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2016 विशेष: भांति-भांति के हैंगओवर और कुछ उपाय

पाणिनि आनंद | Updated on: 2 January 2016, 7:56 IST
QUICK PILL

नया साल शानदार, जानदार और जबर्दस्त हो. जश्न तो बहुत मनाया सबने लिहाजा हैंगओवर भी लोगों को तगड़ा वाला लगा है. कुछ ने शराब पी, कुछ के निराले नशे हैं. इस नशे की अपच से कई लोग अचकचाए हुए हैं. कुछ बड़बड़ा रहे हैं, कुछ रुक ही नहीं रहे, कुछ हिल नहीं रहे हैं तो कुछ किसी को सुन नहीं रहे.

किसी को नई ताकत का हैंगओवर है. किसी को जाती सत्ता का. किसी का हैंगओवर अधकचरेपन का है तो किसी को चिर विपक्षी का. किसी को अहंकार का हैंगओवर है. हैंगओवर किसी भी चीज का हो सकता है, सत्ता का, शक्ति का, पहचान का, खानदान का, पहनावे का, तकनीक का और शराब तो खैर बदनाम ही है. तो यहां पेश है कुछ अलहदा किस्म के हैंगओवर और उनसे उबरने के कुछ देसी नुस्खे.

शराब का हैंगओवरः आप और हम

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तो पहले बात खुद से. वैसे भी बड़े-बुजुर्गों ने कहा है जो खुद की आलोचना कर सकता है वही दूसरों की आलोचना कर सकता है. पहला इलाज शराबियों के लिए. अव्वल तो संभल कर पीएं, संभल के न पीनी हो तो दबा के पानी पीएं. डिहाइड्रेशन से बचे रहेंगे तो हैंगओवर खुद ही दूर रहेगा. जब ज्यादा हो ही गई है तो खूब सारा पानी पीने में क्या हर्ज है. साथ में पपीते और अमरूद का सेवन भी करें. फायदेमंद केला भी हो सकता है.

दूध वाली चाय से परहेज करें, दालचीनी और बड़ी इलाइची डालकर उबाले गए पानी की हल्की चाय पियें. अम्लीय प्रवृत्ति वाले फलों से बचें. मसालेदार और भारी खाने को ना कहें. वातकारक सब्जियों से दूर ही रहें. कृपा बरसेगी...

अब असली हैंगओवर की समस्या पर आते हैं.

बिहार हैंगओवरः नीतीश और लालू

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विधानसभा चुनाव में जीत का हैंगओवर इतना तगड़ा है कि अभी तक नीतीश कुमार सेलिब्रेशन हॉल से बाहर देख ही नहीं पा रहे हैं. बोल कम रहे हैं, सोच ज़्यादा. क्या सोच रहे हैं. शायद 2019 दिमाग को मथे हुए है. लेकिन उससे पहले अपना आंगन ठीक करने की चुनौती आन पड़ी है. दूसरी ओर उनके साथी लालूजी हैं.

दोनों बेटों को मंत्री बनाकर बमबम मोड में हैं. पार्टी पर खुद काबिज हैं. बेटी मीसा और पत्नी को राज्यसभा भेजने वाले हैं. लोहियावादियों का परिवारवादी हैंगओवर बहुत खतरनाक है. इस हैंगओवर का कोई स्थायी ईलाज उपलबध नहीं है.

प्रचार हैंगओवरः नरेंद्र मोदी

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मोदीजी का हैंगओवर गंभीर है. डेढ़ साल से ज्यादा हो चुके हैं पर उनका प्रचार हैंगओवर उतरा नहीं है. देश चिंतित है. देश में रैलियां कम हुई तो प्रधानमंत्री विदेश में मजमा लगाने लगे. राज्य इकाई के अध्यक्षों का काम भी खुद ही करने लगे हैं, विधानसभा चुनावों का प्रचार करके. बिहार के चुनावों पर नजर डालिए- 26 रैलियां. फजीहत हर तरफ हो रही है. बाहर भी, भीतर भी.

अगले कुछ महीनों में पांच राज्यों का चुनाव है. वहां भाजपा की नाव मंझधार में है. अगर यह हैंगओवर जारी रहा तो लेने के देने पड़ जाएंगे. तमाम उपचुनाव, दिल्ली, बिहार यह संकेत दे रहे हैं कि मोदी-मोदी लहर उतर चुकी है, अब प्रधानमंत्री को भी जमीन पर उतर आना चाहिए. हमेशा 2014 मोड में नहीं रह सकते. संसद को समय देकर, उसे चलाने की कोशिश करके इस हैंगओवर से पार पाया जा सकता है. ये बीच-बीच में पद की गरिमा-पद की गरिमा कौन चिल्ला रहा है?

