात बढ़ सकती है."

राज्य में 2011 से अब तक 2340 टीबी मरीजों की जांच में यह सामने आया कि वे एड्स पीड़ित भी हैं

सीजीएनपी प्लस के मुताबिक एड्स पीड़ितों को मेडिकल और आजीविका की सुरक्षा दिए बिना इस समस्या पर काबू पाना मुश्किल है.

एक और अहम बात यह है कि छत्तीसगढ़ में एड्स पीड़ितों के सेकंड स्टेज की पहचान के लिए वायरल लोड परीक्षण की सुविधा भी नहीं है. इसके अलावा छत्तीसगढ़ एड्स पीड़ितों के लिए अनिवार्य सी4 किट की कमी से भी जूझ रहा है. यहां एड्स की जांच के लिए महज 125 इंटीग्रेटेड कांउसलिंग सेंटर चल रहे हैं.

छत्तीसगढ़ का संपूर्ण जागरुकता अभियान शहरों तक सिमटा हुआ है. यही वजह है कि एड्स से जुड़ी जानकारियां ग्रामीणों तक नहीं पहुंच पा रही हैं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में प्रतिमाह करीब 400 नए एचआईवी के मरीज सामने आ रहे हैं. चौंकाने वाली बात है कि इनमें 300 से ज्यादा प्रकरण दूर-दराज के गांवों से आ रहे हैं. इस मामले में अब तक रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जिलों को ही संवेदनशील माना जाता था, लेकिन अब कवर्धा, बेमतारा, कोरबा, राजनांदगांव और महासमुंद जैसे जिलों से भी संक्रमण के नए केस तेजी से रजिस्टर हो रहे हैं.

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छत्तीसगढ़ के गांवों में बेकारी और सूखे जैसी स्थितियों के कारण पलायन बढ़ा है. काम की तलाश में बाहर गए लोग असुरक्षित सेक्स गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं. ऊपर से कम जानकारी और जागरुकता के अभाव में इसे बढ़ा भी रहे हैं.

नए मरीजों की संख्या में बेतरह बढ़ोत्तरी और हर महीने 200 से ज्यादा एड्स पीड़ितों की मौत पर 'कैच' ने छत्तीसगढ़ राज्य एड्स नियंत्रण समिति के अतिरिक्त परियोजना संचालक डॉ एसके बिंझवार से बातचीत की. बिंझवार के मुताबिक छत्तीसगढ़ में एड्स से जुड़े आंकड़े इसलिए खतरनाक लग रहे हैं कि हम इन्हें छिपा नहीं रहे हैं. हम चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा मरीज सामने आएं जिससे उन्हें दवा मिले और अधिक से अधिक लोग शासन की योजना का फायदा उठा सकें.

वे कहते हैं, "राज्य में एड्स पर नियंत्रण लगाना है तो सबसे पहले इससे जुड़ी वास्तविकता का सामना करें. लोग जागरुक होंगे तभी तो इसका ग्राफ नीचे गिरेगा."

छत्तीसगढ़ से काम की तलाश में बाहर गए लोग असुरक्षित सेक्स गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं

एड्स पीड़ित ही सबसे ज्यादा टीबी के शिकार होते हैं. यह अपने आप में संक्रामक बीमारी है. टीबी से ग्रसित एड्स का मरीज सामान्य लोगों में भी टीबी को फैलाने की वजह बन रहा है. राज्य में 2011 से अब तक 2340 टीबी मरीजों की जांच में यह सामने आया कि वे एड्स पीड़ित भी हैं.

एड्स पीड़ितों में टीबी की बीमारी होना आम बात है, मगर छत्तीसगढ़ में टीबी के साथ एड्स की जांच करना अनिवार्य नहीं है. लिहाजा अक्सर कई एड्स मरीजों के टीबी का ही इलाज होता रहता है और बाद में वे एड्स की भेंट चढ़ जाते हैं.

यह बताता है कि राज्य की चिकित्सा तंत्र में एड्स और टीबी नियंत्रण को लेकर कोई समन्वय नहीं है. छत्तीसगढ़ राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र के निदेशक डॉ प्रबीर चटर्जी बताते हैं, "राज्य में यदि टीबी और एड्स की जांच से लेकर उपचार तक सुविधाओं को एकीकृत कर दिया जाय तो एड्स पीड़ितों और मौतों की संख्या में कमी आ सकती है."

First published: 28 April 2016, 22:35 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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