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एक बैंकर का क़ुबूलनामा: तकलीफ़ होती है जब लोग खाली हाथ लौटते हैं

श्रिया मोहन | Updated on: 21 November 2016, 7:32 IST
(एएफ़पी)
QUICK PILL
  • एक बैंकर कहते हैं कि मानो हम जल्लाद बन गए हैं और उस गलती के लिए खुद को अपराधी महसूस करने लगते हैं, जो हमने की ही नहीं. 
  • उन्होंने बताया कि वह एक ज़रुरतमंद औरत को रुपए नहीं दे पाए थे. अगले दिन वह आईं नहीं. बैंकर सोच में डूबे हैं कि पता नहीं उनके बच्चों को खाना मिला या नहीं.
  • उन्होंने कहा कि हमारे लिए सबसे मुश्किल घड़ी यह है कि लोगों की गरीबी और जायज़ जरूरत को देखते हुए भी उन्हें हमें खाली लौटाना पड़ता है. कभी-कभी रात में चेहरा आंखों के आगे घूमने लगता है.

नोएडा में एक बड़े प्राइवेट बैंक की शाखा और शनिवार डेढ़ बजे की दोपहर. 'बैंक में कैश नहीं है', लंबी कतार में घंटों से खड़े ग्राहक इस ऐलान से गुस्से में हैं. 8 नवंबर की रात नोटबंदी की घोषणा के बाद से कमोबेश सभी बैंकों का यही हाल है. बैंक के स्टाफ़ को अमीर-गरीब दोनों तरह के ग्राहकों का गुस्सा और गालियां झेलनी पड़ रही हैं. 11 दिन गुज़र जाने के बावजूद बैंकों का हाल वही है, जो पहले दिन था. कैश नहीं मिलने से लोगों की मुश्किलें पहाड़ हो गई हैं.

बैंक के बाहर दो लाइनें हैं. एक सीनियर सिटीज़न के लिए और दूसरी में हर कोई खड़ा है, महिलाएं भी. सभी लोग कैशियर पर चीख रहे हैं. बैंक के पास कैश मौजूद है और लाइन में लगे लोगों को दिया जा सकता है. भला ऐसा कैसे हो सकता है कि महज़ डेढ़ घंटे में 15 लाख रुपए ख़त्म हो जाएं जबकि कैश दोपहर 12 बजे ही आया था. 

अरुण कुमार इस बैंक में पिछले 4 सालों से मैनेजर हैं. उनकी केबिन की दीवार पर ढेर सारे अवॉर्ड और प्रशंसा-पत्र लगे हैं. पर 9 नवंबर के बाद से उन्हें अपने काम के लिए एक अलग कौशल की जरूरत पड़ने लगी है, जो उन्हें 'आमजन का मैनेजर' बना सके. 

वह कहते हैं, 'रोज़ सुबह जब तैयार होता हूं, ज़ेहन में सबसे पहले यही ख्याल आता है कि लाइन में खड़े लोगों को किस तरह समझाया जाए. मैं आज क्या करूं कि लोगों की नाराजगी कुछ कम हो सके.' 

एडजस्ट करना पड़ेगा

65 साल के बुज़ुर्ग मनमोहन सिंह शनिवार को बैंक खासतौर पर आए क्योंकि उन्होंने टीवी पर सुना था कि यह दिन वरिष्ठ नागरिकों के लिए मुकर्रर किया गया है. कल उन्होंने बैंक में 45 हजार रुपए जमा कराने के लिए दो घंटे इंतजार किया था और आड जब लाइन में लगने गए, तो उन्हें पैन कार्ड की फोटोकॉपी लेने वापस भेज दिया गया. 

वे फिर से लाइन में लगे और आख़िरकार जब उनकी बारी आई, तो बैंक ने उनका पैसा जमा कर लिया, मगर कैश खत्म हो जाने के नाते, हर हफ्ते 24,000 रुपए तक निकाल सकने की जो उन्हें छूट थी, उसे नहीं ले पाए. सिंह आज फिर बैंक आए हैं और तय कर लिया है कि इस बार वे अपना पैसा लेकर ही जाएंगे, जिस पर उनका अधिकार है.

