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पाकिस्तानियों को कश्मीर में बसने की मिलेगी अनुमति? केंद्र ने कहा ये भारत के लिए ख़तरा

कैच ब्यूरो | Updated on: 14 December 2018, 11:28 IST

भारत के विभाजन के समय 1947 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने एक कानून 'जम्मू-कश्मीर पुनर्वास कानून 1982' बनाया था. इस कानून के तहत साल 1947 से 1954 के बीच भारत के जम्मू-कश्मीर से जाकर पाकिस्तान में बीएस जाने वाले लोगों को वापस भारत में बसने की अनुमति है. हालांकि इस कानून को लेकर विवाद है. इसी विवादित कानून को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई चल रही है. इस कानून की वैधानिक मान्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी. इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में जानकारी मांगी है.

गौरतलब है कि असेंबली द्वारा पारित इस कानून को तत्कालीन गवर्नर और उस समय सत्ता पर काबिज कांग्रेस सरकार के विरोध का सामना करना पड़ा था. इस मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया, ''18 साल का कोई व्यक्ति जो 1947 में पाकिस्तान चला गया था अब 90 साल का हो चुका होगा.ऐसे में क्या आप उसके बच्चों, नाती-पोते और उनकी पत्नियों को, जो पाकिस्तान में पैदा हुए और वहां के नागरिक हैं, वापस आकर जम्मू और कश्मीर में बसने की इजाजत देंगे?''

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा कि ऐसे तो पाकिस्तान पलायन करने वालों के साथ बाकी लोग भी भारत में आकर बस जाएंगे. वहीं इस मामले में केंद्र सरकार ने भी भारत की सुरक्षा का तर्क देते हुए कहा, ''यह ऐक्ट ऐसे लोगों को किसी भी समय भारत लौटने और बसने की इजाजत देता है जो स्वेच्छा से पाकिस्तान बस गए, वहां की नागरिकता ली, पाकिस्तानी सिविल या आर्म्ड फोर्सेज में सेवाएं दीं या भारत के खिलाफ जंग लड़ी या भारत के खिलाफ राजद्रोह जैसा काम किया.... इससे राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी.''

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गौरतलब है कि विभाजन के बाद बनाए गए इस क़ानून की संवैधानिकता प्रमाणित करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में प्रेजिडेंशल रेफरेंस भेजा था. कोर्ट ने 2001 में इसे बगैर जवाब दिए ही लौटा दिया था. इसके बाद इस कानून के लिए एक याचिका दायर की गई थी जिसमे इसे निरस्त करने का अनुरोध था. तब कोर्ट ने इस पर विचार करते हुए 2001 में इस कानून पर रोक लगा दी थी.

इस याचिका की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने 16 अगस्त, 2016 को इसकी सुनवाई की बात की थी, साथ ही इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे संविधान पीठ को सौंपने का भी संकेत दिया था.

First published: 14 December 2018, 10:14 IST
 
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