परिवार हैंगओवरः राहुल गांधी

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बाबा 56 दिन की कथित विपश्यना करके लौटे तो तेवर देखते बनते थे. पर जैसे-जैसे विपश्यना का असर उतरा तेवर फिर से ढीले पड़ने लगे. ऊपर से कमबख्त नेशनल हेरल्ड कूद पड़ा. जब ऐसा लग रहा था कि वे पूरी पार्टी का कायाकल्प कर देंगे तभी ये सब हो गया. क्या करें?

कहने वाले कहते हैं अभी तक अपने दृष्टिकोण को लेकर वो न तो पार्टी कार्यकर्ताओं को संतुष्ट कर सके हैं और न ही देश के लोगों को. बात-बात पर परिवार के नामों की ही दुहाई देते हैं. नेहरू, इंदिरा, राजीव के सहारे ही राजनीति का पैडल मार रहे हैं. परिवारवाद का आरोप पहले से ही भारी है. इसलिए पुनरावृत्ति के हैंगओवर से बाहर निकल अपनी छाप छोड़ने की कोशिश करें, शायद अच्छे दिन आ जाएं.

अखाड़े का हैंगओवरः मुलायम सिंह यादव

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नेता जी तबीयत से पहलवान हैं. उम्र हुई तो दंडबैठक आदि कम हो गई लेकिन मालिश... बाखुदा बेनागा जारी है. कभी-कभी ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री न बन पाने की तिलमिलाहट अंदर कचोट रही है. तिलमिलाहट में पहलवानी हावी हो जाती है और जो सामने आता है उसी को पटक देते हैं. सामने वाला चाहे बेटा हो या भाई. प्रदेश में उनकी ही पार्टी की सरकार है और उनका ही बेटा मुख्यमंत्री लेकिन जब तब सार्वजनिक मंचों से नसीहत का जमालगोटा दे देते हैं फिर अगले कुछ दिनों तक अखिलेश सरकार डैमेज कंट्रोल के जुलाब से बेहाल रहती है.

नेता जी फिर से तिलमिलाए दिख रहे हैं. प्रधानमंत्री पद तो बाद की बात है, फिलहाल उन्हें अपनी मुट्ठी से रेत की तरह फिलती जा रही उत्तर प्रदेश की सत्ता को बचाने का प्रयत्न शुरू कर देना चाहिए. क्या पता उम्मीदों की साइकिल चल निकले.

अज्ञात हैंगओवरः मायावती

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प्यार से जमाना इन्हें बहनजी कहता है. प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री हैं लेकिन राजनीति में होने के बावजूद किस अज्ञातवास में रहती हैं खुद इनकी पार्टी के भी ज्यादातर लोगों को अंदाजा नहीं रहता. बहनजी का हैंगओवर किसी को समझ नहीं आ रहा. न वो किसी से मिलती हैं, न किसी से बात करती हैं. न लोगों के बीच जा रही हैं, न जनसभाएं कर रही हैं. लोकसभा चुनाव में बोहनी भी नहीं हुई तब से ज्यादा ही हैंगओवर हो गया है. बहन जी के हैंगओवर का इलाज बाकियों से काफी आसान है. बस उन्हें अपने रहस्य के खोल से निकल कर आम लोगों से घुलना-मिलना शुरू कर देना चाहिए.

बदजुबान हैंगओवरः अरविंद केजरीवाल

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दिल्ली के मुख्यमंत्री का एक ऑडियो आया था जिसमें वो अपने सहयोगी प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के लिए 'सा...' और पिछवाड़े पर लात जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे. तब लोगों को उनकी दिव्यवाणी की एक झलक मिली थी. फिर हाल ही में जब उनके दफ्तर पर सीबीआई ने छापा मारा तब उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री को मानसिक बीमार घोषित कर दिया. राजनीति के गलियारे में लोग उन्हें चिर विपक्षी का तमगा देते हैं भले ही वे सरकार में हैं.

