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'अब्बा, मुझे हिंदू देखना है' : एक मशहूर शायर का इकरारनामा

रंगनाथ सिंह | Updated on: 23 March 2016, 13:20 IST

उम्र कम थी. इमोशन ज्यादा थे. जहां दिल लग जाता था, डूब ही जाता था. मेहदी हसन का जुनून था. डिजिटल क्रांति से थोड़ा पहले की बात है. सीडी की दुकानों पर मेहदी हसन के कैसेट और सीडी ढूंढते फिरा करते थे. ऐसे ही किसी दिन देर शाम दिल्ली के साउथ एक्स के प्लैनेट एम में एक सीडी पर नज़र पड़ी. शायर का नाम अनजाना सा था लेकिन गजलें मेहदी साहब की आवाज़ में थी. मैंने सीडी ले ली. 

घर पहुंचने कर म्यूज़िक प्लेयर में सीडी लगायी और उसके बाद ऐसा लगा जैसे किसी ने गरम तवे पर पानी की ठंडी बूंदे डाल दी हों. वो एल्बम था 'कहना उसे' जिसमें पाकिस्तानी मूल के शायर फ़रहत शहज़ाद की नौ गज़लों को मेहदी हसन ने आवाज़ दी थी.

'क्या टूटा है अंदर अंदर चेहरा क्यों कुम्हलाया है', 'तन्हा तन्हा मत सोचा कर मर जाएगा, मत सोचा कर', 'कोंपले फिर फूट आईं कहना उसे' और 'फैसला तुमको भूल जाने का' जैसी ग़ज़लों से शायद ही कोई ग़ज़ल प्रेमी अनजान होगा.

हाल ही में जब फ़रहत शहज़ाद दिल्ली आए तो कैच संवाददाता रंगनाथ सिंह ने उनसे विस्तार से बात की.

अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?

मेरे पिता शायर शौकत अली हरियाणा के कैथल जिले के थे. ननिहाल लखनऊ में था. वो अल्लामा मशरीकी की तहरीक में शामिल थे. इस तहरीक का मानना था कि अंग्रजों ने एक मुल्क पर कब्जा किया था और उन्हें एक मुल्क छोड़कर जाना चाहिए. आज जो बात मुझे समझ आती है अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान पर 'डिवाइड एंड रूल' से राज किया था और जाते-जाते भी वे हमें डिवाइड कर गए. आज जब हम पलट के देखते हैं तो पाते हैं कि कोई मामूली समझ वाला भी मुल्क के बंटवारे को स्वीकार नहीं करेगा. 

भौगोलिक रूप से जो पाकिस्तान बनाया गया वह दो हिस्सों में था और दोनों हिस्सों के दरम्यान जो खुश्की का रास्ता था वो हिन्दुस्तान से होकर गुजरता था. इस तरह एक मुल्क के एक हिस्से से दूसरे में हिस्से में जाने के लिए पानी के जहाज से जाना पड़ता था, तब हवाई जहाज उतने आम नहीं थे. इस यात्रा में 15 दिन लगता था यानी एक ही मुल्क के दो हिस्सों के बीच 15 दिन की दूरी. अल्लामा मशरीकी की यह सोच थी कि मुल्क का बंटवारा नहीं होना चाहिए.

इस मुल्क में हिन्दू, मुसलमान सिख, ईसाई सैकड़ों सालों से एक साथ रह रहे थे तो क्या जरूरत थी बंटवारे की

उस समय जितने भी लोग पाकिस्तान गये थे वो एक विचारधारा के आधार पर गये थे. वो एक नया मुल्क बनाना चाहते थे. लेकिन हर जमाने में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हर चीज का फायदा उठाना चाहते है. ऐसे लोग बंटवारे के समय भी मौजूद थे. ऐसे लोग दोनों मुल्कों में झूठे क्लेम फाइल करते थे. मेरे वालिद क्लेम ऑफिसर थे.

जो लोग कहते थे कि मेरी हिन्दुस्तान में इतनी बड़ी जमीन-जायदाद थी उन्हें मेरे वालिद से मिलवाया जाता था. वालिद साहब को असलियत पता होती थी. लिहाजा जल्द ही कुछ लोग उनकी ईमानदारी की वजह से उन्हें नापसंद करने लगे. ईमानदारी की सजा के तौर पर उन्हें पाकिस्तान के कालापानी समझे जाने वाले इलाके डेरा गाजी खान में ट्रांसफर कर दिया गया. हम चार भाइयों के जवान होने तक हमारा अपना घर नहीं था. हम किराये के मकान में रहते थे. 

