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जनरल वी पी मलिक: 7वें वेतन आयोग की खामियों से सैन्यकर्मियों का मनोबल टूटेगा

राजीव खन्ना | Updated on: 8 July 2016, 7:30 IST
QUICK PILL
  • रक्षा कर्मचारी सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों से नाखुश हैं. आयोग ने सभी के लिए 23.5 फीसदी बढ़ोतरी की सिफारिश की थी लेकिन उसे जिस तरह से लागू किया जा रहा है, उससे रक्षा कर्मचारी खुश नहीं हैं.
  • सचिवों की विशेष समिति ने सेना के प्रतिनिधित्व वाले प्रतिनिधिमंडल की अधिकांश सिफारिशों को खारिज कर दिया. इसमें नॉन फंक्शनल अप ग्रेडेशन भी शामिल है जिसका लाभ सिविल सर्विसेज के सभी अधिकारियों को मिलता है.

केंद्र सरकार ने सातवें वेतन आयोग को मंजूरी देकर केंद्रीय सेवा के करोड़ों कर्मचारियों का दिल जीतने की कोशिश की है. लेकिन बड़ी संख्या में कर्मचारी सरकार के इस फैसले से खुश नहीं हैं.

आमतौर पर रक्षा कर्मचारी सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों से नाखुश हैं. सेना में काम करने वाले असैन्य कर्मचारियों को मिले फायदों के अंतर को लेकर वे नाराज है. 

आयोग ने सभी के लिए 23.5 फीसदी बढ़ोतरी की सिफारिश की थी लेकिन उसे जिस तरह से लागू किया जा रहा है, उससे रक्षा कर्मचारी खुश नहीं हैं. सातवें  वेतन आयोग को लागू करने से सरकार पर करीब 1.02 लाख करोड़ रुपये का सालाना बोझ पड़ेगा. 

सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि आखिर क्यों सैन्यकर्मी सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों से खुश नहीं हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि तीसरे वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद वेतन और भत्तों के साथ केंद्रीय कर्मचारियों के मुकाबले सेना के दर्जे में कटौती की गई है. आईएएस, आईपीएस और आईएफओ को हर वेतन आयोग में फायदा मिलता है. चाहे वह किसी भी रैंक के अधिकारी क्यों न हो. जबकि सेना में काम करने वाले लोगों को इसका फायदा नहीं मिलता है.

पूर्व आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ जनरल वेद प्रकाश मलिक ने कैच को बताया, 'सातवां वेतन आयोग में केंद्रीय कर्मचारियों के मुकाबले सेना के जवानों के लिए अलग और खामी युक्त नीति अपनाई गई है. सचिवों की विशेष समिति ने सेना के प्रतिनिधिमंडल की अधिकांश सिफारिशों को खारिज कर दिया. इसमें नॉन फंक्शनल अप ग्रेडेशन भी शामिल है जिसका लाभ सिविल सर्विसेज के सभी अधिकारियों को मिलता है. यह काम रक्षा मंत्रालय के जरिये हुआ. विशेषज्ञ समिति में सेना का कोई प्रतिनिधि नहीं था.'

7वें वेतन आयोग ने सभी के लिए 23.5 फीसदी बढ़ोतरी की सिफारिश की है

मलिक ने कहा, 'भत्तों को लेकर सिविल, अर्द्धसैनिक और सेना के जवानों के बीच बहुत बड़ा फर्क है. इसके अलावा और भी कई खामियां थीं जिसे विशेषज्ञ समिति ने तय नहीं करके दूसरी समिति को भेज दिया, जिसमें सिविलियन ऑफिसर्स मौजूद थे.'

इन सभी कारणों से सेना में काम कर रहे और वहां से रिटायर हो चुके कर्मचारियों के बीच भ्रम और निराशा की स्थिति पैदा हो गई. ऐसा कहा जा रहा है कि खामीयुक्त सातवें वेतन आयोग की सिफारिश को लागू करने की वजह से सर्विस क्वॉलिटी पर बेहद बुरा असर पड़ेगा.

जनरल मलिक ने कहा, 'इन खामियों की वजह से सेना के मनोबल और सर्विस क्वॉलिटी पर बुरा असर पड़ेगा. नए युवा भविष्य में सेना में शामिल होने से हिचकेंगे. सेना के दर्जे में हुए बदलाव से सैन्य और असैन्य कर्मचारियों के साथ काम करने की स्थिति में जटिलताएं आएंगी.'

सरकार ने हालांकि रक्षा कर्मचारियों के विरोध को देखते हुए एक समिति बनाने की सिफारिश की है जो इन खामियों के बारे में विचार करेगी. हालांकि सैन्यकर्मियों में इसे लेकर कई तरह की शंकाएं हैं और इसकी वजह भी है.

ऐसा बताया जा रहा है कि चौथे से लेकर छठें वेतन आयोग की जिन खामियों का जिक्र किया गया था, उसे भी कई समितियों के हवाले छोड़ दिया गया है. आज की तारीख तक उनका समाधान नहीं निकल सका है. कुछ ऐसे मामले रहे जिनका समाधान अदालत की मदद से निकला. जनरल मलिक ने कहा कि इस बात की उम्मीद कम ही है कि इन समस्याओं का जल्द ही समाधान निकल पाएगा.

सैन्य अधिकारियों का कहना है कि सातवें वेतन आयोग की सबसे बड़ी खामी समान वेतन और नॉन फंक्शनल अपग्रेडेशन को स्वीकार नहीं करना है. उन्होंने कहा कि नए वेतनमान में बेहद खामियां हैं और इससे सेना के वेतनमान पर असर पड़ेगा. 

जनरल मलिक को लगता है इससे वेतन में स्थिरता आएगी और साथ ही सैन्य कर्मचारियों के पेंशन में गिरावट आएगी. सेना को पहले से ही बड़े अधिकारियों की कमी का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में खराब वेतनमान से युवा सेना मेंं आनेे से हिचकेंगे. सेना में आने के बदले युवा अन्य सरकारी और निजी नौकरियों का रुख करेंगे. जब इस बारे में हमने जनरल मलिक से पूछा तो उनहोंने कहा, 'निश्चित तौर पर इससे क्वॉलिटी पर असर पड़ेगा. साथ ही सेना में अधिकारियों के वेतनमान में भिन्नता होगी.'

First published: 8 July 2016, 7:30 IST
 
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