Home » इंडिया » Panchayat election in Uttar Pradesh has shown the weakening congress strength
 

यूपी पंचायत चुनाव: अमेठी-रायबरेली और कांग्रेसी तिलिस्म

गोविंद पंत राजू | Updated on: 10 January 2016, 9:13 IST
QUICK PILL
  • पूरे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की स्थिति डांवाडोल है. पंचायत अद्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस एकमात्र रायबरेली की सीट कांटे के टक्कर में जीती है. अमेठी में पार्टी की उम्मीदवार ने अंति समय में ठेंगा दिखाते हुए नामांकन वापस ले लिया और सपा निर्विरोध जीत गई.
  • कहने को अमेठी और रायबरेली कांग्रेस के गढ़ हैं. लेकिन लोकसभा चुनावों को छोड़ दिया जाय तो लगभग सभी चुनावों में उसे इन दोनों सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ता है. दो वीवीआईपी सीटों पर क्या है कांग्रेस और सपा का यह खेल?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए पंचायत चुनावों में एक बड़ी राहत भरी खबर आई है. रायबरेली जिले में जिला पंचायत अध्यक्ष के पद पर उसके उम्मीदवार अवधेश सिंह की समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी प्रभात साहू को 10 वोट से हराकर मिली जीत की खबर. 

उत्तर प्रदेश कांग्रेस इस बात से अपना सीना चौड़ा कर सकती है कि अपनी परंपरागत रायबरेली लोकसभा सीट पर उसका रुतबा अब तक बरकरार है और प्रदेश में अपने अस्तित्व के लिए समाजवादी पार्टी के सामने लगातार नतमस्तक बने रहने के बावजूद उसने सपा को उसके लिए मजबूत समझे जाने वाले किले में जोरदार पटखनी दी है. इस जीत की अहमियत इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि लंबे समय से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के रहमोकरम पर राजनीति कर रही कांग्रेस ने पंचायत चुनावों में समाजवादी पार्टी से कांटे का मुकाबला जीता है. 

लेकिन पार्टी इस बात से बहुत ज्यादा खुश इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि कांग्रेस के भावी नेता माने जाने वाले राहुल गांधी की अमेठी सीट में पार्टी अपनी उम्मीदवारी ही नहीं बचा पाई. वहां कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़ रहीं कृष्णा चौरसिया ने ऐन वक्त पर नाम वापसी के दिन अपना पर्चा वापस ले लिया और समाजवादी पार्टी की शिवकली मौर्य निर्विरोध जीत गईं. 

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपना जनाधार, संगठन और पहचान, सब कुछ खोती जा रही है

शुरू में कांग्रेस के नेताओं द्वारा यह कहा जा रहा था कि यह नाम वापसी एक समझौते के तहत की जा रही है और बदले में समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार रायबरेली से नाम वापस ले लेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बहरहाल कांग्रेस ने किसी तरह रायबरेली में अपनी नाक और साख दोनों बचा लीं.

कांग्रेस भले ही राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्रीय राजनीति में अपनी वापसी की कितनी ही कोशिशें क्यों न करे, उत्तर प्रदेश में वह अपना जनाधार, अपना संगठन और अपनी पहचान, सब कुछ खोती जा रही है. उसके दोनों बड़े नेता रायबरेली और अमेठी के अलावा कहीं आते जाते तक नहीं. 

राहुल गांधी ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में कुछ कोशिशें की भी, मगर वह जमीनी असर नहीं पैदा कर सकी. पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर में अगर कांग्रेस अपनी अमेठी और रायबरेली की सीट बचा सकी तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका समाजवादी पार्टी की थी, जिसने इन दोनों जगहों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों के पक्ष में अपने प्रत्याशी खड़े ही नहीं किए. हालांकि अमेठी और रायबरेली दोनों ही जिलों में कांग्रेस राज्य विधान मंडल में थोड़ा बहुत प्रतिनिधित्व बचा कर अपना अस्तित्व बचाए हुए है.

रायबरेली से उसका एक विधान परिषद सदस्य है और अमेठी से दो विधायक. अमेठी औऱ रायबरेली की ज्यादातर विधानसभाओं पर सपा काबिज है. मगर इसके बाद भी उसे राज्य या केंद्र की राजनीति में उत्तर प्रदेश से प्रतिनिधित्व बचाए रखने के लिए समाजवादी पार्टी की कृपा पानी पड़ती है. प्रमोद तिवारी को राज्य सभा भेजने के प्रकरण में तो समाजवादी पार्टी की यह कृपा सार्वजनिक भी हो गई थी. सपा के समर्थन से वे राज्यसभा पहुंचे थे.

लेकिन यही कृपा अब कंग्रेस को भारी पड़ रही है. सपा की कृपा पात्र होने के कारण उसकी पहचान एक पिछलग्गू दल की तरह हो गई है. राष्ट्रीय नेतृत्व की अदूरदर्शिता के चलते अब उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर भी कोई ऐसा सर्वमान्य नेतृत्व नहीं रह गया है जो पार्टी को नई ऊर्जा देकर आगे ले जाए. हर चुनाव कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में एक विदाई समारोह की तरह होने लगा है.

जब तक कांग्रेस केंद्र की सत्ता में थी, तब तक समाजवादी पार्टी की कृपा प्राप्त करने में कांग्रेस के पास एक समभाव होता था. मुलायम की आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई का भूत लेन-देन का हिसाब बराबर रखता था. लेकिन अब तो कांग्रेस के दोनों हाथ खाली हैं और कुछ भी कृपा पाने के लिए उसे अपने ये दोनों हाथ समाजवादी पार्टी के सामने फैलाने पड़ते हैं. 

बसपा से गठबंधन की आस

इस बीच इस बात के भी कयास लगाए जाने लगे हैं कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बीएसपी के साथ कोई समझौता या तालमेल करके विधानसभा चुनाव लड़ सकती है. इसके लिए नीतीश कुमार के जरिए मध्यस्थता की कोशिश हो सकती है. लेकिन इसमें दिक्कत यह है कि फिलहाल मायावती एक भी सीट छोड़ने को तैयार नहीं हैं, जबकि कांग्रेस कम से कम 100 सीटों का दावा करना चाहती है. ऐसे में यह राह भी कांग्रेस के लिए आसान नहीं रहने वाली. 

उत्तर प्रदेश में बिहार फार्मूला चल भी नहीं सकता और कांग्रेस की स्थिति भी यहां वैसी नहीं है. ऐसे में कांग्रेस के पास दो ही राह बचती हैं कि या तो वह अपने दम पर विधानसभा चुनाव की तैयारी करे और या फिर एक बार विधानसभा चुनाव से खुद को अलग ही कर ले.

राहुल गांधी भले ही कांग्रेस के सबसे बड़े नेता बना दिए जाएं मगर देश के सबसे बड़े सूबे में कांग्रेस की गाड़ी कोई चमत्कार ही आगे बढ़ा सकती है. जमीनी राजनीति पर तो कांग्रेस की पकड़ छूटती ही जा रही है. फिलहाल तो कांग्रेस के पास जश्न करने के लिए रायबरेली जिला पंचायत की जीत का अवसर है ही.

First published: 10 January 2016, 9:13 IST
 
गोविंद पंत राजू @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

पिछली कहानी
अगली कहानी