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राष्ट्रीय पशु गाय: जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने गोरक्षकों के लिए गुंडागर्दी का रास्ता खोल दिया है

चारू कार्तिकेय | Updated on: 1 June 2017, 12:31 IST

जिस गति से एक अजीब तरह का पागलपन इस देश में बढ़ रहा है, वह अविश्वसनीय है. गाय के नाम पर लोगों को पीटा जाना और उनकी हत्या करना ही मानो पर्याप्त नहीं था. कानून के रखवालों ने अब उनके साथ शामिल होने का निश्चय कर लिया है.

राजस्थान हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की सिफारिश की है और साथ ही यह भी कि राज्य सरकार इसके लिए कदम उठाए, यही दर्शाता है कि हम अब एक ऐसे हास्यास्पद स्तर पर पहुंच गए हैं, जहां एक इंस्टीट्यूशन जो न्यायालय से कम नहीं है, वह नासमझ तरीके से कचरे को हमारे ऊपर फेंक रहा है.

दिलचस्प यह है कि जस्टिस महेश चन्द्र शर्मा ने अपनी यह सिफरिश सेवा से रिटायर होने से कुछ घंटे पहले ही की है. उन्होंने यह सिफारिश जयपुर में सरकार द्वारा संचालित हिंगोनिया गोशाला में व्याप्त अनियमितता और अव्यवस्था को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की.

हिंगोनिया वही गोशाला है जहां खराब रख-रखाव के कारण पिछले साल सैकड़ों गाएं मर गईं थीं, जिसके बाद काफी विवाद हुआ था. सीधे तौर पर दुखी करने वाली बात तो यह है कि जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने यह भी सिफारिश की है कि 'गोहत्या के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान' किया जाए.

बंगाल टाइगर का क्या?

न्यायाधीश ने इस बात का उल्लेख नहीं किया कि बंगाल टाइगर, जिस पर गर्व किया जाना जायज है और जिस पर वर्तमान में सभी को गर्व है, को लेकर वह क्या करना चाहेंगे. क्या न्यायमूर्ति शर्मा चाहते हैं कि टाइगर को रिप्लेस कर दिया जाए या उसे साधारण तौर पर गायों के साथ रहने के लिए समायोजित कर दिया जाए?

हो सकता है कि वह चाहते हों कि दोनों बारी-बारी से रहें और दोनों की देखभाल की जाए, लेकिन यह तो तर्कों की शुरुआत भी नहीं है जिससे यह "सिफारिश" इस विवाद को और समस्याग्रस्त बना देगी.

यह सिफारिश ऐसे समय में आई है जब गो-राजनीति का डरावना और ख़तरनाक रूप पूरे देश में चरम पर है, लोग गुस्से में हैं. ऐसा पहले कभी नहीं रहा था.

ठग और बदमाश किस्म के लोग गो-संरक्षण के बहाने पूरे देश में लोगों पर हमले कर रहे हैं और अब तो उन्हें कहीं-कहीं किताबों में भी जगह मिल रही है. पुलिस से लेकर राजनेताओं तक, प्रशासन भी इन तथाकथित गोरक्षकों का बड़ी आसानी से पक्ष ले रहा है और उनके साथ खड़ा है.

अजेंडा

एक बात और भाजपा की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार देश भर में लोगों को उनके खाने-पीने की आदतों पर हुक्म देने और उनकी आदतों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है. हाल का आदेश इसका उदाहरण है जिसके जरिए बाजारों में वध के लिए लाए जाने वाले पशुओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.

इस आदेश पर, भाजपा के समर्थकों का कहना है, यह ऑर्डर केवल पशु-तस्करी को हतोत्साहित करने के लिए है, लेकिन अगर इसे गहराई से देखा जाए तो यह भारतीय समाज को एकरूप में ढालने का संघ परिवार का अजेंडा है.

संघ परिवार चाहता है कि सभी भारतीय अपनी यह धारणा बनाएं कि गाय की पूजा की जानी चाहिए. ऐसा करते समय वे इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हैं कि कई भारतीय इस रास्ते पर चलने के लिए खुद को मुफीद नहीं मानते.

दुर्भाग्यपूर्ण सिफ़ारिश

भारतीयों की बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जिनके लिए गाय सिर्फ एक जानवर है. उन लोगों के लिए भी, जो अपनी पालतू गाय से उस समय छुटकारा पाना चाहते हैं जब वे दूध देना बन्द कर देती है. ऐसा मानने वालों में उच्च जाति के हिन्दू भी शामिल हैं, दलित, मुस्लिम या ईसाई नहीं, जिनके खिलाफ संघ परिवार तर्कहीन तरीके से घृणास्पद विचार रखता है.

न्यायमूर्ति शर्मा की सिफारिश उसी तरह की है जिस तरह से केन्द्र सरकार की पशुओं की खरीद-फरोख्त पर रोक, यह सिफारिश पूरी तरह से गाय को लेकर अन्य़ विचारों से अलग करती है जो गाय को पूजा के अलावा कुछ और मानते हैं.

देखा जाए तो अपनी यह सिफारिश करने के साथ ही न्यायाधीश केवल इस कट्टरपंथी लॉबी के हाथों में ही नहीं खेले हैं, वरन वे उनके अजेंडे के एजेंट भी बन गए हैं. हिन्दू कट्टरपंथी अब उनके शब्दों को अपनी हिंसा के बचाव में एक संवैधानिक कवच के रूप में पेश करेंगे. ऐसा सोचना खुद को भुलावे में डालना है.

संविधान में लिखित राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों में गायों की हत्या पर रोक लगाने की बात है, और यहां तक कि "आधुनिक और वैज्ञानिक लाइन पर चलते हुए कृषि और पशुपालन" पर ये निर्देशक सिद्धांत तर्कों का समर्थन करते हैं.

गायों की रखवाली करने वाले गुंडे अब इनमें से कोई भी नहीं होंगे. उनको कानून दिखाएं और वे आपको जस्टिस शर्मा का कथन दिखा देंगे.

First published: 1 June 2017, 9:51 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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