जो लोग दूर की सोचते थे वे इस मुल्क के बंटवारे के खिलाफ थे. इस मुल्क में हिन्दू, मुसलमान सिख, ईसाई सैकड़ों सालों से एक साथ रह रहे थे तो क्या जरूरत थी बंटवारे की. पाकिस्तान बनने के बाद भी पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान में मिलाकर जितने मुसलमान थे उससे ज्यादा मुसलमान हिन्दुस्तान में रहते थे. इसका जो हश्र हुआ हमने वह भी देखा.

हमारी पैदाइश 1955 की है. 1971 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई हुई थी तब मैैं अपनी साइकिल की बैक लाइट पर लिखवा रखा था- 'क्रश इंडिया'. इस क्रश इंडिया का मतलब दरअसल 'क्रश हिन्दू' था. जब आप नफरत की बुनियाद पर बड़े होते हैं तो आपको यही लगता है कि हमारे संग बहुत जुल्म हुआ, बहुत सारे लोग मारे गये. उसी तरबीयत की वजह से मैंने ऐसा लिखा. 

1976-77 में जब पहली बार पाकिस्तान से बाहर निकला तो सिर्फ यही सोच थी कि दुनिया में बस हम ही हम हैं- मुसलमान और पाकिस्तानी. जब मैं बाहर निकला, हिन्दुओं, सिखों, ईसाइयों और दूसरे मुसलमानों से मिला तब मुझे इस बात का अहसास हुआ कि हमारा हिन्दू या मुसलमान होना हमारी पैदाइश से तय होता है. 

मैं छोटा सा बच्चा था, मेरे जहन में हिन्दू को लेकर एक अलग ही कल्पना थी लिहाजा मैंने कहा- अब्बू मुझे हिन्दू देखना है

इसके बाद आपका माहौल आपके ज़हन को आकार देता है. आपको एक वाकया सुनाता हूं. मेरी उम्र पांच-छह साल रही होगी. हमारा परिवार कश्मूर्क से डेरा गाजी खान जा रहा था. मेरे वालिद ने अम्मी से कहा कि यहां एक हिन्दू मिठाई वाले की दुकान है जो बहुत उम्दा मिठाई बनाते हैं. अम्मी ने कहा कि थोड़ी मिठाई घर के लिए ले लीजिए. मैं छोटा सा बच्चा था, मेरे जहन में हिन्दू को लेकर एक अलग ही कल्पना थी लिहाजा मैंने कहा- अब्बू मुझे हिन्दू देखना है. उन्होंने कहा चलो. वहां मिठाई की दुकान पर एक शरीफ सा दिखने वाला हिन्दू सबको मिठाई तौल-तौल कर दे रहा था.

मैं उसके सामने ही बोला, अब्बा मुझे हिन्दू दिखाइए ना. मेरी जिद पर अब्बा को शर्मिंदगी होने लगी. मैं बार-बार जिद कर रहा था. वो खीझ कर बोले, बेटा यही हिन्दू हैं. मुझे लगा कि अब्बा मुझे बेवकूफ बना रहे हैं. मिठाई वाले साहब ने सुन लिया. वो मुझे जलेबी देते हुए बोले कि हां बेटा मैं ही हिन्दू हूं. फिर भी मुझे तसल्ली नहीं हुई. मुझे लगा कि सब मिलकर मुझे उल्लू बना रहे हैं. मेरे मन में हिंदू को लेकर किसी अनजाने अजीब जीव की कल्पना थी. तो यह एक झलक थी उस माहौल की जिसमें हम पल बढ़ रहे थे.

दो चीजें हैं, यकीन और ईमान. मुस्लिम का कहना है कि ईमान लाओ. मुस्लिम का विकास ईमान लाने पर हुआ है. ईमान का मतलब है कि आप सवाल नहीं उठा सकते. यकीन का मतलब है कि अगर आपको कहा जाये कि बाहर धूप निकली हुई है तो आप इसका सबूत चाहेंगे, आप कहेंगे कि मुझे दिखाओ कि कहां धूप निकली है फिर आपको यकीन आएगा. मगर मैं आप पर ईमान लाया हूं और आप कहेंगे कि बाहर धूप निकली हुई है तो मैं कहूंगा जी हां बाहर धूप निकली हुई है. ये फर्क है ईमान और यकीन के बीच. सोचने वाले ज़हन ईमान कम लाते हैं, यकीन ज्यादा रखते हैं. वो सवाल करते हैं.  

