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पटेल आंदोलन पार्ट-2: आनंदीबेन के हाथ से फिसलती कमान

सुधाकर सिंह | Updated on: 18 April 2016, 22:56 IST

सोमवार को गुस्साए पटेलों का गुजरात बंद शांतिपूर्ण ढंग से निपट गया. हालांकि राजनीतिक और आर्थिक रूप से सशक्त  पटेल समुदाय के आंदोलन के फिर से विस्फोट ने गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की कार्यप्रणाली पर कुछ सवाल उठा दिए हैं.

पटेल आंदोलन के फिर से उभार के लिए कई कारणों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. इस बार का आंदोलन आरक्षण की मांग से ज्यादा पाटीदार अनामत आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल की रिहाई को लेकर है. हार्दिक पटेल सूरत जेल में पिछले साल अक्टूबर से बंद हैं.

नौकरी में कोटा की मांग को लेकर पिछले साल अगस्त में रैली से शुरू हुए पटेल आंदोलन ने आठ महीने में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया है. भाजपा की रीढ़ रहे इस समुदाय को उसके असली इरादे को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिल रहे हैं.

इस बार का पटेल आंदोलन पाटीदार अनामत आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल की रिहाई को लेकर है

1980 के दशक से बीजेपी के हर अच्छे-बुरे समय में पटेल समुदाय ने साथ दिया है. 80 के दशक में आरक्षण विरोधी आंदोलन हो, देश का राजनीतिक इतिहास बदलने वाला रथ यात्रा हो, 2002 के दंगों के बाद पार्टी के 'छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों' के खिलाफ सोशल इंजीनियरिंग प्रोग्राम हो या गुजरात को निवेशकों के आदर्श स्थल के रूप में पेश करने में इनका साथ रहा है. इसलिए आनंदीबेन पटेल के लिए संभव नहीं है कि वे आंदोलनकारियों के साथ कड़ाई से पेश आएं.

पिछले साल 25 अगस्त को हुई पटेलों की रैली को लेकर सरकार इतनी उदार नजर आई कि बीजेपी पर आरोप लगने लगा कि वह खुद इस आंदोलन के पीछे है और वर्तमान समय में आरक्षण प्रणाली की निर्थकता को लेकर वह देश में राष्ट्रव्यापी बहस खड़ा करना चाहती है.

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हालांकि, कानून-व्यवस्था के धाराशायी हो जाने और सार्वजनिक संपत्तियों के भारी नुकसान के बाद पुलिस को कार्रवाई करने पर मजूबर होना पड़ा. गुजरात में पिछले दो दशकों के भगवा शासन के दौरान एक-दूसरे के बेहद नजदीक रहे पटेल समुदाय और बीजेपी के लिए पुलिस कार्रवाई ने अलगाव की स्थिति पैदा कर दिया.

गुजरात में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से ही पटेल समुदाय लाभार्थियों की सूची में रहा है. पिछले तीन दशकों से पार्टी के साथ 'भावुक' रिश्ते से जुड़े पटेल समुदाय के लिए भी अलग होना आसान नहीं था. पटेलों के अंदर बीजेपी को लेकर 'कमजोरी' पिछले साल नवंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में दिखी. जहां शहरी क्षेत्रों में इस समुदाय के लोगों ने बीजेपी पर भरोसा जताया वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों ने बीजेपी से नाराजगी जताई.

जाट आंदोलन की सफलता गुजरात में पटेलों के लिए तमाचा है: प्रकाश शाह

बीजेपी के लिए पटेलों की कमजोरी सामने आने के बाद और शहरी क्षेत्रों में पार्टी को मिली जीत ने साबित किया कि पटेल पहले की तरह एकजुट नहीं है. यानि पूरे राज्य में पटेल एकजुट होकर मतदान नहीं करते.

इस खोज ने शायद बीजेपी को हार्दिक पटेल और अन्य पटेल नेताओं के खिलाफ राष्ट्रद्रोह के आरोप को वापस लेने से इंकार करने के लिए प्रोत्साहित किया होगा जबकि कई आंदोलनकारियों के खिलाफ यह केस कमजोर है जिन्हें अंत में बरी किया जा सकता है.

पटेलों और बीजेपी की एक-दूसरे के प्रति 'कमजोरी' उस समय भी परिलक्षित हुई जब सरकार ने अपने दूतों को सूरत जेल में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल से मिलने के लिए भेजा और स्वेच्छा से उसने हार्दिक के पत्रों, अपीलों और अल्टीमेटम को जेल से बाहर आने दिया.

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पहले ही अंदेशा था कि सरकार और हार्दिक पटेल के बीच वार्ता गलत रास्ते पर है क्योंकि बीजेपी ने वार्ता के लिए पोरबंदर से सांसद विट्ठल रडाडिया को दूत नियुक्त किया था जिनकी विश्वसनियता पहले से संदिग्ध है. हाल में ही एक बुर्जुग व्यक्ति को लात मारने के चलते और टोल प्लाजा में बंदूक लहराने वाले रडाडिया पहले से ही बदनाम रहे हैं.

वरिष्ठ टिप्पणीकार प्रोफेसर प्रकाश शाह के अनुसार, मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की इस घोषणा के बाद कि वह 2017 विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद की दावेदार नहीं होंगी, हालिया उथल-पुथल को बीजेपी के अन्य पटेल नेताओं के बढ़ती महत्वाकांक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है.

प्रोफेसर शाह के अनुसार हरियाणा में हिंसक आंदोलन के बाद जाटों को मिली सफलता से गुजरात की हालिया हिंसा को शह मिला होगा. उन्हें लगता है कि इस रास्ते वो अपने लिए कुछ आरक्षण की व्यवस्था कर सकते हैं.

गुजरात में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से ही पटेल समुदाय लाभार्थियों की सूची में रहा है

शाह कहते हैं कि जाट आंदोलन की सफलता गुजरात में पटेलों के लिए तमाचा है. समाजविज्ञानी और लेखक अच्युत याग्निक इस मुद्दे पर स्पष्ट हैं. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के पास इस समस्या को लेकर कोई 'दृष्टि, रणनीति और सामाजिक समीकरणों की समझ ही नहीं थी.'

अच्युत याग्निक के अनुसार सरदार पटेल ग्रुप के नेता लालजी पटेल जेल में बंद हार्दिक पटेल के स्थान पर खुद को पेश करने की कोशिश में है. रविवार को हुई हिंसा में लालजी पटेल गंभीर रूप से घायल हुए हैं. उन्होंने कहा, इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि दिसंबर, 2017 में होने वाले चुनाव में पटेलों द्वारा नई पार्टी का गठन किया जाए.

First published: 18 April 2016, 22:56 IST
 
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