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परिवर्तन यात्राः यूपी में विजय के लिए भाजपा का मेगा चुनावी अभियान

सुहास मुंशी | Updated on: 10 October 2016, 1:54 IST
(गेटी इमेजेज़)
QUICK PILL
  • परिवर्तन यात्रा की शुरुआत 5 नवम्बर को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और केन्द्रीय मंत्रियों राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र और उमा भारती से कराने की रणनीति बनाई गई है.
  • 31 दिसम्बर को लखनऊ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रैली में मुख्य आकर्षण का केन्द्र रहेंगे.

5 नवम्बर को भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने सबसे बड़े चुनावी अभियान की शुरुआत करने जा रही है. उस दिन अलग-अलग जगहों से रैलिया निकाली जाएंगी. उत्तर-पश्चिम में सहारनपुर से, दक्षिण में ललितपुर से, दक्षिण-पूर्व में सोनभद्र से और पूर्व में बलिया से  रैलियां निकालेंगी. चारों रैलियां परिवर्तन यात्रा कहलाएंगी और सामूहिक रूप से इनका समापन 31 दिसम्बर को लखनऊ में होगा. समापन समारोह में विशाल जनसभा होगी.

इन रैलियों में भाजपा के वरिष्ठ नेता शामिल होंगे. महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, बेरोजगारी, गरीबी, कैराना, दादरी और हालिया सर्जिकल स्ट्राइक का मुद्दा निश्चित रूप से उठाया जाएगा. पार्टी सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी की टिप्पणी 'खून की दलाली' को अपने चुनावी अभियान का हिस्सा बनाएंगे.

परिवर्तन यात्रा की शुरुआत 5 नवम्बर को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और केन्द्रीय मंत्रियों राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र और उमा भारती से कराने की रणनीति बनाई गई है. 31 दिसम्बर को लखनऊ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रैली के मुख्य आकर्षण के केन्द्र रहेंगे.

अमित शाह की निगरानी

भाजपा संगठन और रैलियों की रणनीति से जुड़े कार्यकर्ताओं के अनुसार 55 दिन की इस यात्रा में राज्य की सभी 403 विधानसभाओं में जाने की तैयारी है. पार्टी ने राज्य के सामाजिक समीकरणों का पूरा ध्यान रखा है. पार्टी नेता किस रैली में कहां भाग लेंगे, आयोजकों ने इसका खाका पहले से ही खींच लिया है.

ये परिवर्तन यात्राएं अमित शाह की निगरानी में हमेशा रहेंगी. अमित शाह धम्म चेतना यात्रा के अंतिम चरण में भी हिस्सा लेंगे. बौद्ध भिक्षुओं द्वारा इस टूर (अभियान) की शुरुआत मई के अंतिम दिनों में की गई थी. धम्म चेतना यात्रा का आयोजन इसलिए किया गया था ताकि दलितों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को भाजपा के प्रति आकर्षित किया जा सके. इस टूर का समापन

14 अक्टूबर को किया जाएगा. 14 अक्टूबर को ही डॉ. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी.

सूत्रों के अनुसार पार्टी ने बिहार में स्थानीय नेताओं को नकारने और बाहरी नेताओं समेत मोदी और शाह पर ज्यादा निर्भर रहने से जो सबक सीखा है, उसका असर इस परिवर्तन यात्रा में दिखेगा. उप्र में जो रैलियां निकाली जाएंगी और रोड शो किए जाएंगे, उसकी कमान स्थानीय नेताओं के हाथ में रहेगी.

विशेषकर, मोदी को इन शो में ज्यादा 'एक्सपोज' नहीं किया जाएगा. हालांकि, जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं से यही कहा जा रहा है कि मोदी जी से अनुरोध किया गया है कि वे ज्यादा से ज्यादा रैलियों में आकर अपना सम्बोधन दें, लेकिन इन दिनों वह बहुत व्यस्त चल रहे हैं.

