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इस बचकानी खिसियाहट से क्या हासिल होगा?

पाणिनि आनंद | Updated on: 9 January 2016, 15:07 IST

बुधवार की शाम का धुंधलका अभी छाना शुरू हुआ था कि हिंदी के एक चैनल पर ख़बर प्रसारित हुई कि कई केंद्रीय मंत्री अचानक ही रेसकोर्स स्थित प्रधानमंत्री आवास की ओर तेज़ी से पहुंच रहे हैं. मंत्रियों की बैठक सुबह होनी थी. तो फिर शाम को अचानक से आई तेज़ी क्यों. इसके जवाब खोजने में पत्रकार-खबरनबीस लगे हुए थे.

मंत्रियों की आमद का कोई आधिकारिक कारण न तो पार्टी कार्यालय के पास था और न ही सूत्रों के पास. सबकी अपनी-अपनी कयास थी. इन कयासों में एक कारण पठानकोट भी था.

अभी यह ख़बर कच्ची और अधूरी चल ही रही थी कि अचानक से ब्रेकिंग के टैग के साथ तमाम चैनलों ने घोषित कर दिया कि पठानकोट में एक संदिग्ध को पकड़ लिया गया है. चंद पलों में ही टीवी स्क्रीन पर एक व्यक्ति दिखाई दिया जिसे सेना के एक जवान ने गनप्वाइंट पर रोक रखा है. पास में ही उसका एक पीठ वाला बैग रखा था. एक खुला हुआ कोट और कुर्ता पहने यह आदमी खिचड़ी दाढ़ी और छरहरी काया वाला सामान्य सा व्यक्ति था.

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कोई सामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति संदिग्ध भी हो सकता है. संदिग्धों को हिरासत में लिया जाना चाहिए ताकि यथाशीघ्र इस घटना का सच सामने आ सके. लेकिन संदिग्धों को पकड़ने की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए, यह तो सोचना ही होगा. पठानकोट में ही एनएसजी के बम निरोधक दस्ते के प्रमुख, लेफ्टीनेंट कर्नल ईके निरंजन की इसी चक्कर में जान चली गई.

उनके कुछ अन्य साथी भी एक हमलावर के शव को पलटते वक्त हुए विस्फोट में बुरी तरह घायल हुए. निरंजन ने उस वक्त बम निरोधक गतिविधियों के लिए पहने जाने वाला सुरक्षा कवच जैसा कुछ नहीं पहन रखा था. शायद अतिविश्वास के कारण एक बड़े अधिकारी की मौत हो गई.

इस ग़लती से हमने कुछ नहीं सीखा. एक जवान उस कथित संदिग्ध को बूटों से मार रहा है. वो संदिग्ध निरीह की तरह खड़ा है. उसके हाथ न तो पकड़े जा रहे हैं और न ही उसकी तत्काल तलाशी ली जा रही है. और यह सारा तमाशा टीवी चैनलों को रिकॉर्ड करने दिया जा रहा है.

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फर्ज़ कीजिए कि पकड़ा गया व्यक्ति वाकई एक संदिग्ध हो और उसके पास कुछ नुकसान करने योग्य सामग्री हो. ऐसे में सेना के जवान और टीवी चैनल के शाखामृगों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा.

ऐसा क्या है कि सेना के ऑपरेशन और तलाशी अभियान को लाइव करने की ज़रूरत महसूस हो रही है. ऐसा क्यों है कि हम मीडिया को अपनी छापेमारी में साथ-साथ लिए घूम रहे हैं. ऐसा कौन सा योगदान मीडिया के लोग सेना के साथ लगकर कर रहे हैं जिससे संदिग्धों को पकड़ने में आसानी होगी?

हमने अभी तक 26-11 के मुंबई हमलों से सबक क्यों नहीं सीखे हैं. हम क्यों सुप्रीम कोर्ट के इस बाबत निर्देशों की अवहेलना करना चाहते हैं. हम कब तक इस देश में एक ग़ैर-ज़िम्मेदाराना और ग़ैर-पेशेवर पत्रकारिता करते रहेंगे और कब तक अनुशासन की वर्दी में होकर भी मीडिया के कैमरे के ज़रिए हो रहे उपद्रव को आतंक फैलाने देंगे?

किसी संदिग्ध के पकड़े जाने की प्रक्रिया की एक गोपनीयता और सतर्कता होती है. यह सेना के प्रशिक्षण का और काम का हिस्सा है. मीडिया के नहीं. कम से कम भारतीय मीडिया के तो कतई नहीं. ऐसी अधकचरी फौज को कंधे पर लेकर संदिग्ध खोजने की आवश्यकता एकदम समझ से परे है.

और तो और, अगर यह व्यक्ति इस पूरे प्रकरण में निर्लिप्त पाया जाता है तो फिर इसकी व्यक्तिगत पहचान को सबसे सामने उछालने के लिए कौन-कौन ज़िम्मेदार ठहराए जाएंगे. क्या टीवी चैनलों के संपादक और सेना के अधिकारी इन व्यक्ति के मान मर्दन और बदनामी के लिए सज़ा भुगतने के लिए तैयार हैं.

अगर संदिग्ध की हिरासत को दिखाया गया तो उसकी पहचान और संलिप्तता की पुष्टि होने तक उसके चेहरे को छिपाने या कम से कम लाइव फुटेज में ब्लर करने की बहुत आधारभूत ज़रूरतों को क्यों अनदेखा किया गया.

ऐसा क्यों है कि एक व्यक्ति के अस्तित्व का सम्मान करना हमारे लिए इतना मुश्किल है कि हम एक वहशी भीड़ की तरह किसी को सरे चौराहे नंगा करना शुरू कर देते हैं और फिर उसे सज़ा देने के बाद उसके गुनहगार होने की जांच शुरू करते हैं. बुधवार की शाम हिरासत में लिए गए व्यक्ति के गुनहगार होने और न होने जैसी दोनों ही स्थितियों में मीडिया में जो तमाशा दिखाई दिया, वो शर्मनाक और बेहद बचकाना है.

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असल दोष तो सेना और सरकार का है. हम मीडिया के चैनलों पर सवार होकर कौन सी लड़ाई जीतना चाह रहे हैं. हम जिस लड़ाई को हार गए, जिस तैयारी में विफल मिले, जिन लोगों का निशाना बने, उनतक पहुंच पाने की कवायद में हम सिर उठाने की लंपट शैलियों को क्यों अपना रहे हैं. आखिर वो कौन सी जीत है जो इन क्षद्म और अधकचरे तरीकों से हम जीतना चाहते हैं. क्या सरकार इन सस्ते तरीकों से अपना मनोबल हासिल करना चाहती है.

अगर अपना सिर उठाना है तो संकल्प कीजिए कि दोबारा फिर एक और पठानकोट इस देश की ज़मीन पर कभी नहीं होने देंगे. इन थोथे और फूहड़ नाटकों से बाहर निकलना होगा, यह शर्मनाक हैं.

First published: 9 January 2016, 15:07 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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