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पंजाब में अकेली नहीं अकालियों के साथ लड़ेगी भाजपा

समीर चौगांवकर | Updated on: 11 January 2016, 23:55 IST
QUICK PILL
  • आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा अपनी रणनीति में आमूल परिवर्तन ला रही है. पार्टी की रणनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर एक हद से ज्यादा निर्भर रहने की बजाय अब सहयोगियों को बनाए रखने की है.
  • भाजपा के सामने फिलहाल बड़ी चुनौती पंजाब का चुनाव है जहां वह अकाली दल के साथ गठबंधन में है. पार्टी में इस बात पर अत्ममंथन का दौर चल रहा है कि वह पंजाब में अकेले लड़े या अकाली दल के साथ.

बिहार और दिल्ली में बुरी तरह हारने के बाद भाजपा अब अपनी चुनावी रणनीति बदलने में लगी हुई है. हाल ही में कुछ राज्यों में हुए निकाय चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के कारण भाजपा के अंदरखाने में बेचैनी का माहौल है. पार्टी अब एकला चलो का राग त्याग चुकी है.

पार्टी सूत्रों के मुताबिक 2017 में पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस से पैदा होने वाली चुनौतियों को भांप कर अब भाजपा ने पंजाब में अकेले लड़ने का विचार त्याग दिया है. आम आदमी पार्टी के खाते में पंजाब की चार लोकसभा सीटे हैं.

आप और कांग्रेस से पैदा होने वाली चुनौतियों को भांप कर भाजपा ने पंजाब में अकेले लड़ने का विचार त्याग दिया है

भाजपा के इस रुख परिवर्तन के पीछे आम आदमी पार्टी का बढ़ता कद भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है. अब भाजपा की रणनीति अकाली दल के साथ मिलकर चलने की है. हालांकि अभी भी भाजपा में एक धड़ा ऐसा है जो चाहता है कि भाजपा अकालियों को छोड़ कर चुनाव में उतरे. इस धड़े का कहना है कि पंजाब में ड्रग्स के बढ़ते मामलों के कारण अकालियों की छवि बेहद खराब हो चुकी है और अकालियों के साथ लड़ने पर भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.

दूसरी तरफ भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व है जिसका आकलन है कि पंजाब मेे भाजपा अगर अकेले लड़ती है तो चुनाव चार कोणीय हो जाएगा- भाजपा, कांग्रेस, अकाली और आम आदमी पार्टी. इस स्थिति में भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. भाजपा के रणनीतिकारों का आकलन है कि आम आदमी पार्टी पंजाब में कांग्रेस के वोट बैंक में सबसे ज्यादा सेंध लगाएगी.

ऐसी स्थिति में अकाली और भाजपा का साथ में चुनाव लड़ना फायदेमंद होगा. भाजपा को दूसरा डर वरिष्ठ नेता और वित्तमंत्री अरुण जेटली को लोकसभा चुनाव में पटकनी दे चुके कांग्रेस के पंजाब प्रमुख अमरिंदर सिंह से है. भाजपा में इस बात को लेकर गहरा मंथन है कि अमरिंदर सिंह के कांग्रेस की कमान संभालने के बाद स्थितियां बदल गईं हैं.

भाजपा की पंजाब यूनिट अकालियों के खिलाफ है. नवजोत सिंह सिद्धू भी गठबंधन तोड़ने का दबाव बना रहे है

भाजपा पंजाब चुनाव को दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों की रोशनी में देख रही है. दिल्ली में आप ने भाजपा के परंपरागत पंजाबी खत्री और सिखों का वोट अपने पाले में कर लिया था. आंकड़े बताते है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पंजाबी खत्री वोटों में से 36 प्रतिशत वोट मिले थे जो 2015 के चुनाव में घटकर 33 प्रतिशत रह गए.

यही नहीं 2015 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को सिख वोटों का लगभग 57 प्रतिशत वोट मिला था जबकि भाजपा को 34 प्रतिशत. भाजपा को लग रहा है कि भले ही अकाली दल के खिलाफ जनता में नाराजगी हो लेकिन अकालियों के साथ लड़ने पर भाजपा को को कम से कम अकाली वोटों का एक हिस्सा जरूर मिलेगा और सरकार बनाने की संभावना भी बनी रहेगी.

हालांकि भाजपा की पंजाब यूनिट भी अकालियों के खिलाफ है. पंजाब भाजपा के नेता नवजोत सिंह सिद्धू भी अकालियों से गठबंधन तोड़ने का भाजपा हाईकमान पर दबाव बना रहे है. इस बात की संभावना है कि भाजपा अंतिम समय में नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब की कमान सौप सकती है. लेकिन सिद्धू अकालियों से गठबंधन को शायद स्वीकार नहीं करेंगे.

उल्लेखनीय है कि 2012 के पंजाब विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 117 सीटों पर चुनाव लड़कर 47 सीटों पर जीत दर्ज की थी वही भाजपा और अकाली दल के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था. भाजपा ने 23 सीटों पर लड़कर 12 सीटों पर जीत दर्ज की थी. शिरोमणि अकाली दल ने 94 सीटों पर लड़कर 56 सीटें जीती थी. इस चुनाव में कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि भाजपा को 7.18 और अकाली दल को 34.73 प्रतिशत मत मिले थे.

अगर भाजपा ने पंजाब विधानसभा चुनाव अकेले लड़ा तो लोकसभा चुनाव भी उसे अकेले ही लड़ना पड़ेगा

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के लगभग ढाई साल बाद 2017 में जब पंजाब में चुनाव होंगे तब तक मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ और भी नीचे गिरने की संभावना है. फिलहाल उनकी लोकप्रियता नीचे गिरने का क्रम जारी है. ऐसी स्थिति में मोदी के दम पर अकेले पंजाब चुनाव में जाना समझदारी नहीं होगी. मजबूरन उसके सामने अकाली दल के साथ चुनाव में जाने का विकल्प ही शेष बचता है.

पंजाब विधानसभा चुनाव के दो साल बाद ही लोकसभा के चुनाव होंगे. अगर भाजपा ने पंजाब में विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का निर्णय लिया तो लोकसभा चुनाव भी उसे अकेले ही लड़ना पड़ेगा, मोदी की गिरती लोकप्रियता के साथ पार्टी यह जोखिम लेेने को तैयार नहीं है.

First published: 11 January 2016, 23:55 IST
 
समीर चौगांवकर @catchhindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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