जातीय समीकरणों पर ज़ोर

किसी को भी यह आभास हो सकता है कि इन चारों रैलियों की शुरुआत के लिए जिन स्थानों का चयन किया गया है और जिन नेताओं को इन रैलिय़ों को हरी झंडी दिखानी है, उसके लिए जातीय समीकरणों का पूरा ध्यान रखा गया है. यह साफ दिखता है कि पार्टी के इस निर्णय में जातीय माहौल को अपने पक्ष में भुनाने की पूरी कोशिश की गई है.

इन चारों यात्राओं को जहां से रवाना किया जाना है, वहां उन क्षेत्रों के नेताओं की लोकप्रियता और उनके उपयोग का पूरा ध्यान रखा गया है. रैलों की शुरुआत बनिया (शाह), ब्राह्मण (मिश्र) लोध ओबीसी (उमा भारती) और ठाकुर (राजनाथ सिंह) करेंगे. इन सभी को उन्हीं क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई है, जहां उनकी जातियों का वर्चस्व है.

सहारनपुर क्षेत्र में मुस्लिम और ओबीसी हिन्दू ज्यादा है, बलिया में ठाकुरों और ब्राह्मणों का बोलबाला है, ललितपुर में लोध ओबीसी अधिसंख्य हैं और सोनभद्र में पासी और चमार जाति किसी को जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इन सभी का उपयोग वोट साधने में होगा.

चुनावी चौसर

भाजपा ने मूलतः अपने चुनावी अभियान को महिला असुरक्षा, बढ़ते अपराध, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी आदि पर केन्द्रित करने का निश्चय किया है. पार्टी ने वर्ष 2016-17 को 'गरीब कल्याण वर्ष' के रूप में मनाने का भी निश्चय किया है. पार्टी नेता और कार्यकर्ता इन मुद्दों को रैलियों में मतदातओं के सामने उठाएंगे ही, पर पार्टी के हाथ हाल ही में ही एक नया 'कोर मुद्दा' हाथ लग गया है.

एक सूत्र ने कहा, देखिए, हम महिलाओं के प्रति अपराध, जो 100 फीसदी तक बढ़ गए है, को केन्द्र बिन्दु में रख रहे हैं. लेकिन हाल ही में ऐसी कुछ घटनाएं हुई हैं, जिनके चलते हमें अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर आवाज उठाने को मजबूर होना पड़ा है. इन मुद्दों में कैराना से हिन्दुओं का पलायन, दादरी घटना और सर्जिकल स्ट्राइक आदि महत्वपूर्ण मुद्दे हैं.

सूत्र ने यह भी कहा कि हमारे वरिष्ठ नेता महेश शर्मा दादरी गए थे और वहां एक दिन रहे. दादरी की घटना को लेकर हम उप्र के लोगों तक पहुंचेगे और मांग करेंगे कि रवि (दादरी के बिसाहड़ा गांव में हुई मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या मामले के एक अभियुक्त जिसकी अस्पताल में अंग फेल हो जाने कारण मौत हो गई थी, वह साल भर से हिरासत में था) के परिजनों को भी उसी तरह से क्षतिपूर्ति दी जाए जिस तरह से अख़लाक़ के परिजनों को दी गई थी.

हम पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और पाक को अपने दिए गए जवाब के बार में भी मतदाताओं को बताएंगे. भाजपा नेताओं को विश्वास है कि राहुल गांधी के 'खून की दलाली' वाले बयान से वे भारी भीड़ जुटा सकेंगे. पार्टी

सूत्र ने कहा कि हमने पहले से ही राहुल को घेरने का अभियान शुरू कर दया है. पार्टी पूरे राज्य में घूम-घूमकर उनके इस बयान को लोगों तक पहुंचाएगी. हम कई विधान सभा क्षेत्रों में उनके पुतले फूंकने के भी कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं.

सूत्रों के अनुसार भाजपा के एक अग्रणी योजनाकार आदित्यनाथ, जिनकी पूर्वी उप्र में अच्छी खासी लोकप्रियता है, पूरे राज्य का दौरा कर रहे हैं. सूत्र ने यह भी बताया कि हमारे बीच कोई स्टार कम्पेनर नहीं है. हर कार्यकर्ता स्टार कम्पेनर है.