कोई उन्हें छेड़े उससे पहले वे बर्र के छत्ते की मानिंद बिफर जाते हैं, ये भारतीय राजनीति में मधुमक्खी का छत्ता हैं. जब सत्ता नहीं थी, तब सत्ता के लिए लड़े. अब सत्ता में हैं तो और ताकत के लिए लड़ रहे हैं. प्रधानमंत्री बने तो शायद अमरीका के राष्ट्रपति पद की दावेदारी कर दें. जानकारों के मुताबिक उनके हैंगओवर का इलाज फिलहाल वे स्वयं है.

मनुवादी या अंबेडकरवादी हैंगओवरः मोहन भागवत

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संघ के हैंगओवर में थोड़ा घालमेल हो गया है. ब्राह्मणवाद इसकी सांस रही है. मोहन भागवत जी के इर्द-गिर्द का अधिकतर कुनबा चितपावनों का है बाकियों के लिए जगह कम है. लेकिन अचानक से बीते एकाध साल में भागवतजी ने इसमें अंबेडकर का छौंका मारना शुरू कर दिया था. तब लोगों बड़ा आश्चर्य हुआ. लेकिन जल्द ही भागवतजी ने मनुवादी हैंगओवर में हो रही दलित मिलावट को साफ कर दिया. उन्होंने पांन्चजन्य को दिए साक्षात्कार में आरक्षण नीति की समीक्षा की बात कही. संघ देवरस की सोशल इंजीनियरिंग और मनुवादी विचार, दोनों को साथ साथ चलाना चाह रहा है. यह संभव नहीं है.

बीफ़ हैंगओवरः महेश शर्मा एंड पार्टी

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वो केंद्रीय संस्कृति मंत्री हैं लेकिन उनकी भाषा और राजनीति में जबर्दस्त कुसंस्कृति हैं. महेश शर्मा दादरी से लेकर गौरक्षा तक लगातार ऐसा कर रहे हैं जिससे तनाव बढ़ा है और सद्भाव ध्वस्त हुआ है. इनकी टेबल पर इनके कुछ और साथी भी हैं. साक्षी महाराज, साध्वी प्राची और निरंजन ज्योति, योगी आदित्यनाथ, मुख्तार अब्बास नकवी और गिरिराज सिंह. बिहार चुनाव के दौरान तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और नरेंद्र मोदी भी इसी हैंगओवर में नजर आए थे. अभी साढ़े तीन साल बाकी हैं, जितनी जल्दी हिंदुत्व के हैंगओवर से बाहर निकलेंगे, खुद के लिए और देश के लिए उतना ही अच्छा रहेगा.

पाकिस्तान हैंगओवरः मणिशंकर अय्यर

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वो काफी पढ़े लिखे ब्यूरोक्रेट कम राजनेता हैं. देश और दुनिया के कितने ही विषयों पर कमाल की समझ रखते है. राजीव गांधी के साथ पंचायती राज के मुद्दे पर काफी बेहतरीन काम कर चुके हैं. उनकी भाषा और उनका कामकाज हमशा गरीबों और वंचितों के लिए समर्पित दिखता है. लेकिन एक शब्द पर आकर वो अटक जाते हैं- पाकिस्तान.

मणि का पाकिस्तान हैंगओवर बहुत भारी है. इस हैंगओवर के कारण कई बार आम जनता, विपक्षी पार्टियों के साथ-साथ उनकी अपनी पार्टी कांग्रेस भी उनका साथ छोड़ देती है. यह ऐसा ही है कि कोई बड़ा शायर अपनी शायरी से ज़्यादा अपनी शराबनोशी की वजह से चर्चा में रहे. ''कांग्रेस का हाथ, मणि के साथ'' अक्सर नहीं रहता.

फ्री-बेसिक्स हैंगओवरः मार्क जुकरबर्ग

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उन्होंने अमरीका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मां की कहानी सुनी और फिर इस मिट्टी तक आ पहुंचे. अब वो चाहते हैं कि इंटरनेट के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक, भारत में उनकी शर्तों पर इंटरनेट चले. वो नीतियों का निर्धारण करें और इंटरनेट की स्वतंत्रता का संविधान उनकी इच्छा और सोच के अनुरूप बनाया जाए. जुकरबर्ग साहेब, आप काफी सफल और संभावनाओं वाले व्यक्ति हैं. लेकिन अब लगता है कि आपकी सफलता का हैंगओवर आपके मानस को नियंत्रित करने लगा है. इससे निकल आइए, अच्छा होगा.

First published: 2 January 2016, 7:56 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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