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पेन इंटरनेशनल रिपोर्ट: मोदी शासन में भारत हुआ असहिष्णु

चारू कार्तिकेय | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST
QUICK PILL
  • पिछले दिनों प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने भारत में ‘असहिष्णुता की संस्कृति’ की तीखी आलोचना की है. रिपोर्ट इस बात को प्रमुखता से स्थापित करती है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से यह स्थिति और खतरनाक हुई है.
  • रिपोर्ट के मुताबिक देश में मतभेद, चाहे राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, या सामाजिक जो भी हों, अब और ज्यादा भयावह रूप ले चुके हैं.

पिछले दिनों प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने भारत में ‘असहिष्णुता की संस्कृति’ की तीखी आलोचना की है. रिपोर्ट इस बात को प्रमुखता से स्थापित करती है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से यह स्थिति और खतरनाक हुई है. 

रिपोर्ट के मुताबिक देश में मतभेद, चाहे राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, या सामाजिक जो भी हों, अब और ज्यादा भयावह रूप ले चुके हैं.

‘फियरफुल साइलेंस: द चिल ऑन इंडियाज पब्लिक स्फियर’ शीर्षक से यह रिपोर्ट टोरंटो विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स प्रोग्राम के लेखकों की विश्वव्यापी संस्था पेन इंटरनेशनल और उसके कनाडा चैप्टर ने प्रकाशित की है.

पूर्व में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दमघोटू माहौल पर 2015 में पेन ने ‘इंपोजिंग साइलेंस: द यूज ऑफ इंडियाज लॉज टू सप्रेस फ्री स्पीच’ शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की थी. 

ताजा रिपोर्ट उसका नवीनीकरण है. रिपोर्ट के निष्कर्ष ‘सिनेमा पर सेंसरशिप, लेखकों का डर, कानून का मनमाना इस्तेमाल, और ऑनलाइन उत्पीड़न’ से जुड़े हाल के मामलों पर आधारित है. यह दो हफ्ते के फील्ड वर्क का निष्कर्ष है, जिसमें जयपुर, हुबली और दिल्ली के 17 लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकार और वकीलों के साथ बातचीत भी शामिल है.

रिपोर्ट में देश में अभिव्यक्ति का दम घोटने वाले हाल के छह मुख्य मामलों को प्रमुखता से उजागर किया गया है और उनके माध्यम से यह बताया गया है कि ऐसी आक्रामकता बढ़ रही है. 

रिपोर्ट में इस स्थिति में सुधार के लिए कुछ उपाय भी सुझाए गए हैं ताकि सार्वजनिक बहस संभव हो सके. इनसे शामिल मामले इस प्रकार हैं:

‘उड़ता पंजाब’ और सिनेमा पर सेंसर

रिपोर्ट का एक चैप्टर बॉलीवुड फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ पर है, जिस पर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के आदेश से 89 बार कैंची चलाई गई. 

चैप्टर के लेखक एवं फिल्म के सहनिर्माता विक्रमादित्य मोटवाने ने इस रिपोर्ट के लिए लिखा कि ‘पंजाब, मंत्री और पुलिस या सरकारी भ्रष्टाचार’ से जुड़े सभी संदर्भ हटाने का कहकर बोर्ड यह कह रहा है कि वे राजनीतिक फिल्म भी नहीं बना सकते. निर्माता कोर्ट गए और उन्हें सहयोग मिला. बॉम्बे हाई कोर्ट ने लगभग सभी दृश्य पूर्ववत रखे.

जेएनयू और राजद्रोह कानून

रिपोर्ट का यह मामला दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में ‘राष्ट्रीयता के नाम पर विरोध’ को कुचलने से संबंधित है. 

रिपोर्ट जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर ‘राजद्रोह’ का आरोप लगाकर उन्हें रिगरफ्तार करने की तीखी आलोचना करती है. यह अपनी बात जारी रखती है कि गिरफ्तारी और इसके बाद की हिंसा से यह मुद्दा उठता है कि भारत में राजद्रोह एक व्यापक अपराध बन गया है, जिसका इस्तेमाल ‘लोगों की किसी मुद्दा विशेष पर सोच क्या है या उसकी राष्ट्रीयता क्या है और राष्ट्रविरोधी क्या है’ को विकृत करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है.

कश्मीर डॉक्युमेंट्री और राजद्रोह

राजद्रोह कानून के खिलाफ मामले को मजबूत करने वाला अन्य संदर्भ फिल्म निर्माता पंकज बुटालिया की कश्मीर पर डॉक्युमेंटरी- ‘टैक्सचर्स ऑफ लॉस’ है. 

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने डॉक्युमेंट्री के कुछ हिस्से को राष्ट्रहित के खिलाफ माना और उसे हटाने के आदेश दिए. एक बार फिर कोर्ट संकटमोचक बना और दिल्ली हाई कोर्ट ने बुटालिया के पक्ष में फैसला दिया

रिपोर्ट में भयावह विवरण का खुलासा है कि किस तरह सरकार 2002 के गुजरात दंगों पर किताब लिख रही एक स्वतंत्र पत्रकार रेवती लॉल पर चुपचाप निशाना साध रही है. 

