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उत्तराखंडः क्या यहां भी कांग्रेस की गाड़ी में प्रशांत किशोर ही डालेंगे ईंधन?

आकाश बिष्ट | Updated on: 23 September 2016, 7:48 IST
QUICK PILL
  • पार्टी के वरिष्ठ नेता किशोर की सेवाएं उत्तराखण्ड के लिए लेने के पक्ष में हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए माहौल तैयार किया है. 
  • उत्तराखण्ड की राजनीतिक गणित गढ़वाल-कुमाऊं और ब्राह्मण- ठाकुर वोटों के आसपास घूमती है, जिससे किशोर के लिए पार्टी के चुनाव अभियान का संचालन आसान हो जाता है. 

चुनावों की ओर बढ़ रहे उत्तरप्रदेश और पंजाब में कांग्रेस के प्रचार अभियान की कमान संभालने वाले प्रशांत किशोर उत्तराखण्ड में भी इस महान पुरानी पार्टी के लिए ऐसी ही जिम्मेदारी सम्भाल सकते हैं. इस पर्वतीय राज्य में भी मतदान उसी समय हो सकता है जब 2017 में ये दो बड़े राज्य चुनावों को सामना करेंगे.

कांग्रेस की प्रदेश इकाई के सूत्रों ने ‘कैच’ को बताया कि पार्टी के वरिष्ठ नेता किशोर की सेवाएं उत्तराखण्ड के लिए लेने के पक्ष में हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए माहौल तैयार किया है. अभी हाल तक कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में दौड़ में ही शामिल नहीं समझा जा रहा था लेकिन किशोर के आक्रामक अभियान से लगता है कि पार्टी ने एक तरह से राज्य में वापसी कर ली है.

प्रदेश इकाई के सूत्रों के मुताबिक पार्टी के वरिष्ठ नेता किशोर की सेवाएं उत्तराखण्ड के लिए लेने के पक्ष में हैं

हालांकि, उत्तराखण्ड की राजनीति पड़ोसी उत्तर प्रदेश के मुकाबले कम जटिल है. यहां की राजनीतिक गणित गढ़वाल-कुमाऊं और ब्राह्मण- ठाकुर वोटों के आसपास घूमती है, जिससे किशोर के लिए पार्टी के चुनाव अभियान का संचालन आसान हो जाता है. फिर भी, राज्य में कांग्रेस सरकार की पुनः वापसी के लिए अभी कई मुद्दों को सुलझाया जाना बाकी है.

चुनावों में कुछ ही महीने शेष हैं और हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को सत्ता विरोधी भावनाओं के साथ ही भ्रष्टाचार के आरोपों से भी जूझना पड़ रहा है जिससे पार्टी की लोकप्रियता में कमी आ रही है. नाम नहीं ज़ाहिर करने की शर्त पर एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया कि किशोर के दखल से चुनावों से पहले पार्टी  की छवि सकारात्मक बनाने में मदद मिल सकती है.

पार्टी कार्यकर्ताओं में बढ़ता असंतोष किशोर के सामने दूसरी मुख्य चुनौती है. केन्द्रीय नेतृत्व के लगातार हस्तक्षेप के बावजूद इस असंतोष पर काबू नहीं पाया जा सका है.

इसके अलावा कई वरिष्ठ नेता और प्रमुख चेहरे पार्टी से विद्रोह करके भाजपा में शामिल हो गए हैं. इससे उन निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस उम्मीदवारों की संभावनाओं को नुकसान पहुंच सकता है जहां का प्रतिनिधित्व कभी ये नेता कर चुके हैं.

इसके अलावा, गढ़वाल क्षेत्र रावत से नाराज है, क्योंकि वर्तमान सरकार में यहां के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। नतीजा यह है कि  मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय एक दूसरे से उलझ चुके हैं और उपाध्याय कई अवसरों पर सार्वजनिक तौर पर मुख्यमंत्री की आलोचना कर चुके हैं.

इससे चुनावों से पहले एकजुट दिखाई देने के पार्टी के प्रयासों को नुकसान पहुंचा है. किशोर को देखना होगा कि चुनाव अभियान के दौरान ऐसी भावनाओं से पार्टी को नुकसान नहीं पहुंचे.

हरीश रावत की लोकप्रियता घटी?

पार्टी में विद्रोह के बाद खासकर रावत के पक्ष में जो सहानुभूति लहर पैदा हुई थी, वह धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है. कांग्रेस भी अब चुनावों में एकतरफा नतीजों के प्रति आश्वस्त नहीं है. 30 मार्च को कांग्रेस के 9 विधायकों ने विद्रोह करके भाजपा से हाथ मिला लिया था और मजबूर होकर केन्द्र सरकार को अनुच्छेद 356 का सहारा लेना पड़ा था. सर्वोच्च न्यायालाय के हस्तक्षेप के बाद ही राज्य में रावत सरकार की बहाली हो पाई थी.

उस समय राज्य में कांग्रेस और रावत के प्रति सहानुभूति का भाव देखा जा रहा था लेकिन पिछले कुछ महीनों में समीकरण बदल गए हैं और रावत की लोकप्रियता में काफी कमी आई है. मास्टर रणनीतिकार के लिए यह भी एक अलग चुनौती हो सकती है.

इसी बीच किशोर के निकटवर्ती सूत्रों ने इस मुद्दे पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार किया है और कहा है कि उन्हें इस घटनाक्रम की कोई जानकारी नहीं है.

उधर एक अन्य घटनाक्रम के तहत वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमलनाथ शीघ्र ही अम्बिका सोनी की जगह राज्य प्रभारी का स्थान लेने वाले हैं. सोनी ने उत्तराखण्ड राज्य प्रभारी का पद छोड़ने की पेशकश की है ताकि वे पंजाब में चुनाव अभियान समिति की प्रमुख बनी रह सकें. सूत्रों ने ‘कैच’ को बताया था कि किशोर ने ही सोनी को पंजाब से हटाने का सुझाव दिया था क्योंकि वे उत्तराखण्ड में चुनाव अभियान की देखरेख कर रहीं हैं और वहां भी लगभग उसी समय चुनाव होने वाले हैं.

First published: 23 September 2016, 7:48 IST
 
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