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दिल्ली की जनता ने सरकार चुनी है, नजीब जंग को नहीं

आशुतोष | Updated on: 13 August 2016, 9:05 IST
(कैच)
QUICK PILL
  • दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में 9 याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए कहा कि दिल्ली के उपराज्यपाल ही वहां के प्रशासक हैं.
  • दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच अधिकारों को लेकर लंबे अरसे से लड़ाई चल रही है. इसी हफ्ते एलजी ने केजरीवाल सरकार के डेढ़ साल के फैसलों की फाइल मंगाई है.

मंत्रिपरिषद के अधिकारों और उप राज्यपाल नजीब जंग को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले ने लोकतंत्र को ताक पर रखते हुए एक प्रकार से उप राज्यपाल नजीब जंग को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का बेताज बादशाह बना दिया है. 

जंग ने ऐसा मान लिया है, जैसे कि वे कोई मध्यकाल के शासक हों, जिसके लिए लोकतांत्रिक ढंग से चुन कर आई विधानसभा और मंत्रिपरिषद कोई मायने नहीं रखती है.

उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि दिल्ली विधानसभा को भंग कर दिया जाना चाहिए. क्या इससे ज्यादा खतरनाक कोई स्थिति हो सकती है कि एक गैर निर्वाचित व्यक्ति चुनी हुई विधानसभा को भंग करने की मंशा जताकर जनता की भावना का अनादर करें.

संविधान क्या कहता है?

सब जानते हैं कि दिल्ली एक पूर्ण राज्य नहीं है. इसलिए इसके पास दूसरे राज्यों जितने अधिकार नहीं हैं. परन्तु 69वें संविधान संशोधन के अनुसार एक विधानसभा बना दी गई. चुने हुए जनप्रतिनिधियों में से कुछ लोगों को लेकर मंत्रिमंडल का गठन कर दिया जाता है और हर पांच साल बाद एक नई सरकार चुन ली जाती है.

यह भी सब जानते हैं कि एक विशिष्ट परिस्थिति में कानून व्यवस्था, पुलिस और भूमि संबंधी अधिकार उप राज्यपाल में निहित होते हैं. व्यापारिक लेन-देन अधिनियम 239एए के अनुसार, मंत्रिपरिषद और उपराज्यपाल के बीच किसी भी तरह के मतभेद होने पर मामला राष्ट्रपति के विचारार्थ भेज दिया जाता है और उनका आदेश अंतिम माना जाता है.

हाईकोर्ट के फैसले ने उप राज्यपाल नजीब जंग को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का बेताज बादशाह बना दिया है.

संविधान के अनुसार उक्त तीन क्षेत्रों के अलावा अन्य मामलों में विधानसभा सर्वोच्च होगी और उप राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के मुताबिक फैसले लेंगे. परन्तु दिल्ली उच्च न्यायालय के हालिया फैसले से यह प्रतिध्वनित होता है कि उप राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं हैं.

मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन उप राज्यपाल बहुत उतावले हो रहे हैं. उप राज्यपाल की अधीरता का कारण राजनीतिक है, न कि संवैधानिक मानकों के अनुरूप.

संविधान निर्माताओं ने भले ही ऐसी स्थितियों का सामना नहीं किया हो, लेकिन उन्हें संभवतः ऐसी स्थितियों का पूर्वानुमान हो गया था.

जब यह बहस चल रही थी कि क्या एक राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति होनी चाहिए या निर्वाचित होना चाहिए तो उन्होंने नियुक्ति चुना. इसका कारण यह था कि दो निर्वाचित शक्तियां एक दूसरे से टकराव की स्थिति में होंगी और प्रशासन बाधित होगा.

यह तय किया गया कि वास्तविक शक्ति लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए नेता यानी कि मुख्यमंत्री में निहित होंगी और राज्यपाल मुख्यत्रमंत्री एवं उसके मंत्रिमंडल सहयोगियों की सहायता और सलाह पर काम करेंगे.

यह व्यवस्था इसलिए की गई ताकि न केवल दो संवैधानिक शक्तियों में टकराव की संभावना को टाला जा सके, बल्कि लोकतंत्र की सच्ची भावना भी परिलक्षित हो. लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है और वे चुनावों में अपनी इच्छानुसार, स्वयं पर शासन करने वाले जनप्रतिनिधि चुनते हैं.

मंत्रिपरिषद के सदस्य विधानसभा के माध्यम से जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं. एक गैर निर्वाचित राज्यपाल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होता. वह चुनाव नहीं लड़ता/लड़ती. इसलिए वे जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं हैं. इसलिए लोकतंत्र में उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे राज्य के संवैधानिक प्रमुख होने के बजाय चुने हुए जन प्रतिनिधियों पर हुकुम चलाएंगे.

मंत्रिपरिषद की जवाबदेही है, जबकि एक गैर निर्वाचित राज्यपाल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होता.