लॉल लिखती हैं, ‘ट्रॉलर की सेना मुझे ट्विटर और फेसबुक पर घेर लेती है.’ ‘गुजरात का खुफिया ब्यूरो मेरी निगरानी कर रहा है.' और ‘मुझे अजीब आवाजों में अनजाने नंबरों से कॉल आ रहे थे, जो मेरा परिचय पूछ रहे थे.’

उन्होंने इस बात का भी दावा किया कि एक अंतरराष्ट्रीय गैरसरकारी संगठन ने ‘वर्तमान प्रशासन द्वारा भय का वातावरण पैदा करने के कारण’ उनके प्रोजेक्ट को राशि देना बंद कर दिया है. इसके अलावा क्राउड-फंडिंग वेबसाइट विशबेरी, जिसका इस्तेमाल वे सहायाता राशि पाने के लिए कर रही थीं, ने शिकायत की कि ‘एक सरकार समर्थक ऐकोलाइट उसे घुमा रहा था. और उन्हें ‘साइट के समर्थकों में से एक शीर्ष उद्यमी से भी कॉल आया, कि वे इस अभियान को प्राथमिकता से क्यों विज्ञापित कर रहे हैं, और इसे कम महत्व दिया जाए.’

रिपोर्ट के मुताबिक देश में राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक मतभेद में बढ़ोतरी हुई है.

रिपोर्ट में उल्लेख है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सूचना एवं तकनीक अधिनियन के सख्त सेक्शन 66ए को निष्फल करने के बाद संकेत हैं कि ‘इस नियम को नए रूप में फिर से शुरू किया जा सकता है.’ पेन की रिपोर्ट के मुताबिक गृह मंत्रालय पर संसद की स्थाई समिति की दिनांक 7 दिसंबर 2015 की रिपोर्ट ने अनुशंसा की है कि हटाए गए सेक्शन की जगह हेट स्पीच नियम लाया जाए.’

ऑनलाइन उत्पीड़न और पुलिस की अनदेखी

रिपोर्ट में उल्लेख है कि ‘ऑनलाइन उत्पीड़न विश्वव्यापी घटना है पर यह भारत में खासतौर पर बेहद आक्रामक रूप ले चुका है. यहां ऑनलाइन धमकी की शिकायतें कानून प्रशासन द्वारा अक्सर अनदेखी कर दी जाती हैं.’ परिणामत: ‘ऑनलाइन भीड़’ लोगों को चुप रहने के लिए बाध्य करती है. 

रिपोर्ट में आगे कहा गया, ‘इसका भी प्रमाण है कि इस उत्पीड़न की माफी उन लोगों द्वारा दी जाती है, जो सरकार में हैं’, और जुलाई 2015 में ‘ऑनलाइन उत्पीड़न के आरोपी अति राष्ट्रीयतावादी सोशल मीडिया ऐक्टिविस्टों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के बाद विवाद और बढ़ा.’

मीडिया की स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण

पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम, जिन्हें छतीसगढ़ में पुलिस और सरकारी समर्थन वाली सामाजिक एकता मंच के सदस्यों ने उत्पीड़ित किया था, रिपोर्ट के लिए लिखती हैं, ‘लोगों की आवाज को चुप कर दिया जाता है और स्थानीय रिपोर्टर्स को या तो खरीद लिया जाता है या फिर उन्हें पुलिस के जरिए धमकी दी जाती है.’ 

वे आगे कहती हैं, ‘जो रिपोर्टर्स ऑफिशियल वर्ज़न के साथ मतभेद रखते हैं उन्हें माओवादी समर्थक कहा जाता है’ और फिर उनके खिलाफ नफरत का अभियान छेड़ा जाता है. उन्हें अपना रवैया सुधारने के लिए धमकियों से आतंकित किया जाता है.

यदि धमकी का असर नहीं होता है तो सीधे हमले किए जा सकते हैं. मालिनी यह भी कहती हैं कि सरकारी मशीनरी कोई और तरीका अपना कर उसमें छिपकर या खुलकर शामिल हो जाएगी.

पेन इंटरनेशनल की रिपोर्ट में उपन्यासकार पेरूमल मुरुगन के मामले का भी जिक्र किया गया है.

रिपोर्ट में उपन्यासकार पेरूमल मुरुगन के मामले का भी जिक्र है. उनका लेखन कुछ अतिवादियों की विचारधारा के अनुकूल नहीं बताने और सेंसर की ठोस मुहिम चलाने के बाद पेरुमल ने लेखक के तौर पर अपनी ‘मौत’ की घोषणा की थी.

त्रासदी यह थी कि इस विरोध को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने और मजबूत बनाया, और इसमें पुलिस और सरकारी प्रशासन का भी सहयोग रहा. हाल में मद्रास हाईकोर्ट ने मुरुगन के सम्मान को बहाल किया और उनके विरुद्ध लगाए सारे आरोप खारिज कर दिए गए.

रिपोर्ट में न्यायपालिका की इनमें से कई मामलों पर पक्ष में निर्णय देने के लिए उम्मीद की किरण बताकर तारीफ की गई है. अपनी पांच मुख्य अनुशंसाओं में रिपोर्ट कुछ खास कानून को हटाने, पुलिस की फोकस्ड ट्रेनिंग और सार्वजनिक अभियान शुरू करने की मांग करती है.

First published: 22 September 2016, 7:45 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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