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सरकार को सैनिकों की कुर्बानी का संकेत समझना होगा

पिनाकी भट्टाचार्य | Updated on: 28 February 2016, 8:28 IST
QUICK PILL
  • पिछले कुछ समय में हुई मुठभेड़ों में कई जवानों की जान जा चुकी है. इतने जवानों की मौत से साफ है कि ज्वाइंट स्पेशल फोर्स के जल्द गठन की जरूरत है.
  • जवानों के पास पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण भी नहीं है. सरकार को सेना से जुड़े प्रस्तावों को लालफीताशाही से आजादी दिलाने होगी.

भारतीय सेना के वेटेरन पैराशूट रेजिमेंट कमांडो कश्मीर में हाल में हुई मुठभेड़ों में हुए नुकसान से खफा है. पैरा कमांडो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "सीमावर्ती इलाकों में पैरा कमांडो की कोई भूमिका नहीं होती. उन्हें जो काम सौंपा जाता है वो सेना कर सकती है."

पिछले कुछ महीनों में पैरा कमांडो के एक कर्नल, दो कैप्टन और दो लांस नायकों की जान जा चुकी है. पैरा कमांडों को होने वाली क्षति ज्यादा मायने रखती है क्योंकि वो अति-प्रशिक्षित और सुसज्जित होते हैं. वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि पैरा कमांडो की क्षति संसाधनों का बड़ा नुकसान है.

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साल 2000 में एक वरिष्ठ पैरा अधिकारी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई जो पैराशूट रेजिमेंट की आवश्यक्ताओं का विश्लेषण करेगी. उस समय रेजिमेंट में तीन बटालियनें (1 पैरा, 2 पैरा और 21 पैरा) थीं. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में एक और बटालियन जोड़ने की सलाह दी थी.

इस समय पैराशूट रेजिमेंट में कुल नौ बटालियनें हैं. दसवीं तैयार की जा रही है. उस कमेटी की रिपोर्ट के लेखक के अनुसार ये पर्याप्त नहीं है. उन्होंने कैच को बताया, "पैरा के पास संसाधनों की सख्त कमी है. उनके पास जरूरी अत्याधुनिक रायफलों तक की कमी है. जिसकी वजह से उन्हें एके-47 और इंसास रायफलों से काम चलाना पड़ता है."

पैरा कमांडो के पास संसाधनों की सख्त कमी है. उनके पास जरूरी अत्याधुनिक रायफलों तक की कमी है

पैरा कमांडो ही नहीं सेना के जवान भी ऐसी दिक्कतों से जूझ रहे हैं. ये जवान जो कवच पहनते हैं उसमें आगे और पीछे सिरेमिक प्लेट का प्रयोग किया जाता है. इससे साधारण गोली रुक जाए वही बड़ी बात है. आतंकियों के सेमी-ऑटोमैटिक और ऑटोमैटिक बंदूकों की तो बात ही छोड़ दीजिए.

एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल कहते हैं कि श्रीनगर के पंपोर में हाल ही हुई मुठभेड़ में वस्तुस्थिति का पूरा आकलन किए बिना ही पैरा कमांडो को भेज दिया गया.

पूर्व अधिकारी कहते हैं कि पंपोर में सरकारी इमारत में तीन आतंकी थे जो लोगों को बंधक भी बना सकते थे. पैरा कमांडो ऐसी स्थिति के लिए नहीं होता. उनके पास बंधकों को छुड़ाने के लिए वार्ता करने का प्रशिक्षण नहीं होता. उनका काम दुश्मन की सीमारेखा के पीछे होता है.

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वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि पंपोर हमले ने एक बार फिर ज्वाइंट स्पेशल फोर्सेज (जेएसएफ) की कमी को रेखांकित किया है. जेएसएफ में नेशनल सिक्योरिटी गार्ड समते सभी सुरक्षा बलों को मिलाकर एक संयुक्त कमांड बनाने की जरूरत है.

इसमें हाल ही बने नए कमांडो ग्रुपों मसलन नौसेना के मारकोस और वायु सेना के गरुड़ के जवानों को भी शामिल किया जा सकता है.

इंटीग्रेटेड डिफेंस सर्विसेज(आईडीएस) ने करीब तीन साल पहले जेएसएफ बनाने का प्रस्ताव दिया था. अभी सरकार ने इसके गठन की मंजूरी नहीं दी है. जाहिर है कि इस मंजूरी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा भारत की जानमानी लालफीताशाही है. राजनेताओं को इसे प्राथमिकता के स्तर पर लेना होगा.

मनमोहन सिंह की यूपीए-दो और नरेद्र मोदी की एनडीए सरकार जेएसएफ समेत चार ज्वाइंट कमांड के प्रस्ताव पर बैठी हुई है. जिस तरह पैरा कमांडो की जान गई उससे भारतीय सैन्य बल के हायर कमांड की विफलता साफ जाहिर होती है.

भारत में सभी सुरक्षा बलों को मिलाकर एक ज्वाइंट स्पेशल फोर्स बनाने की सख्त जरूरत है

भारत सरकार के मीडिया मैनेजरों ने हाल में हुई मुठभेड़ों में मारे गए सैनिकों की मौत का खूब प्रचार किया. इसका मकसद ये बताना था कि हमारे सैनिक कितना बहादुर हैं. टीवी और विज्ञापन जगत को ऐसी कहानियां पसंद आती हैं.

एक अधिकारी ने बताया, "ऐसे में जिहादी अपने प्रोपगैंडा वीडियो और साहित्य में दिखाते हैं कि किस तरह एक जिहादी स्पेशल फोर्सेज के चार जवानों को मार देता है."

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दूसरी तरफ सेना के दो मेजर जनरलों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई जांच की झूठी खबर मीडिया में आने से नाराज है.

सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कैच को कुछ हफ्तों पहले बताया था, "उनमें से एक मेजर जनरल एक मीडिया संस्थान के खिलाफ मानहानि का मामला दायर कर रखा है."

उस झूठी खबर के आने के बाद रक्षा मंत्रालय ने मामले की जांच के लिए जैसी तत्परता दिखायी वो ज्यादा चिंताजनक है. इससे जाहिर होता है कि राजनेता और ब्यूरोक्रेट सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को अपने काबू में रखने का कोई मौका नहीं चूकना चाहते.

First published: 28 February 2016, 8:28 IST
 
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