दूसरे मजहब से साबका पड़ा तो मैंने दूसरे मजहबों के बारे में पढ़ना शुरू किया. अपने महजब को पढ़कर ज़हन में सवाल आया कि ऐसा क्यों? और यकीन कीजिए कि हर क्यों का जवाब हमें मिलता रहा. जब क्यों के जवाब मिलने लगे तो बहुत अफसोस हुआ कि यार जवान जिंदगी ज़ाया कर दी. मुल्लाओं के चक्कर हम क्रश इंडिया लिखते रहे पर उसमें तो कोई सच्चाई नहीं थी. क्यों की तलाश में हमें जो जवाब मिले उसने हमें सिखाया कि अव्वल और आखिर आप इंसान हैं. 

भारत और पाकिस्तान के बीच हुए 1965 के युद्ध की आपको कोई याद है?

मैं आज उसी रास्ते से आ रहा था जहां इस जंग की याद में बैनर-पोस्टर लगे थे. मैं सोच रहा था कि हम जंगों की यादगार क्यों मनाते हैं. हम होली, दीपावली, ईद मनाते हैं. ये खुशी के मौके होते हैं. जिन जंगों में लोगों की जानें गयीं उसकी याद क्यों मनायी जाती है, यह मेरी समझ से परे है.

आप पर शुरुआती अदबी असर किनका रहा है?

मेरी खुशकिस्मती रही कि मुझे जोश साहब से मिलने-जुलने का काफी मौका मिला. वो हमारे वालिद के दोस्त थे. फ़ैज़ साहब की संगत कम मिली. दूसरे बड़े शायरों के साथ भी मैंने मंच शेयर किया है. यूनिवर्सिटी के दिनों में मुझे अहमद फ़राज के इतने शेर याद थे कि लोग मुझे फ़राज का हाफिज कहने लगे थे. बाद में उनसे मेरी करीबी भी रही, लड़ाइयां भी रहीं.

हिन्दुस्तान से बशीर बद्र के अशआर मैं बचपन से इकट्ठा करता रहा हूं. वसीम बरेलवी से मेरा रिश्ता दो जिस्म एक जान जैसा है. 

आपकी पहली ग़ज़ल या शेर जिसके बाद आपको लगा हो कि आप शायर हो गए या आपका यकीन मजबूत हुआ हो?

मैं सातवीं जमात के बाद कभी रेगुलर स्टूडेंट नहीं रहा था. जब मैंने कराची यूनिवर्सिटी में एमए इंग्लिश में एडमिशन लिया तब जाकर मैं पहली बार रेगुलर हुआ. मैंने एक्सटर्नल स्टूडेंट के रूप में ही एमए (उर्दू) किया था. तब तक मैंने शेर लिखना शुरू नहीं किया था. उस जमाने में जो स्टूडेंट एमए फाइनल में रेगुलर नहीं थे उन्हें दस टॉपिक दिये जाते थे. उनमें से किसी एक पर तीन घंट में मजमून लिखना होता था. मैंने विषय चुना, "उर्दू ग़ज़ल का विकास".

उस जमाने में नयी रिसर्च आयी थी कि उर्दू के पहले शायर वली दक्कनी नहीं बल्कि कुली कुतुब कायम अली शाह थे. मैंने वहां से कहानी शुरू की. वहां से चलते चलते मैं दाग़ के ज़माने तक आया. दाग़ के बाद उर्दू ग़ज़ल में काफ़ी गिरावट आ गयी थी. बहुत ही बुरे शेर लिखे जाने लगे थे. उस ज़माने में जो अदबी लड़ाइयां ग़ज़ल के रूप में होती थीं, जिन्हें हिजवियात कहते हैं. 

