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बनारस का एक गांव जिसकी हर दीवार पर एक पेंटिंग रहती है

रंगनाथ सिंह | Updated on: 25 July 2016, 12:50 IST
(राज साहनी)

आपने बनारस/वाराणसी/काशी पर बनी कई फिल्में देखी होंगी, कई किताबें पढ़ी होंगी, पिछले लोकसभा चुनाव में हुए 'बैटल ऑफ बनारस' से पहले और बाद में इस शहर से जुड़ी कई ख़बरें पढ़ी-सुनी होंगी लेकिन आपने सराय मोहाना के बारे में नहीं सुना होगा.

बनारस में उत्तरवाहिनी होने वाली गंगा के किनारे बसा मछुवारों, राजभरों और रविदासियों का ये गांव शायद कभी ख़बरों में नहीं आया. शायद आज भी नहीं आता अगर इस गांव से निकला हुआ लड़का, पेंटर बनकर इटली-फ्रांस घूमकर अपने गांव सराय मोहाना वापस नहीं लौटता. ऐसा गांव जहां शायद ही इससे पहले किसी ने मॉर्डन आर्ट जैसा कोई शब्द सुना-बोला होगा.

राज साहनी

एक तरफ देश की सत्ता करवट बदल रही थी, दूसरी तरफ कुछ क्रिएटिव नौजवान दिल्ली के एक कमरे में बैठे भविष्य के सपने बुन रहे थे. जब देश के भावी पीएम भारत में 100 स्मार्टसिटी बनाने की बात कर रहे थे, तो ये नौजवान देश की राजधानी दिल्ली से अपनी जड़ों की ओर जाने के मंसूबे बांध रहे थे. वो अपने आर्ट कॉलेज और मॉस कॉम में सीखे हुए सबक को लेकर अपने-अपने गांवों-क़स्बों की तरफ वापस जाना चाहते थे. इन नौजवानों में एक थे, राज साहनी.

राज साहनी ने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से बीए (फाइन आर्ट्स) और एमए (फाइन आर्ट्स) की पढ़ाई की. एमएफए करने के तुरंत बाद ही उन्हें एक पेंटिंग प्रतियोगिता में इनाम के तौर पर यूरोप यात्रा का मौका मिला. इस यात्रा के दौरान उन्होंने इटली और फ्रांस के सभी प्रमुख कला संग्रहालयों को देखा. इस यात्रा के दौरान ही दा विंची, रफेल, माइकल एंजेलो जैसे महान कलाकारों की मूल कलाकृतियों को उन्हें पहली बार देखने का मौका मिला.

एक घर के बाहर रखा ओपेन लाइब्रेरी का बुकशेल्फ (राज साहनी)

यूरोप के महान कलाकारों से उन्होंने क्या सीखा? इसपर राज कहते हैं,  "मैंने उनसे खुद से ईमानदार रहना सीखा. मैंने सीखा कि जो दिल के अंदर से आए, वही बनाओ."

दिल्ली लौट कर वो पेंटिंग की दुनिया में रम गए. कलाकृतियों की प्रदर्शनी भी लगाई. कुछ कलाकृतियों को ख़रीदार भी मिलने लगे. लेकिन इन सबमें कुछ कमी सी थी. और ये वही वक़्त था जब राज और उनके साथी अपनी-अपनी जड़ों की तरफ लौटने की सोच रहे थे. 

राज साहनी कहते हैं, "हमें लग रहा था कि हम बस अपने लिए कर रहे  हैं, हमने जो सीखा है उससे हमारे गांव को भी फ़ायदा होना चाहिए. और इससे शायद हमारा भी फ़ायदा हो सकता है, हमें कुछ नया सीखने को मिलेगा."

बुजुर्ग नाविक मछली मारने के अपने खास तरीके 'जुटैल' के म्यूरल के साथ (राज साहनी)

राज ने पहले पहल 2014 में अपने पैतृक गांव सराय मोहाना में एक लाइब्रेरी शुरू करने की सोची. गांव में लाइब्रेरी खुल भी गई. दोस्तों की मदद से गांव के बीचोंबीच मत्स्य समिति के कार्यालय में उन्हें एक कमरा भी मिल गया. कमरे में बच्चों के लिए किताबें भी रख दी गईं लेकिन ये योजना कुछ ख़ास सफल नहीं हो सकी.

एक कमरे तक सिमटी लाइब्रेरी की योजना के विफल होने से राज निराश नहीं हुए. उन्होंने इसका कलात्मक समाधान निकाला. उन्होंने लकड़ी से मछली के आकार का बुकशेल्फ बनाया और प्रयोग के तौर पर कुछ गांववालों से बात करके उनके घरों के आगे रख दिया. बगैर किस ताले-चाभी वाली ये ओपेन लाइब्रेरी खट्ठे-मीठी कुछ चल निकली.

राज साहनी

ओपेन लाइब्रेरी को सफल बनाने की जद्दोजहद के बीच ही राज को अपने गांव को ख़ूबसूरत बनाने का ख़्याल आया. राज कहते हैं, "मैं चाहता था कि लोगों का ध्यान मेरे गांव की तरफ जाए."