बड़ी बाज़ी

पिछले कई सालों से भाजपा उप्र में सत्ता में नहीं रहीं है. उसके लिए जीत की थाह लेना बड़ी बात हो सकती है. कई सालों में यह पहली बार है जब भारतीय प्रधानमंत्री दशहरा दिल्ली में नहीं, वरन लखनऊ में मना रहे हैं. मोदी के 11 अक्टूबर को लखनऊ में रहने के निर्णय से विरोधियों के कान खड़े हो गए हैं.

सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के बड़े नेता हर साल लखनऊ के ऐतिहासिक ऐशबाग रामलीला मैदान में जाकर दशहरा कार्यक्रम में भाग लेते रहे हैं. सपा ने आरोप लगाया है कि भाजपा ने अपने राजनीतिक हित के लिए उसके कार्यक्रम को 'हाइजैक कर लिया है.

दयाशंकर अभी भी मायावती पर हमलावर

इसके अलावा भाजपा चुनावों के मुद्देनजर उप्र की राजधानी में कई अन्य कार्यक्रमों का आयोजन करने जा रही है. इसमें परिवर्तन यात्रा का मेगा फिनाले समेत कई आयोजन शामिल हैं. इसके अलावा भाजपा ने दो-तीन दिन पहले ही अपने चुनावी अभियान को गति देते हुए पार्टी से निकाले गए राज्य इकाई के उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह को पार्टी की महिला मोर्चे का उपाध्यक्ष बनाया है.

भाजपा के इस निर्णय से पार्टी के भीतर या बाहर के लोंगो को ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ है. यह सभी को अच्छी तरह मालुम है कि भाजपा में ठाकुर नेताओं का भारी अभाव है, मायावती के बारे में अपशब्द कहने पर भाजपा ने जून में दयाशंकर सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया था. दयाशंकर सिंह के विवादित बयान पर काफी हो-हल्ला मचा था. उन्हें निकाले जाने के बाद से पार्टी के पास राजनाथ सिंह के अलावा और कोई लोकप्रिय क्षत्रिय नेता नहीं बचा था.

भाजपा से निकाले जाने के बाद भी दयाशंकर सिंह ने मायावती पर व्यक्तिगत हमले करना जारी रखा. उन्होंने ठाकुर बाहुल्य क्षेत्रों में जो रैलियां कीं, उसमें उन्होंने मायावती की तुलना सड़क पर घूमने वाले कुत्ते से कर दी, और उन्हें पैसे लेकर टिकट देने वाला, लोभी और डरपोक तक कह डाला.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बसपा प्रमुख मायावती पिछड़े वर्ग की काफी सशक्त लोकप्रिय नेता हैं, दयाशंकर सिंह की टिप्पणी से पार्टी को नुकसान होने का भय था. पार्टी ने उनकी पत्नी को वरिष्ठ पद पर नियुक्ति देकर यह संकेत दिया है कि पार्टी ठाकुरों के सथ खड़ी है.

भाजपा उप्र में चुनाव जीतने के लिए हर तरह की बाजी लगा रही है. वह दलितों, ओबीसी और बौद्धों (जिनकी संख्या उप्र में 40-50 लाख है), को खुश कर रही है, ऊंची जाति के ठाकुरों को लुभा रही है और ब्राहमण सम्मेलनों का आयोजन कर रही है. पार्टी न केवल उप्र के चुनावों में बाजी मार लेना चाहती है बल्कि गुजरात में भी अपना प्रभाव छोड़ना चाहती है और साथ ही 2019 के आम चुनाव में भी.

सवाल है कि क्या भाजपा वह सब हासिल कर सकेगी जिसके लिए वह इतनी कोशिश कर रही है. नए साल की शुरुआत तक, जब पार्टी का भारी-भरकम चुनावी अभियान खत्म हो जाएगा, तब कुछ अच्छी कल्पना या अनुमान तो लगाया ही जा सकेगा.

First published: 10 October 2016, 1:54 IST
 
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