जब रिजल्ट आया तो उसी पर्चे में मेरे सबसे अधिक नंबर थे. उसके बाद मुझे लगा कि जब मैं किसी शायर का लहजा अपनाकर लिख सकता हूं तो अपना शेर भी लिख सकता हूं. इस तरह 1975-76 से मैंने अपना शेर लिखना शुरू किया. जिस एल्बम 'कहना उसे' से दुनिया भर में मेरी पहचान बनी उसकी ज्यादातर ग़ज़लें 1976 से 1980 के बीच लिखी हुई हैं.

मेहदी साहब के साथ गायी गई नौ ग़ज़लें आज भी मेरी पहचान हैं. अपनी ग़ज़लों की अगली किताब मैंने उन्हें ही समर्पित की है

मैंने अपनी अगली किताब में बताया है कि मेरी शायरी मेरी ज़िंदगी का एक शायराना या मंजूम सफ़र है. जो मैंने जिया है वही लिखा है. 

मेरी बीवी नीता की डेथ के बाद एक वक़्त ऐसा भी आया कि मुझे कुछ लिखते हुए डर लगता था. अगर मैंने ऐसा कुछ लिख दिया जो जिया हुआ नहीं हो तो आगे की ज़िंदगी में मुझे उसे भुगतना पड़ेगा.

मेहदी साहब से आपकी मुलाकात कैसे हुई?

मेहदी साहब से मेरी मुलाकात 1980-81 में हुई थी. मुझे रेडियो पर एक इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था. वो भी वहां मौजूद थे. मैं नया शायर था. वो अपने उरूज पर थे. ये परंपरा है कि जब आप शायर का इंटरव्यू करते हैं तो कहते हैं कि अपनी कोई ग़ज़ल पढ़ दें. मुझसे भी कहा गया. मैंने अपनी नयी ग़ज़ल "तन्हा तन्हा मत सोचा कर” सुना दी. जब मैं इंटरव्यू देकर बाहर निकला तो उन्होंने मुझसे पूछा कि अंदर ग़ज़ल आप सुना रहे थे. मैं कहा, हां. उन्होंने कहा, क्या आप थोड़ी देर रुक सकते हैं, मैं अभी अंदर से 10 मिनट में इंटरव्यू देकर आ रहा हूं. 

उनके अंदर जाने के बाद मैंने पहचाना कि ये तो मेहदी हसन साहब थे. जब वो बाहर आये तो उन्होंने अपने प्रमोटर से कहा आप घर जाइये मुझे शहजाद भाई छोड़ देंगे. कार में उन्होंने मुझसे कहा कि यार तुमने रेडियो पर जो ग़ज़ल सुनायी थी वो दोबारा सुनाओ. मैंने सुनाया. सुनकर वो बोले एक दफा फिर सुनाओ. उन्होंने मुझसे कहा कि ये ग़ज़ल मैं गा लूं. मैंने कहा, आप मुझसे पूछ रहे हैं, ज़रूर. उन्होंने कहा तो मुझे लिखकर दे जाओ.

उन्होंने गीत के लफ्जों पर गौर करने की बजाय बस विजुअल पर गौर किया और मतलब निकाला कि फरहत शहजाद तो इंडियापरस्त है

शाम को उनका फ़ोन आया कि मैंने एक धुन बनायी है, तुम सुन जाओ और बताओ कि तुम्हें कैसी लगती है. जब उन्होंने मेरी ग़ज़ल सुनायी तो मुझे एक बार तो यकीन ही नहीं हुआ कि ये मेरी लिखी हुई ग़ज़ल है क्योंकि उनकी आवाज़ में उसे सुनकर आपपर एक अजीब शहर तारी हो जाता है. 

मेरी पहली ग़ज़ल मेहदी साहब ने गाई. मेरी शोहरत उसी ग़ज़ल से हुई. मेहदी साहब ने पहली बार किसी एक शायर के साथ एक पूरा एल्बम गाया था.

मेहदी साहब के साथ गायी गई नौ ग़ज़लें आज भी मेरी पहचान हैं. मेरी ग़ज़लों की अगली किताब को मैंने उन्हें समर्पित किया है. 

जब मैंने मेहदी साहब की आवाज़ में रिकॉर्ड अपना पहला एल्बम अपने वालिद साहब को भेजा तो उन्होंने जवाब में लिखा कि हमें तो तुमसे बड़ी उम्मीदें थी लेकिन तुम भी गाने-बजाने वालों के संग निकल पड़े हो. उस ज़माने में गाने-बजाने को बुरा माना जाता था. हमारे सामने साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आज़मी, शकील बदायूंनी जैसों की मिसाल है. किसी के कमर्शियल काम की वजह से उसे अदब से निकाल देना नाइंसाफ़ी है.

