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पार्थ चटर्जी: निजी आज़ादी के बिना लोकतंत्र एक मज़ाक बन जाएगा

सौरव दत्ता | Updated on: 22 March 2016, 20:17 IST

प्रसिद्ध इतिहासकार पार्थ चटर्जी ने कहा है कि सरकार और उसकी विभिन्न एजेंसियां ये नहीं तय कर सकते कि विश्वविद्यालय परिसरों में किस विषय पर बात की जाए. चटर्जी ने ये बात जेएनयू के एडमिनिस्ट्रेशन ब्लॉक पर एकत्रित छात्रों को संबोधित करते हुए कही.

पार्थ चटर्जी को राष्ट्रवाद और उसकी विभिन्न व्याख्याओं पर किए गए अध्ययन के लिए जाना जाता है. वो अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया अध्ययन विभाग और नृविज्ञान विभाग में पढ़ाते हैं.

अपने भाषण में चटर्जी ने निजी आज़ादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की जरूरत पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि अगर इन आज़ादी को छीना जाता है तो कथित संवैधानिक लोकतंत्र एक मज़ाक बनकर रह जाएगा.

भौगोलिक सीमा के आधार पर 'राष्ट्र' को परिभाषित करने की शुरुआत 1884-85 के बर्लिन सम्मेलन में हुईः पार्थ चटर्जी

चटर्जी ने अपने भाषण में कहा, "विश्वविद्यालय आलोचनात्मक चिंतन,तर्क और विश्लेषण का केंद्र होते हैं. अगर राज्य या उसके छिपे हुए एजेंट परिसरों में बोलने पर रोक लगाते हैं तो देश में संवैधानिक लोकतंत्र नहीं बचेगा. ये निरंकुशता का प्रतीक बनकर रह जाएगा."

चटर्जी ने कहा कि अगर सांसदों के पास अपने विचार रखने का अधिकार है तो विश्वविद्यालयों के पास ये आज़ादी क्यों नहीं होनी चाहिए.

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अपनी किताब 'द नेशन एंड इट्स फ्रैगमेंट्स' में पार्थ चटर्जी ने राष्ट्रवाद की बहुुसंख्यकवादी परिभाषा की आलोचना की है.

चटर्जी ने कहा, "जब आज़ादी के नाम पर आत्मचयन का अधिकार मांग रहे लोगों का शोषण और उत्पीड़न किया जाने लगे तो औपनिवेशक विचारों पर सवाल खड़ा करना वाजिब है."

चटर्जी ने कहा कि भौगोलिक सीमा के आधार पर 'राष्ट्रीयता' और 'राष्ट्र' को परिभाषित करना उदार लोकतंत्र के विचार के खिलाफ है.

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चटर्जी ने अपने भाषण में 'राष्ट्रवाद' की अवधारणा का ऐतिहासिक विकास को रेखांकित किया.

चटर्जी ने कहा, "भौगोलिक सीमा के आधार पर 'राष्ट्र' को परिभाषित करने की शुरुआत 1884-85 के बर्लिन सम्मेलन में हुई. ये सम्मेलन यूरोपीय देशों ने अफ्रीका के इलाकों के आपस में बंटवारे के लिए बुलायी थी."  उन्होंने कहा कि भारत पर इस विचार को थोपना हास्यास्पद है.

'भौगोलिक सीमा के आधार पर 'राष्ट्रीयता' और 'राष्ट्र' को परिभाषित करना उदार लोकतंत्र के खिलाफ: पार्थ चटर्जी

1950 के दशक में भाषायी अस्मिता को लेकर हुई हिंसाओं को तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू ने 'राष्ट्रीय एकता' के लिए खतरा बताया था. चटर्जी ने कहा कि नेहरू इस मसले पर ग़लत थे.

भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए ब्रितानी शासन के दौरान लागू की गयी थी. इसके तहत सरकार के कामकाज़ के प्रति असंतोष जाहिर करने को अपराध घोषित कर दिया गया. चटर्जी ने कहा कि राजद्रोह का ये कानून ब्रितानियों ने भारत पर आधिपत्य बनाए रखने के लिए बनाया था.

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चटर्जी के अनुसार कुछ सांसदों का ये कहना भी ग़लत है कि संविधान की आलोचना नहीं की जा सकती. उन्होंने कहा कि अगर संविधान पर सवाल उठाना ग़लत है तो संसद संविधान में किस अधिकार से लगातार संशोधन करती रहती है? 

चटर्जी ने अपने भाषण का समापन करते हुए कहा, "भारतीय राजनीति और समाज में गहरी असमानता है. जेंडर, जाति और वर्ग की असमानताएं हैं. जब तक व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं की जाएगी तब तक बाक़ी असमानताओं को दूर करने महज एक ख्वाली पुलाव ही रहेगा."

बहरहाल, जेएनयू विवाद के बाद यहां के छात्रों ने एडमिनिस्ट्रेशन ब्लॉक का नाम बदलकर फ्रीडम ब्लॉक रख दिया है. छात्र विभिन्न विद्वानों को राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता जैसे विषयों पर लेक्चर देने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं.

First published: 22 March 2016, 20:17 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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