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कठोरता से काबू में आएगा पाकिस्तान

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 29 July 2016, 8:27 IST

गृहमंत्री राजनाथ सिंह अगस्त के पहले सप्ताह में इस्लामाबाद जा रहे हैं. वे वहां सार्क देशों के गृह मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेंगे. जो खबरें आ रही है, उनके मुताबिक वे वहां पाकिस्तान के हुक्मरानों से दोनों देशों के आपसी संबंधों पर भी बातचीत करेंगे. अहम सवाल यह है कि क्या यह बातचीत होनी चाहिए? और होनी चाहिए तो क्यों होनी चाहिए?

बेशक बातचीत होनी चाहिए पर उससे कुछ समाधान भी तो निकलने चाहिए. यह तो कत्तई नहीं होना चाहिए कि, हम बातचीत करते रहे और वो आतंक का खूनी खेल खेलते रहें. ज्यादा पीछे नहीं जाएं तो मई 2014 से चल रही पाकिस्तानी कहानी भी कम डरावनी नहीं है.

हमने यानी भारत ने उसे नई सरकार के शपथ ग्रहण में बुलाया. पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपने दल-बल के साथ दिल्ली आए. उनके लौटते ही कश्मीर में आए दिन की गोलीबारी का सिलसिला चालू हो गया जो आज तक जारी है. इस बीच अगस्त में विदेश सचिव स्तरीय वार्ता होने को आई तो भारत में पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों को दावत पर दिल्ली बुला लिया.

पाकिस्तान यह आश्वासन देने के लिए तैयार नहीं हुई कि वह कश्मीर पर अलगाववादियों से बात नहीं करेगा

लाख आग्रह के बाद भी पाकिस्तान की सरकार यह आश्वासन देने के लिए तैयार नहीं हुई कि वह कश्मीर पर अलगाववादियों से बात नहीं करेगी. विदेश सचिवों की बातचीत टलने का भी उसे कोई मलाल नहीं हुआ. फिर भी बर्फ पिघलाई तो भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने. फरवरी में जब दोनों देश आस्ट्रेलिया में विश्वकप खेल रहे थे तब मोदी ने उन्हें शुभकामनाओं का फोन किया. खूब लम्बी बात हुई दोनों के बीच.

तब क्रिकेट के जरिए संबंध सुधारने के पुराने दिनों को याद कर शरीफ ने खूब आहें भी भरी लेकिन किया कुछ नहीं. उल्टे कश्मीर पर तनाव बढ़ता गया. फिर कभी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तो कभी विदेश सचिव अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर अपने पाकिस्तानी समकक्षों से मिलते रहे.

फिर एक बार तय हुआ कि दोनों देशों के विदेश सचिव मिलेंगे. इस बीच 2015 के अंत में पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तान गई और फिर रूस और अफगानिस्तान यात्रा से लौटते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अचानक पाकिस्तान में उतर गए.

सुषमा के हरी साड़ी पहनने और मोदी के नवाज शरीफ की मां को साड़ी भेंट करने पर भारत में खूब आलोचनाएं भी हुई लेकिन तब देश ने इसे संबंधों को सुधारने की एक और भावनात्मक पहल माना. लेकिन परिणाम इस पहल का भी दु:खद निकला. महज एक माह में हुई इन दोनों यात्राओं के तुरंत बाद पठानकोट हादसा हो गया. सारी कोशिशें मिट्टी में मिल गईं.

कई महीनों के तनावपूर्ण रिश्तों के बाद बर्फ फिर भी हमने ही पिघलाई. पठानकोट मामले की जांच के लिए हमने पाकिस्तान के जांच दल को पठानकोट आने दिया. यह अपनी तरह का पहला मौका था जब आरोपी को जांच के लिए आने दिया गया लेकिन नतीजा इसका भी उल्टा ही निकला. यह दल भारत में कुछ बोला और पाकिस्तान जाते ही पलट गया. भारत पर ही तोहमत जड़ दी, पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए पठानकोट षडयंत्र रचने की.

अब, बुरहान वानी मामले में जो हो रहा है, सबके सामने है. इस पर पाकिस्तानी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उनके विदेश सचिव ने जो रोना-पीटना मचाया वह तो सबके सामने है. पाकिस्तान कश्मीर का राग भूलना नहीं चाहता. वह आतंकियों को सीने से लगाए रखना चाहता है. फिर चाहे वह दाऊद हो या हाफिज सईद. भले विश्व मंच पर वह अकेला पड़े, अमरीका उससे दूर होता दिखे पर चीन के मजबूत सहारे से वह कश्मीर में हिंसा की आग भड़काए रखना चाहता है.

पाकिस्तान कश्मीर का राग भूलना नहीं चाहता. वह आतंकियों को सीने से लगाए रखना चाहता है

सवाल फिर वही है कि क्या हमें ऐसे में उससे 'भारत-पाक सम्बंधों पर कोई बात करनी चाहिए? गृह मंत्री बेशक पाकिस्तान जाएं, सार्क देशों के गृहमंत्रियों की बैठक में हिस्सा लें लेकिन जहां अकेले पाकिस्तान के राजनेता सामने पड़ें, ऐसे किसी कार्यक्रम में शिरकत न करें. और ऐसी नौबत आए भी तो बिना किसी लाग-लपेट के, जिसके लिए वे जाने जाते हैं, साफ-साफ बात करें.

कश्मीर हमारा है, इसमें दो राय नहीं, पाकिस्तान आतंकियों की मदद कर कश्मीर में हिंसा की आग फैला रहा है या फिर आतंकियों को पनाह और पैसा दे रहा है, इसमें दो राय नहीं. पहले वह यह सब बंद करे, तभी बात होगी. यदि वह अपने मार्शल ला प्रशासक रहे जनरल अयूब के शब्दों को याद करें तो-'हम जानते हैं कि, आप हमें कश्मीर दे नहीं सकते, हम आपसे कश्मीर ले नहीं सकते, तब हम दोनों कश्मीर-कश्मीर खेल तो सकते हैं' की तर्ज पर ही चलना चाहता है. या फिर वह अपने मरहूम प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की तरह बांग्लादेश युद्ध में 95 हजार पाक सैनिकों के भारतीय सेना के समक्ष समर्पण की विश्व इतिहास की अनूठी घटना के बाद भी एक हजार साल तक जंग जारी रखने की कसमें खाता है. तब फिर सोचना हमें ही पड़ेगा. शायद हमारी कठोरता ही उसे सही रास्ते पर लाए.

First published: 29 July 2016, 8:27 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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