हमारे  दौर के शायरों ने इसे बदला. अब मैं किसी लड़की को पसंद करता हूं तो दो साल तक गली के नुक्कड़ पर खड़ा होकर बाल में हाथ नहीं फेरता. मैं उसे एसएमएस कर दूंगा, उसे फ़ोन करूंगा, ईमेल कर दूंगा. हमारे रोजमर्रा की चीज़ें अदब में जगह बना लेती है. 

क्या ये सच है कि बेनजीर भुट्टो ने आपकी किसी नज्म पर प्रतिबंध लगा दिया था?

1989 में मेरी बीवी का देहांत हो गया. मैं काफी परेशान था. कभी हिन्दुस्तान आता था, कभी पाकिस्तान जाता था. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ज़िंदगी दोबारा कैसे शुरू करूं. इसी दौरान कराची भी गया. कराची में मेरी पढ़ाई लिखाई हुई थी तो उससे मेरी काफी यादें जुड़ी हुई थीं. 1991 में कराची जल रहा था. रोज पचास-सौ मर रहे थे.

मैंने उस मंजर पर एक गीत लिखा, 'ऐ मेरी पहली मुहब्बत ऐ कराची मेरे' और असल घटनाओं के फुटेज, कर्फ्यू के दौरान मिली छूट के कुछ असली शॉट लेकर छह गायकों के साथ मिलकर वीडियो एल्बम बनाया. उस समय भारत के दो चैनलों ज़ी टीवी और जैन टीवी, ने भी मुझसे वीडियो मांगा लेकिन मैंने नहीं दिया. मुझे लगा कि उनको देने से नीयत का फर्क पड़ जाएगा. मैंने उसे समाज सेवा के मकसद से बनाया था. इसलिए मैंने उसे पीटीवी को दिया. 

लेकिन वो नहीं चला. कुछ दिनों बाद बेनजीर भुट्टो का सत्ता पलट होने के बाद उन दिनों जो खातून पीटीवी की डीजी हुआ करती थीं उनकी दराज से मेरे वीडियो के मास्टर टेप मिले. बाद में मुझे किसी ने ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि उस वीडियो का मैसेज तो पॉजिटिव था लेकिन उसके बैकग्राउंड में जो सीन दिखाये गये थे वो असली थे. सियासतदां तो साहित्यिक नहीं होता, वो ख्वाब कम देखता है वो जोड़तोड़ ज्यादा करता है. उन्होंने गीत के लफ्जों पर गौर करने की बजाय बस विजुअल पर गौर किया और मतलब निकाला कि फरहत शहजाद तो इंडियापरस्त है. 

आपकी इंडियानवाज की छवि कैसे बन गयी?

हिन्दुस्तान से मेरा गहरा रिश्ता रहा है. इसकी वजह रही है कि मेरी पहली शादी हिन्दुस्तानी लड़की से हुई थी. उनके देहांत के बाद मेरी दूसरी शादी भी हिन्दुस्तानी लड़की से ही हुई. अल्लाह के करम से मुझे हिन्दुस्तान से ज्यादा इज़्ज़त और मोहब्बत मिली है. इसलिए वहां राय बन गयी कि ये हिन्दुस्तान का शायर है. इसलिए जब भारत पाकिस्तान में तनाव बढ़ता है तो पीटीवी वाले सबसे पहले मेरी ग़ज़लें काट देते हैं. 

पाकिस्तान में बुद्धिजीवियों पर हमले बढ़े हैं. अल्पसंख्यकों के लिए हालात बदतर हो गए हैं?

मुझे लगता है कि आप दुनिया का कोई भी मुल्क ले लीजिए और दुनिया का कोई भी मजहब ले लीजिए, जब स्टेट की बुनियाद आप मजहब पर रखेंगे और एजुकेशन लिमिटेड होगी तब आपके जहन में मजहब की निगेटिव ताकतें ही जगह बनाएंगी. एजुकेशन का मतलब डिग्रियां लेना नहीं है. जब तक आपके ज़हन तालीम की रोशनी से खुलेंगे नहीं उस वक्त तक आप मजहब के चुंगल से निकलेंगे नहीं. पाकिस्तान में बड़ी तादाद ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं है. इसलिए किसी गांव-क़स्बे में किसी मौलाना ने जो बता दिया वही मजहब हो गया. 