संवैधानिक सभा ने राज्यपाल की भूमिका तय कर दी थी. इसके अनुसार ‘जब सारी कार्यकारी शक्तियां मंत्रिपरिषद में निहित हों और कोई अन्य व्यक्ति आकर यह दावा करे कि उसे जनता का समर्थन प्राप्त है, इसलिए वह राज्य के शासन में हस्तक्षेप कर सकता है, तो यह वाकई में लोकतंत्र की हार होगी.

यह दलील भी दी जा सकती है कि दिल्ली एक संपूर्ण राज्य नहीं हैं और उप राज्यपाल कोई रबर स्टैम्प नहीं हैं, लेकिन दिल्ली, चंडीगढ़ की तरह केंद्र शासित प्रदेश नहीं है. इसकी अपनी विधानसभा है, जिसके लिए नियमित रूप से चुनाव होते हैं और मुख्यमंत्री नियुक्त नहीं किया जाता बल्कि जनता द्वारा चुना जाता है.

जिस असल वजह से चुनाव करवाए जाते हैं, उसका मतलब यह है कि इसे केंद्र सरकार का लघु ब्यूरो नहीं माना जा सकता और न ही उप राज्यपाल यह मान सकता है कि उसके पास निर्वाचित प्रतिनिधि जैसी शक्तियां हैं. उप राज्यपाल की भूमिका से इतर दिल्ली में संघीय विधानसभा पर बहस लाजमी है.

संघीय विधानसभा का तर्क है कि, "उप राज्यपाल को और भी अधिक अलग होना चाहिए, जो स्वाभाविक तौर पर सरकार की नतियां लागू करवाने में सहयोग करे और जनता को यह दिखाए कि वह राजनीति से परे है."

क्या हम कह सकते हैं कि दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग ऐसे ही हैं? बिल्कुल नहीं. न तो वे राजनीति से दूर रहते हैं और न ही राजनीति से ऊपर उठ कर कोई काम करते हैं. वह तो पहले ही दिन से विरोधी ही रहे हैं.

केंद्र के इशारों पर काम कर रहे हैं

2015 के विधानसभा चुनाव के बाद तो मानो वे पूरी तरह से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं. इसीलिए आप सरकार द्वारा दिए गए सारे आदेश निरर्थक कर दिए गए. पिछले 40 सालों से जो भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो दिल्ली सरकार के पास था, वह रातों रात छीन लिया गया, वह भी अर्द्धसैनिक बलों की मदद से. इसके अलावा नौकरशाहों की नियुक्ति और तबादले के लिए उत्तरदायी ‘सेवा विभाग’ को आदेश दिए गए कि वह दिल्ली सरकार के बजाय उप राज्यपाल को रिपोर्ट करें.

उन्होंने मुख्यमंत्री को अपनी पसंद का मुख्य सचिव भी नहीं नियुक्त करने दिया. दिल्ली विधानसभा ने 19 विधेयक पारित किए, जिन्हें उप राज्यपाल के कार्यालय ने छह माह से एक साल तक के लिए अटका दिया. चाहे यह लोकपाल विधेयक हो, विधायकों का वेतन विधेयक हो या लाभ के पद का विधेयक. साथ ही उन्होंने आप सरकार को सरकारी स्कूलों में 20 हजार शिक्षकों की नियुक्ति करने से भी रोक दिया.

यह शायद कोई संयोग नहीं है कि वे पूर्व कांग्रेस सरकार द्वारा नियुक्त होने के बावजूद अब तक पद पर बने हुए हैं. न तो उन्होंने इस्तीफा दिया और न ही केंद्र सरकार ने उन्हें बर्खास्त किया. बाकी अन्य राज्यपालों को मोदी सरकार के दबाव में पद छोड़ना पड़ा था.

2015 के विधानसभा चुनाव के बाद वे पूरी तरह से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं.

मैं उनके अतीत की बात नहीं कर रहा, जब वे आईएएस थे और पन्ना-मुक्त पेट्रोलियम घोटाले में फंसने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. इस मामले की जांच सीबीआई कर रही थी, मेरा इस बात से भी कोई सरोकार नहीं है कि वे रिलायंस के लिए काम कर चुके हैं, लेकिन यह जरूर चिंता का विषय है कि उनके कार्यकाल में रहे राष्ट्रपति शासन के दौरान और उसके बाद जब एसीबी को उन्होंने अपने अधीन कर लिया.

उसके बाद से केजी बेसिन घोटाले में रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी के खिलाफ जांच एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी. इसके अलावा डीडीसीए घोटाले में भी जांच अटक हुई है, जिसमें वित्त मंत्री अरुण जेटली भी जांच के दायरे में हैं.

वे जनता की इच्छा के विपरीत काम करके ठीक नहीं कर रहे हैं. भले ही वे दिल्ली के उप राज्यपाल बने रहने में कामयाब रहें, लेकिन इतिहास में वे किस रूप में याद किए जाएंगे? दिल्ली को किसी करियरवादी की जरूरत नहीं है, बल्कि संविधान के सच्चे प्रणेता की जरूरत है जो निर्वाचित विधानसभा का मतलब समझते हों और उसका सम्मान करते हों.

First published: 13 August 2016, 9:05 IST
 
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