अपने पैतृक गांव, जहां की गलियों में उनका बचपन बीता था, उसे सुन्दर बनाने के लिए राज ने कम्युनिटी आर्ट के तौर पर प्रोजेक्ट सराय मोहाना शुरू किया. उन्होंने गांव के बच्चों और बड़ों के साथ मिलकर गांव को नया रंग-रूप देना शुरू किया.

राज साहनी

इस प्रोजेक्ट के शुरुआत में उनके सामने किस तरह की मुश्किलें आईं? ये पूछने पर राज कहते हैं,  "लोगों को लगता था कि मैं दिल्ली से आकर कोई फै़शन कर रहा हूं. तब मैंने लोगों को समझाया कि ये आर्ट है, इसकी पढ़ाई होती है. बच्चे इसे सीखकर अपना करियर भी बना सकते हैं."

राज गांव के ऐसे ही एक बुजुर्ग का क़िस्सा सुनाते हैं जो दीवारों पर पेंटिंग (म्यूरल) बनवाने के पूरी तरह ख़िलाफ़ थे. लेकिन जब राज ने उन्हें विस्तार से अपना मक़सद समझाया तो वो इस शर्त पर तैयार हो गए कि वो उनके घर की दीवार पर उनके मछली मारने के ख़ास तरीके 'जुटैल' की पेंटिंग बनाएंगे.

पेंटर राज साहनी मछली की सवारी करते हुए (राज साहनी)

पेंटिंग केवल सद्भावना से नहीं बनती. उसका एक आर्थिक पक्ष भी होता है. हमने राज से पूछा कि इन पेंटिंग के लिए पैसा कहां से आता है? राज ने बताया, "मैंने किसी के घर पर फ्री में पेंटिंग नहीं बनाता. उनसे सौ, दो सौ, तीन सौ जैसा उनका सामर्थ्य हो पैसे लेता हूं ताकि उन्हें लगे कि ये उनकी अपनी चीज़ है. बाकी मैं अपने पैसे लगाता हूं."

बनारस जाने से पहले राज ने अपनी बीस से ज्यादा छोटी-बड़ी पेंटिंग्स एक आर्ट कलेक्टर को महज 50 हजार रुपये में बेच दी थीं. इसके अलावा उन्हें अपने दूसरे स्वतंत्र प्रोजेक्ट से जो आय होती है, उसका एक हिस्सा भी प्रोजेक्ट सराय मोहाना में लगा देते हैं.

राज साहनी

प्रोजेक्ट सराय मोहाना की शुरुआत भले ही राज ने अकेले की हो लेकिन उन्हें कदम दर कदम लोगों का साथ मिलता गया. गांववालों के अलावा स्थानीय कला विद्यालयों के छात्र और टीचर भी समय-समय पर उनके प्रोजेक्ट में शामिल होते रहते हैं.

लेकिन इसके कुछ आनुषंगिक दुष्परिणाम भी सामने आने लगे. राज कहते हैं, "न जाने कैसे अचानक ये अफ़वाह फैल गई कि राज साहनी नामक कोई बंदा दिल्ली से आया है, और उसे नरेंद्र मोदी ने काफी पैसे दिए हैं ताकि वो यहां ऐसे प्रोजेक्ट चला सके."

राज बताते हैं कि ऐसी अफ़वाह फैलाने वालों में कुछ आर्टिस्ट भी थे. इस तरह के खट्ठे-मीठे अनुभवों के बाद वो थोड़ें संभल गए लेकिन थमे नहीं. राज बताते हैं कि प्रोजेक्ट सराय मोहाना दिसंबर तक पूरा हो जाएगा.

राज साहनी

प्रोजेक्ट सराय मोहाना में लगभग सारे म्यूरल में मछलियां बनी हुई हैं. इसकी वजह पूछने पर राज कहते हैं, "सराय मोहाना गांव में करीब 70 फीसदी आबादी मछुवारों की है. वो मछली से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं."

राज बताते हैं कि प्रोजेक्ट के अगले चरण में वो गांव के राजभरों और रविदासियों को भी इसमें शामिल करेंगे. उनके घरों पर वो वही म्यूरल बनाएंगे जिससे वो जुड़ाव महसूस करें.

एक घर प्रोजेक्ट सराय मोहाना से पहले और बाद (राज साहनी)

प्रोजेक्ट सराय मोहाना पूरे होने के बाद राज साहनी के प्लान के बारे में पूछने पर राज कहते हैं, "मैंने गांव में पांचवी तक पढ़ाई की है. उसके बाद वो मेरठ के एक चैरिटी स्कूल में चल आए थे. स्कूल उनकी पढ़ाई-लिखाई का पूरा ख़र्च उठाता था."

राज कहते हैं, "गांव का काम पूरे होने के बाद मैं अपने स्कूल की इमारत पर एक म्यूरल बनाऊँगा. उन्होंने मेरे लिए जो किया है, ये उसका छोटा सा प्रतिदान होगा."

राज साहनी
First published: 25 July 2016, 12:50 IST
 
रंगनाथ सिंह @singhrangnath

पेशा लिखना, शौक़ पढ़ना, ख़्वाब सिनेमा, सुख-संपत्ति यार-दोस्त.

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