किसी भी मुल्क के अंदर डेमोक्रेसी जब तक चार-पांच चक्र पूरे नहीं करती तब तक उसके कदम जमते नहीं. बुरे आएं या अच्छे आएं, चुनकर आएं और चुनाव में हारकर जाएं. अब पाकिस्तान उस रास्ते पर चल पड़ा है.

पाकिस्तान में लोग अब जुर्रतपंसद हो रहे हैं. वो उसकी सज़ा भी भुगत रहे हैं, अदीबों को गोली मारी जा रहा है लेकिन वो मुंह खोलकर सच बोलने की कोशिश कर रहे हैं. हमें उम्मीद है ऐसे लोगों का सच अनपढ़ लोगों के झूठ को बेपर्दा करेगा.

पााकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो की तमाम परेशानियों के बावजूद सबसे बड़ी उपलब्धि मैं ये मानता हूं कि उन्होंने आम पाकिस्तानी को, तांगेवाले, गदहा गाड़ी चलाने वाले को ये शऊर दिया कि तुम इंसान हो, तुम पाकिस्तानी हो, तुम्हें वोट देना चाहिए. दुनिया बहुत आगे जा रही है. इंडिया तो मेनस्ट्रीम में आ रहा है पाकिस्तान को भी आना चाहिए. ज़हन में फैलाव की जरूरत है.

भारत हमेशा खुद को पाकिस्तान की तुलना में ज़्यादा लिबरल मानता रहा है. लेकिन पिछले कुछ सालों में यहां नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसारे और एमएम कलबुर्गी जैसे बुद्धिजीवियों की हत्या हुई, केंद्र में एक दक्षिणपंथी पार्टी की बहुमत सरकार बनी...इस पूरे परिदृश्य को एक पाकिस्तानी होने के नाते आप किस निगाह से देखते हैं?


मेरा ख्याल है आम जनता काफी समझदार है. मैं आम हिंदुस्तानी की इस बात के लिए बहुत तारीफ करता हूं. जहां तक हिन्दुस्तानी अवाम के बारे में मेरी जानकारी है, अगर इन लोगों ने अपना रवैया नहीं बदला तो पांच साल बहुत दूर नहीं है. अभी से लोग खिलाफत की आवाज उठाने लगे हैं. एक तरफ राइटविंग बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ़ लिबरल सोच के लोग भी दुनिया भर में ये बात पहुंचा रहे हैं कि कुछ ग़लत हो रहा है.

ये वो मुल्क है जिसने हर तहजीब को, हर मजहब, हर शफ़ाकत को पाला है, सीने से लगाया है. इस मुल्क में वसीम बरेलवी और नीरज हैं तो इस मुल्क ने अहमद फ़राज को भी गले लगाया था, फरहत शहजाद को गले लगाया है.

अगर मोदी साहब इस पूरे हालत पर कंट्रोल करके भारत की जो सेकुलर इमेज है उसे दोबारा कायम नहीं करेंगे तो अगले एक-दो चुनाव आते आते कांग्रेस की हालत में पहुंच जाएंगे. 

मुझे वो दौर याद है जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगायी थी. अवाम ने कैसे रिएक्ट किया था. आज की अवाम उस दौर की अवाम से ज़्यादा समझदार है. आज हमारे नौजवान पूरी दुनिया में मौजूद हैं. वो पूरी दुनिया के मीडिया को सुन रहे हैं. इसलिए इसे लेकर ख़ौफजदा होने की जरूरत नहीं है. 

इसमें मीडिया का भी एक संवेदनशील भूमिका बनती है. हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबकी आवाज़ को जगह मिलती रहे. सबका 'प्वाइंट ऑफ़ व्यू' सामने आता रहे.

आपकी राय में भारतीय मीडिया इसमें कितना सफल रहा है? कुछ लोगों का मानना है कि यहां जिंगोइज्म बढ़ा है?

ये दुरुस्त है कि पाकिस्तान की तरह इंडियन मीडिया में कई फैनेटिक मौजूद हैं. साथ ही साथ लिबरल भी हैं. अवाम भी अब समझने लगी है कि कौन सनसनी फैला रहा है और कौन बैलेंस खबर दे रहा है. 