शीशे के कैश काउंटर के पीछे सबको कैश देने की जुगत में खड़े कुमार सिंह से अपनी लिमिट का आधा पैसा लेने की गुज़ारिश कर रहे थे. वह कह रहे थे, 'सबको उनकी लिमिट का पैसे देने के लिए हमारे पास कैश नहीं है. कृपया इस राशि को 10 हजार कर दें.' 

मगर इतना सुनते ही अपने कांपते हाथों में सेल्फ का चेक थामे सिंह उनपर बरस पड़े, 'आप मैनेजर बनने के लायक नहीं हैं! सुना आपने, आप अनफिट हैं.' 

कुमार उन्हें शांत होने और फिर से लाइन में जाने के लिए कहते हैं और जो उनके बस में है, करने की कोशिश करते हैं. जब वे अपने केबिन में लौटते हैं, तो देखते हैं कि एक और गुस्साया कस्टमर वहां उनका इंतजार कर रहा है. 'बॉस,  तीन दिन से बैंक आ रहा हूं. जब भी आता हूं, आपके पास कैश नहीं होता. मैं क्या करूं? नौकरी छोडक़र आपकी बैंक के बाहर बैठ जाऊं?' 

कुमार दबी आवाज में बोले कि कैश निकालने के लिए आपको 12 बजे आना होगा, क्योंकि इस वक़्त तक रोज़ाना खत्म हो जाता है. इसपर कस्टमर ने गुस्से में कहा, 'आपके बैंक का मेरा यह सबसे खराब अनुभव है. यह मेरी होम ब्रांच है. मुझे और कस्टमर्स पर प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए?' कुमार उससे नजरें नहीं मिला सके. वह बोले, 'यह मुश्किल सबको आ रही है. हमें अपने सभी कस्टमर्स को बराबर सर्व करना है. औरों की तरह आपको भी एडजस्ट करना चाहिए.' वह शख्स केबिन से धमकी देते हुए निकलता है, 'मैं तुम सबको देख लूंगा.' 

वीकडेज में कुमार बैंक रोज़ सवेरे 9 बजे आ जाते हैं और रात 9 बजे लौटते हैं. जिस तरह से रोजाना उन्हें और उनकी टीम को गालियां और गुस्सा झेलना पड़ रहा है, उन्हें बुरा लगता है. पर सबसे ज्यादा बुरा यह लग रहा है कि उनका गुस्सा नीति बनाने वालों पर नहीं होकर बैंकर्स पर फूट रहा है. वे कहते हैं, 'मोदी को क्यूं नहीं गाली पड़ती? गालियां और गुस्सा सिर्फ हम लोगों पर निकालना है.'   

9 तारीख से कुमार रात में घर सिर्फ खाने-सोने जाते हैं. बाकी वक़्त बैंक में रहते हैं. ना घरवालों को वक़्त दे पा रहे हैं और ना खुद को. पर इससे भी ज्यादा मुश्किल तब होती है जब लोगों की तकलीफ दूर करने में वे खुद को लाचार पाते हैं.

लाचारी

जब कुमार से पूछा कि नोटबंदी के बाद उन्हें काम में सबसे ज्यादा मुश्किल कब आई, तो उन्होंने कहा, जब वे लोगों की कैश की जायज़ जरूरत पूरी नहीं कर सके और उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा. एक औरत को अपने खाते से एक लाख रुपए निकालने थे क्योंकि उनके पति की कीमोथेरेपी चल रही थी. उनके पास सभी मेडिकल दस्तावेज थे. जब कुमार ने अपने सुपरवाइजर से अपवाद स्वरूप कुछ करने के लिए पूछा, तो उनके अनुरोध को ठुकरा दिया गया. 