अमेरिका में एक अच्छी बात है कि वहां कोई दो बार से ज़्यादा राष्ट्रपति नहीं बन सकता.

मेरे ख्याल से भारत और पाकिस्तान में भी ऐसा करने पर विचार होना चाहिए. क्योंकि सत्ता में रहते हुए आप इतने खूंटे गाड़ देते हैं कि सत्ता में रहते हुए आपको बाहर करना मुश्किल हो जाता है.

दूसरी पाबंदी ये लगनी चाहिए कि एक ही खानदान के दो लोग बैक टू बैक प्रधानमंत्री नहीं बनें, इससे डाइनेस्टी तैयार होती है. ये हमने पूरी दुनिया में देख लिया है. इस पर पाबंदी जरूर लगनी चाहिए.

अमेरिका का जिक्र चला है तो पूछना चाहूंगा कि आप वहां सत्तर के दशक से हैं. खाड़ी युद्द, फिर 9/11, अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ युद्ध की वजह से वहां के मुसलमानों में आइसोलेसन बढ़ा है. पाकिस्तान के मशहूर डायरेक्टर शोएब मंसूर की फ़िल्म 'खुदा के लिए' में भी आप ही जैसा एक आदमी है जो अमेरिका पढ़ने जाता है लेकिन वो आतंकवाद की तरफ़ बढ़ जाता है. आप इस पूरे दौर में वहां रहे तो आप इसे कैसे देखते हैं?

मैंने एक बात नोट की है, एक मुसलमान के तौर पर नहीं बल्कि एक स्कॉलर के रूप में कि अगर किसी मुस्लिम ने कोई जुर्म किया हो तो मीडिया में लम्बे समय तक ऐसे आता रहता है कि मुसलमान ने ये जुर्म किया है. लेकिन अगर किसी दूसरे मजहब के लोग करते हैं तो लिखा जाता है कि एक अमेरिकी या एक हिन्दुस्तानी ने ऐसा कर दिया. यानी आपका ताल्लुक मुल्क से जोड़ा जाता है, मजहब से नहीं.

9/11 ने इस बात पर ठप्पा लगा दिया कि मुसलमान आतंकवादी हैं. अब अगर आप ने जनरलाइज कर दिया कि मुसलमान आतंकवादी हैं तो अमेरिका, यूरोप, इंडिया, सऊदी अरब, पाकिस्तान, चीन, जापान हर जगह के मुसलमान को आतंकवादी घोषित कर देते हैं. 

9/11 से जो नुकसान हुआ उससे मुस्लिम दो पॉजिटिव सबक भी ले सकते हैं. एक, उन्हें सोचना चाहिए कि क्या हम सारे इतने बुरे हैं, क्या हम सारे आतंकवादी हैं? अगर नहीं हैं तो हम अपने बरताव से साबित करें कि हम ऐसे नहीं हैं.

मैंने बच्चन साहब की पहली फ़िल्म से लेकर अब तक सारी फ़िल्में देखी हैं. चाहे वो खराब फ़िल्में ही क्यों न हों

जहां एक ओसामा बिन लादेन है तो एक फरहत शहजाद भी हैं. अजमल कसाब और अहमद फराज दोनों मुसलमान हैं लेकिन दोनों में बहुत फर्क है. ये बात ख़ासकर मुसलमानों को समझने की बहुत ज़रूरत है.

मैं ये भी कहना चाहूंगा कि पश्चिमी देशों को भी तेल की राजनीति और क्षेत्रीय राजनीति में रूस पर बढ़त बनाने के लिए इस इलाके में दखल देना बंद करना चाहिए.

अगर इमेज की बात करें तो एक चर्चित किताब है, गुड मुस्लिम, बैड मुस्लिम. कुछ लोग इसे ऐसे पेश करते हैं कि कुछ मुसलमान अच्छे होते हैं कुछ बुरे होते हैं. अभी हाल में भारत में औरंगजेब के नाम वाली सड़क का नाम अब्दुल कलाम के नामपर रख दिया गया?

जहां तक नाम-वाम बदलने की बात है तो मेरा ख़्याल है कि आप मेरा नाम बदल दें तो इससे क्या फर्क पड़ जायेगा. मैं रहूंगा वही जो मैं हूं. दुनिया में और भी बहुत से ज़रूरी काम है करने के लिए. दूसरे मसले हैं सोचने के लिए. 

जिस चीज को बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला उसे करने से क्या फ़ायदा. औरंगजेब का नाम बदल देने से आप इतिहास तो नहीं बदल सकते. आप टाइम कैप्सूल में तीन सौ साल साल पीछे जाकर औरंगजेब को क़त्ल तो नहीं कर सकते.

एक बैलेंस सोच की जरूरत है. निगेटिव को अपना काम करने दीजिए. पॉजिटिव को बंद न होने दीजिए. इसके बिना हम रोशनी नहीं दे सकते. फ़हमीदा बहन ने जो नज्म 'तुम भी हम जैसे निकले भाई' कही है वो यही तो बताती है.

फिर हम भी थोड़ा पॉजिटिव सवाल से इंटरव्यू खत्म करते हैं. हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री से पाकिस्तानी कलाकारों का काफ़ी जुड़ाव रहा है. आपको ऐसा कोई ऑफ़र आया? हिन्दी फ़िल्मों के लिए लिखने का कोई प्लान?

शुरू-शुरू में तो ये सोच थी कि फिल्मों में नहीं जाना है. बाद में कुछ लोगों ने मुझसे पूछा तो मैंने कहा ठीक है. लेकिन मैं सस्ते चालू गाने नहीं लिखना  चाहता. मैं ऐसे गीत लिखना चाहता हूं जिसमें शायरी की ख़ूबसूरती और तहजीब की गहराई हो.

देखिए जब शहरयार को उमराव जान मिली तो उनके लिखे से पता चल जाता है कि ये किसी शायर का लिखा है या किसी तुकबंद का. मुझे फ़िल्म में लिखने से कोई एतराज नहीं है. लेकिन मैं चाहता हूं कि मैं ऐसे गाने लिखूं जिसे हर उम्र के लोग सुन सकें.

हिन्दी फ़िल्में देखते हैं?

क्या बात करते हैं...बहुत. अमिताभ बच्चन साहब का तो मैं बहुत बड़ा फ़ैन हूं. मेरे दोस्त-भाई राजकुमार कपूर से जब मुझे पता चला कि बच्चन साहब की ज़िंदगी के एक अहम हिस्से में 'कहना उसे' एल्बम शामिल रहा है तो मुझे बहुत खुशी मिली. 

हमेशा ये याद रखें कि मोहब्बत एक पौधे जैसी होती है. जब पानी देना धूप दिखाना खाद डालना बंद कर दोगे, तो पौधा मर जाता है.

मैंने बच्चन साहब की पहली फ़िल्म से लेकर अब तक सारी फ़िल्में देखी हैं. चाहे वो खराब फ़िल्में ही क्यों न हो. मैंने उनकी फ़िल्म शराबी जब से देखी है वो मेरी फ़ेवरेट फ़िल्म बन गयी है. वो बेस्ट एंटरटेनर हैं, एक कम्पलीट पैकेज.

शायरी के इतने लम्बे सफ़र में आप अपना सबसे बड़ा हासिल क्या समझते हैं?

मेरा सबसे बडा प्राइड ये है कि हर महफिल में मेरे ऑडियंस में यूथ होता है. मेरी ग़ज़ल नौजवान दिलों को छूती है. आप दिलों को छू लें यही पोएट्री का सबसे बड़ा अवार्ड है.

मोहब्बत पर नौजवान दिलों के लिए कोई मैसेज?

हमेशा ये याद रखें कि मोहब्बत एक पौधे जैसी होती है. जब पानी देना बंद कर दोगे, धूप दिखाना बंद कर दोगे, खाद डालना बंद कर दोगे तो पौधा मर जाता है. वो अचानक से नहीं मरता, वो तुम्हें मैसेज देते हुए मरता है कि देखो मैं मुरझाने लगा हूं, देखो मुझे पानी की ज़रूरत है. देखो मुझे संभाल लो. अगर समय रहते आप यह मैसेज समझ लेंगे तो उसे संभाल लेंगे नहीं तो वह मर जाएगा.  

First published: 23 March 2016, 13:20 IST
 
रंगनाथ सिंह @singhrangnath

पेशा लिखना, शौक़ पढ़ना, ख़्वाब सिनेमा, सुख-संपत्ति यार-दोस्त.

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