जब 80 के दशक में चल रहे लोग उनके बैंक के बाहर लंबी रेंगती कतार में खड़े होते हैं और कैश खत्म हो जाता है, तो ज़ाहिर है वे उनकी मदद मांगते हैं. पर कुमार लाचार हैं. एक गरीब औरत को कह दिया गया कि वह पैसा लेने लेट आई है. उन्होंने कहा, घर पर रोटी का आखिरी निवाला भी खत्म हो गया है और उनके बच्चे भूखे हैं. मगर उस वक्त कैश नहीं था और कुमार ने उन्हें अगले दिन आने को कहा. पर वह नहीं लौटीं.

  

कुमार कहते हैं, 'पता नहीं उनका क्या हुआ, उनके बच्चों को खाना मिला या नहीं. हमारे लिए सबसे मुश्किल घड़ी यह है कि लोगों की गरीबी और जायज़ जरूरत को देखते हुए भी उन्हें हमें खाली लौटाना पड़ता है.' कभी-कभी रात में चेहरा आंखों के आगे घूमने लगता है. लगता है मानो हम जल्लाद बन गए हैं और उस गलती के लिए खुद को अपराधी महसूस करने लगते हैं, जो हमने की ही नहीं. 

26 साल के चंदन बिष्ट जूनियर कस्टम केयर एक्जीक्यूटिव हैं. सवेरे 8 बजे घर छोड़ देते हैं और रात 11 बजे लौटते हैं. उनके चेहरे पर फीकी हंसी है. कहते हैं, 'इन दिनों बैंक में 12 से 14 घंटे काम कर रहा हूं. लौटते वक्त थक जाता हूं और लगातार चिल्लाने की वजह से आवाज़ बैठ जाती है.' बिष्ट भावुक हो उठते हैं, 'सबसे ज़्यादा तकलीफ तब होती है जब गरीब, बूढ़े और बीमार लोगों का भारी दुख देखने के बाद भी हम उनकी मदद नहीं कर पाते हैं.' 

कैशियर का तनाव

पर बिष्ट का काम निश्चित रूप से उस समय से बेहतर है, जब वह कुछ दिनों पहले कैश काउंटर पर थे. 8 घंटे लगातार काम करने की वजह से उन्हें खाने-पीने का वक्त नहीं मिलता था. गर्दन दर्द करने लगती और नोट गिनने में आंखें साथ नहीं देतीं. बिष्ट खुद को खुशकिस्मत मानते हैं कि नोट गिनने में उनसे गलती नहीं हुई और ना ही कभी पैसे कटे. उनके साथियों के कटे हैं. 

मेरे एक फ्रैंड को हाल में 2,000 के नोट के 44 हजार रुपए दे दिए, जबकि उन्हें 22 हजार ही निकालने थे. जब उन्होंने कैशियर को बताया, तो उन्होंने यह कहते हुए शुक्रिया कहा कि इस गलती का खुलासा होने पर उन्हें अपनी जेब से भरना पड़ता. कुमार के मुताबिक ऐसी घटनाएं उनकी बैंक में कम ही होती हैं, पर हां, नोटबंदी के बाद से बैंकरों पर काफी तनाव और दबाव होने के नाते अब ये घटनाएं अक्सर सामने आ रही हैं.

नोटबंदी के बाद से बैंकरों के लिए निश्चित रूप से चुनौती है कि वे तनाव को कितना बर्दाश्त कर सकते हैं. रोहतक के बैंक मैनेजर की कुछ दिनों पहले हार्ट अटैक से मौत होने से बैंक कर्मचारियों में दहशत बनी हुई है. वे किस हद तक सहन कर सकते हैं?

बिष्ट ने कहा, 'पता नहीं, सबका ही बुरा हाल होगा. नोटबंदी के महत्व पर शक नहीं है. अगर सही प्लानिंग के साथ कदम उठाया जाता, तो हम सबको कम परेशानी होती.’

(पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं)

First published: 21 November 2016, 7:32 IST
 
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